सिर्री : कहानियां जो हमारे जीवन का हिस्सा हैं

दृश्यों को जीवंत करना अबीर आनंद जानते हैं. उनकी कहानियों के पात्र हम ही हैं.

अबीर आनंद हिंदी में एक अलग तरह का भाव लाये हैं। वे सामाजिक तानेबाने पर अपने विचारों और अनुभवों द्वारा ऐसी कहानियां रच रहे हैं जो असलियत दिखाती हैं, छिपाती नहीं। पाठक को लगता है कि वह कहानी का किरदार है या उसके आसपास ऐसा कुछ घटा है। दृश्यों को जीवंत करना अबीर जानते हैं।

कहानी संग्रह ‘सिर्री’ 11 कहानियों से मिलकर बना है। ये कथायें यकीनन हमारे जीवन का हिस्सा हैं। आवरण देखने पर पाठक को उत्सकुता होती है और साथ ही वह सोच में पड़ जाता है।

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‘गुटखा तेंदुलकर’ कहानी की चर्चा हर जगह हो रही है। इसका एक अंश पढ़ें:
‘रोजगार, नौकरी, तरक्की...इन शब्दों ने सबकुछ तबाह कर दिया। विवाह, पत्नि, मित्र, संबंधी कुछ काम नहीं आए। और विडंबना देखो...पापा को लगता था कि जीवन इन्हीं चीजों के सहारे आगे बढ़ता है।....मुझे नदी के गहरे पानी से बहुत डर लगता था। पापा कहते थे कि गहराई किसी को नहीं डुबाती। ...दिन में पीछा करती काली परछाइयां ही रात बन कर उजाले को धर लेती हैं। बहुत सोचा पर कभी महसूस नहीं हुआ कि दिन का अंत उजाले में हो। आखिर क्यों हर दिन अंधेरे में खत्म होने को विवश है?’

‘मुक्ति’ का अंश पढ़ें:
‘माथे पर पड़ी ढीली और बोझल चमड़ी की सलवटों में पसीना अपना आशियाना ढूंढ रहा था। सिर पर चंद सफेद बालों का झुरमुट इतना बिखरा हुआ था, कि पसीने की बूंदों को आपस में जुड़ने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था।...चौहत्तर साल की उम्र में अब उसकी परछाइयां ही उसकी सबसे करीबी हमदर्द थीं जो उसे कभी डांटतीं तो कभी पुचकारतीं।’

बुढ़ापे को करीब से जाना है अबीर आनंद ने। उन्होंने परिवारों में वृद्धों की स्थिति को अच्छी तरह वर्णित किया है। मुझे लगता है कि अबीर जिंदगी के उन पहलुओं पर खुलकर बात करना चाहते हैं जिन्हें प्रायः नजरअंदाज किया जाता है। उम्रदराज असहाय हैं, कुंठा ने उन्हें घेर लिया और परिवारों में उनके लिए कोई जगह नहीं। ‘चिता’ कहानी हर किसी को पढ़नी चाहिए।

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अबीर आनंद की भाषा शैली में बहाव है जिसमें वे लिखते हुए खो जाते हैं। कई बार ऐसा लगता है जैसे उनके साथ हम भी बह रहे हैं। वे कहानी को नीरसता से बचाकर ले जाते हैं, लेकिन मन में ढेरों सवाल छोड़ जाते हैं। एक कहानी पढ़ने के बाद दूसरी कहानी पढ़ने की भूख स्वतः होती है।

किताब कहती है:
‘सुबह का भूला शाम को घर पर आये तो वह भूला नहीं कहलाता, पर शाम के भूले को क्या कहेंगे?’ सुनील को बड़ी सरलता से मिला होमलोन उसे ‘सिर्री’ बना देता है, वहीं मानस को मुफ्त में मिला रिंगटोन उसके गले की फांस बन जाता है। भ्रष्टाचार में लिप्त समाज में तिवारीजी जैसे अफसर भी हैं जिनको बड़े-बड़े प्रलोभन अपने सिद्धांतों से नहीं डिगा पाते, परंतु अंत में वे परिस्थितियों से समझौता क्यों कर लेते हैं?’

अबीर आनंद का यह पहला कहानी संग्रह है। हाल में उनका हिंदी और अंग्रेजी में ‘पापा’ नामक काव्य संग्रह भी आया है।

अबीर यूपी के तराई क्षेत्र से आते हैं। प्रारंभिक शिक्षा सैनिक स्कूल, घोड़ाखाल से करने के बाद उन्होंने खड़गपुर से आईआईटी की। वर्तमान में वे एक कैमिकल कंपनी में कार्यरत हैं।


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