एक पेड़ छतनार : कविताओं में भावनाओं के अनूठे रंग

दिनेश शुक्ल कविता के साथ-साथ शब्दों के माध्यम से चित्रकारी करना भी बखूबी जानते हैं.

‘एक पेड़ छतनार’ आधुनिक कवि दिनेश कुमार शुक्ल की कविताओं का ऐसा संग्रह है जिसमें मानव जीवन तथा प्रकृति के विभिन्न रंगों का बहुत ही सजीव लेकिन सतर्क लयबद्ध वर्णन है। यहां राग, द्वेष, उत्सव, आश्चर्य, अवसाद, सुख, दुख, हास्य और व्यंग्य सभी कुछ देशकाल और मानवीय ऊर्जा और उसकी सोच-समझ तथा भाग्य के साथ कदमताल करता हुआ एक नयी तरह की कविताओं के रुप में गतिमान होता जान पड़ता है।

‘औने-पौने में निबटाकर गेहूं अरहर/मंडी से घर लौट रहे थे राम मनोहर/मंडी में आढ़तिये ने डंडी मारी/गन्ने की परची के पैसे तीन साल से नहीं मिले थे/लाही को अबकी फिर लस्सी चाट गयी थी।’

इन पंक्तियों में कवि ने किसान की समस्याओं को बड़े सहज लेकिन गंभीर भाषा शैली में उद्यृत कर पाठक के सामने किसान की मौलिक छवि प्रस्तुत की है। ‘जगह जानी पहचानी’ नामक इस कविता में किसान के चैतरफा शोषण को उजागर किया है और पनप रही सामाजिक बुराई दहेज पर जोरदार प्रहार भी किया है।

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‘‘दिनेश कुमार शुक्ल की कविता में जीवन और जन के राग का उत्सव है जो आश्चर्य नहीं कि अक्सर छंद में आता है, नहीं तो छंद की परिधि पर कहीं दूर-पास मंडराता हुआ। उनकी कविता समय की समूची दुखान्तिकी से परिचित है, उस पूरे अवसाद से भी जिसे समय ने अपनी उपलब्धि के रुप में अर्जित किया है, लेकिन वह उम्मीद की अपनी जमीन नहीं छोड़ती। कारण शायद यह है कि जन-जीवन, लोक-अनुभव और भाषा के भीतर निबद्ध जनसामान्य के मन की ताकत की एक बड़ी पूंजी उनके पास है।’’

‘बस्ता’ नामक कविता में शुक्ल जी ने पुस्तकों के भार से लदे, बच्चों को श्याम सुन्दर (श्रीकृष्ण) नाम देकर उनके साथ अभिभावकों द्वारा किये जा रहे अत्याचार का दिलचस्प शब्दों में किये वर्णन का एक अंश:
‘किन्तु जब
पूरी पढ़ाई हो चुकी,
स्कूल से निकले
तो देखा
श्याम सुन्दर रह गये हैं
इंच भर के बोन्साई।’

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दिनेश शुक्ल ने संकलन में जमीन से जुड़ी बात की है। उनका काव्य सरल है, उनका काव्य जटिल है। वे कविताओं में हर तरह का रंग भरना जानते हैं। वे कविता के साथ-साथ शब्दों के माध्यम से चित्रकारी करना भी जानते हैं। यही उन्होंने किया है। हर कविता अलग है और उसमें भावनाओं के रंग भरे गये हैं। भावनायें जीवित होकर नये उत्साह के साथ चहलकदमी करती, गांव की बात करती, लहलहाती फसलों की तरह बहती हैं। वे अपनी रचनाओं में जीवन के भाव भरते हैं।

संकलन में ‘लोहा’ नामक कविता में दिनेश शुक्ल हमें सैर पर ले गये हैं। यह सैर अनूठी है। यहां कवि ने धरती से निकले लोहे को वापस धरती में समाने की बात कही है। उन्होंने लोहे को कबीर का दोहा भी कह दिया। वे कहते हैं कि लोहा दुनिया को बदलता है। वहीं दिनेश जी ने कालिदास का भी वर्णन किया है। कविता के अंश देखें:
‘धरती से निकला
फिर वापस
धरती में घुसता है लोहा
बनकर हल की फाल!
लोहे के बल पर ही चलती
सबकी रोटी-दाल!

आगे देखें -
‘सब कुछ जान गया था लोहा
युग के दुख में सीझा लोहा
खुद पर इतना खीझा लोहा
काट रहा था कालिदास बनकर
खुद अपनी डाल
अब तक वह दुख
साल रहा है
बीते इतने साल!’

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'पिता' में कवि ने बहुत सुंदरता से सभी भावों को दर्शाया है। इसे बार-बार पढ़ा जाये तो भी कम है। ऐसा काव्य हर किसी से जुड़ा है, यह अपना काव्य है।

'चार बताशे चार फूल बांधकर
लाल अंगोछे में/देवी जी की मठिया पर
संझा होते
सगुन साधकर...'
इन पंक्तियों में दिनेश शुक्ल ने सब कुछ कह दिया है। जब हम इस कविता को पढ़ेंगे तो हर शब्द महसूस करेंगे।

राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित इस पुस्तक में दिनेश कुमार शुक्ल की सभी कवितायें आधुनिक युग की कविता शैली का अनुसरण करते हुए अपनी अलग छाप छोड़ने का सफल प्रयास करती हैं। यह संकलन कविता प्रेमियों की काव्य पिपासा की तृप्ति का जरुरी स्रोत है।

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दिनेश कुमार शुक्ल को प्रतिष्ठित 'केदार सम्मान' तथा 'सीता स्मृति सम्मान' प्राप्त हैं. 
'एक पेड़ छतनार’
दिनेश कुमार शुक्ल
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ : 150
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