'स्वप्नपाश' : शब्दों का सांचा जहां कहानियां बोलती हैं

क्रिएटिव लोगों के जीवन की ‘दुनिया’ और उनकी ‘सभ्यता’ का तार्किक विश्लेषण किया है.

एक कहानी की शुरुआत के लिए यूँ तो इतना काफी है कि प्रेमी युगल में किसी एक को कोई बीमारी हो जाए। उस पर यदि पता चले कि मरीज का डॉक्टर ही उसका प्रेमी है और बीमारी मनोवैज्ञानिक है, तो रोचकता और बढ़ जाती है।

इतने क्षुद्र मोड़ इस कहानी की जान नहीं हैं। इस कहानी की जान है बीमार का वह संसार जो मनीषा कुलश्रेष्ठ ने गुलनाज़ फरीबा के इर्द-गिर्द रचा है। निश्चित तौर पर हिंदी लेखन मैं संभवतः पहली बार देखने को मिला है कि स्किजोफ्रेनिया और कला की गहराईयों में थीसिस लिखने जैसी मेधा के साथ विचरण किया गया है। इन मामलों में यह उपन्यास परिपक्व अंग्रेजी लेखन या मास्टरपीस की श्रेणी में शुमार होता है। यही इस उपन्यास की कमी भी है। कला और स्किजोफ्रेनिया की जटिलताएं इतनी गहरे जाकर न टटोली गयी होतीं तो मैं एक बारगी निराश होता। यही शायद आम हिंदी पाठक को असहज या गूढ़ लग सकता है। ‘ह्यूमन साइक’ तक ठीक था पर ‘इरोटिक ट्रांस्फेरेंस’ और ‘काउंटर ट्रांस्फेरेंस’ को समझने में पाठक को मतिभ्रम हो सकता है।

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क्रिएटिव लोगों के जीवन को एक अलग धरातल पर रख कर उनकी ‘दुनिया’ और उनकी ‘सभ्यता’ का तार्किक विश्लेषण है, बिना इस सवाल के कि क्या सही है।

स्निफर डॉग के साथ गुलनाज़ का मूक संवाद बमुश्किल दो मिनट का है। वह कुत्ता उसे आगाह करना चाहता है पर गुलनाज़ का गणित कुछ और कह रहा है। अंततः वह अपने गणित पर भरोसा करती है।

“बारूद के अलावा यह सब भी सूंघते हो?” इस मूक संवाद में वह पूछती है, जिसके उत्तर में कुत्ते का संवाद है कि “वुफ वुफ वुफ! चलो, अब मेरी ड्यूटी ऑफ!” कुत्ता सिर्फ इस प्रश्न के उत्तर में भोंकता है, इससे पहले के पाँच- छः संवाद बिना भोंके ही उसने पूरे किए। ऐसा लगा जैसे पाठक का मन सुन रहा था, “मैं बारूद ही सूँघ रहा हूँ...आदमी के अन्दर भरा हुआ बारूद! चलो, अब मेरी ड्यूटी ऑफ!”

आर्टमिज़िया की एक रोचक कहानी का सहारा लिया गया है, जिसका रहस्य पाठक को सब कुछ जान लेने के बाद भी अधूरा ही लगता है। कथाकार तब सफल माना जाता है जब सब कुछ कह देने के बाद भी पाठक के मन में कुछ और सुनने की इच्छा शेष रह जाती है।

"मनोचिकित्सकीय शोधों के अनुसार शहरीकरण स्किजोफ्रेनिया के होने की दर को बढ़ाता है और पारिवारिक ढांचे में टूट रोग से मुक्ति में बाधा पहुंचाती है."
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मनीषा कुलश्रेष्ठ.
मनीषा कुलश्रेष्ठ का लेखन ही नहीं वरन उनकी कला और उसके तमाम पहलुओं पर पकड़ इस कहानी को श्रेष्ठ बनाती है। इसके अतिरिक्त स्किजोफ्रेनिया के मरीज का चित्रण, उसकी संवेदनाएँ, दौरे और उसके मतिभ्रम एक आम पाठक के लिए नए अनुभव हो सकते हैं।

बलात्कार पीड़ित से मीडिया का सवाल कि ‘कैसा लग रहा है’ संवेदनहीनता को मजबूती से उभारता है, पर उससे कहीं ज्यादा झकझोरता है पीड़िता का उत्तर।

“मुझे अपने शरीर से घृणा होने लगी थी, जब भी यह किसी तरह के मज़े लेता मैं इसे खीझकर सजा देती। कभी दो-दो दिन कुछ न खाकर, कभी रात भर बैठे रह कर। मैं घंटों बैठी रहती, किचन के स्टोर के कोने में, जहाँ चीटियाँ और कॉकरोच सिंक में चढ़ने के लिए मेरा शॉर्टकट बेहिचक लेने लगते।”

मैंने मनीषा जी की कुछ शुरुआती कहानियाँ पढ़ी हैं। 'स्वप्नपाश' पढ़कर उनके लेखन की ‘ग्रोथ’ का सहज अंदाजा हो जाता है। उन्होंने शब्दों को ऐसे सांचे में ढाला है, जहां कहानियां अक्सर बोलती हैं।

-अबीर आनंद.

पुस्तक के बारे में -
लेखिका : मनीषा कुलश्रेष्ठ
प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन
पृष्ठ: 135

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