आज की जानकी : समाज की असलियत को उजागर करती कहानी

एक सन्देश देने की कोशिश कि यदि आप हौंसले के साथ उड़ान भरेंगे तो कुछ भी नामुमकिन नहीं.

जानकी का नाम आते ही हम देवी सीता को याद करते हैं। उस युग में एक स्त्री को परीक्षा देनी पड़ी थी। आज भी अनेक जानकियां ऐसी हैं जिन्हें जीवन के हर मोड़ पर नयी परीक्षा से गुज़ारना पड़ रहा है। उन्हें हर पल समाज की दुहाई दी जा रही है। उनकी राह आसान नहीं, मगर वे मजबूत इरादों और विश्वास के साथ डटी हुई हैं। वे जानती हैं कि कष्ट कुछ समय के लिए हैं, बाद में हर किसी को इस संसार से विदाई लेनी है।

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अशोक बाघ का यह पहला प्रयास है। उनका उपन्यास ‘आज की जानकी’ कई गंभीर विषयों को एक कहानी के माध्यम से उठाता है। उन्होंने एक महिला जानकी को केंद्र में रखकर इसे बुना है। वे जानते हैं और शायद उन्होंने समाज के उन अनुभवों को साझा किया है जिससे लोग दो-चार होते हैं। अशोक बाघ ने महिलाओं की दशा का जिस तरह वर्णन किया है, उसकी तारीफ की जा सकती है। मुख्य पात्र शुरू से आखिर तक संघर्ष करता है। जानकी की मृत्यु के वर्णन को उन्होंने सहजता से ज़ाहिर करने की कोशिश की है।

उपन्यास में एक जगह जानकी के बारे में चर्चा हो रही है –‘‘तेरे साथ जो सुख भरे जीवन की आस थी और जो यथार्थ का जामा पहन सकती थी उस सुख को उसने अपने कर्तव्य की बलि वेदी पर रख कर, स्वयं ही बलि दे दी।‘

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जानकी का पिता उसका विवाह अधेड़ से करता है. दहेज न देने के कारण एक स्त्री को ऐसे पति की संगिनी बनना पड़ता है जो उसे किसी तरह का सुख नहीं दे पाता. लेकिन वह उसे अपनाती है. जानकी दुखों से लड़ती और जीवन से संघर्ष करती हुई आगे बढ़ती है.

कहानी में अशोक बाघ ने कई पात्र इसलिए चुने हैं ताकि वे समाज के ज्यादा से ज्यादा हिस्से को छू सकें। धर्म और अध्यात्म को उन्होंने महत्त्व दिया है। उन्होंने भाषा को सरल रखा है ताकि कहानी का प्रवाह बना रहे।

लेखक ने महिला पात्र जानकी को शिखर तक पहुंचते हुए दिखाया है। यह एक सन्देश देने की कोशिश भी है कि यदि आप हौंसले के साथ उड़ान भरेंगे तो कुछ भी नामुमकिन नहीं। लेखक स्वयं लिखते हैं कि उन्होंने ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ की बात कही है।

कुल मिलकर ‘आज की जानकी’ एक रोचक कहानी है जो समाज की असलियत को उजागर करती है।

आज की जानकी 
लेखक : अशोक बाघ
प्रकाशक : ज़ोरबा बुक्स
पृष्ठ: 306



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