जिंदगी आइस पाइस : निखिल बच्चा है और इतराता हुआ लेखन करता है

बचपन की उस दुनिया की फिर याद दिला दी जो खट्टे-मीठे अनुभवों से बनी थी.

निखिल सचान को उनकी पहली किताब ‘नमक स्वादानुसार’ के लिए जाना जाता रहेगा, लेकिन ‘जिंदगी आइस पाइस’ भी कम नहीं है। यह आपके बीते दिनों को फिर से याद दिलाने की रोमांचक कोशिश है। इसके किरादार आप ही हैं और कहानी आप की कहीं न कहीं टकराती हुई तेजी से दौड़ती भी है। एक आईआईटी वाला युवा और इंजीनियर हिंदी में इतना ह्यूमर पैदा कर सकता है, यह सोचने वाली बात है। निखिल ने यह सब किया है। वह बच्चा बनकर शब्दों को उसी लिहाज से हमारे करीब लाया है और जिंदगी के अनुभवों की उस गरमाहट को भी दिखाता है जिसे हम कहीं न कहीं ‘मिस’ करते हैं।


निखिल खुद कहते हैं:
‘लिखना मेरे लिए बस रोमैंटिसाइज करना भर रहा है। हां, ये अलग बात है कि ये रोमैंस मैंने पूरी शिद्दत से किया और अभी तक कर पा रहा हूं। स्मार्टफोन, इ.मेल, मीटिंग्स, लैपटॉप और एम्बिशन के मकड़जाल में रोजगार बुनते-बुनाते और पूरी तरह प्रोफेशनलिज्म निभाने की कवायद के बीच, जब भी समय मिला, लिखता रहा। सुधारता रहा। पढ़ता रहा और सीखता रहा। ऐसे में अक्सर खुद के लिखे को परफेक्ट बना लेने की ख्वाहिश ऑब्सेशन में बदलने लगती है। उससे जूझता भी रहा।’

कुछ ऐसी चीजें हैं जो निजि तौर पर मुझे भा गयीं। आप भी पढि़ये:
1. विक्कू हरामी था (और इसकी कोई वजह नहीं थी)।
2.ये कल के लौंडे जो पहले उन्हें भैया-भैया कहते नहीे थकते थे उनके ईमान-धरम का जॉनी लीवर क्यों हो गया है? वो आखिर कादर खान की तरफ हैं या गोविन्दा की तरफ?
3.नैन्सी को पॉपिंस से लेकर रंगीन लट्टू तक का लालच दिया गया लेकिन उसका ईमान डिगा नहीं। उसने आशिकी की ऑडियो कैसेट का ऑफर भी ठुकरा दिया क्योंकि अब वो राहुल रॉय पर जान नहीं छिड़कती थी। जूनून देख लेने के बाद से उसे राहुल रॉय पागल और डरावना लगने लगा था।
4.एक बार फिर नानू और सुबू का अंगूर जैसा मुंह सिकुड़ कर किशमिश हो गया।
5.उस वक्त गूगल नहीं होता था पर पापा होते थे।
6.ऐसी ही एक चिट्ठी किसी ऐसे ने लूट ली जिसे पढ़ना नहीं आता था और उसने किसी और से वो चिट्ठी डरकर इसलिए भी नहीं पढ़वाई क्योंकि पढ़ लिए जाने से चिट्ठियां, चिट्ठियां नहीं रहतीं। कागज का टुकड़ा हो जाती हैं। वो इस बात से भी अनजान था कि एक चिट्ठी हवा में ही फूट गयी थी। शायद उस रात हवा में चुभन कुछ ज्यादा रही होगी।
7.लेकिन बेटा जहां तुम प्रेम की सरल रेखा से जुड़ना चाह रहे हो वहां त्रिकोणामिति के इतने लव टिरेंगल उलझने को तैयार बैठे हैं कि कटिया उतारते-उतारते करंट खाकर मर जाओगे।


निखिल सचान ने बचपन से शुरु किया और बुढ़ापे पर किताब को खत्म किया। यह उस आइस पाइस की तरह मानी जानी चाहिए जिसे बच्चे खेलते हैं। लेखक यहां मामूली अनुभवों को अहम बनाता चला गया है। उसने जैसा देखा होगा या अनुभव किया होगा, उसी तरह अपना कैनवास रचता गया। निखिल सचान को पढ़कर ऐसा भी लगता है कि वह अभी बच्चा है जो इतराता हुआ लेखन करता है। वह मजे लेकर लिखने वाला इंसान मालूम पड़ता है जिसे गहराई में गोते लगाने की भी आदत है, और जो जिंदगी के दर्द को भी समझता है।


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