एक सेनाध्यक्ष की आत्मकथा : सौ साल के सैनिक जीवन का गौरवशाली इतिहास

एक अलग एहसास दिलाने वाली किताब जिसे पढ़ने के बाद हमारे कई सवालों के उत्तर भी मिल जाते हैं.
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भारत के पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल जोगिन्दर जसवंत सिंह की आत्मकथा प्रभात प्रकाशन ने प्रकाशित की है। यह पुस्तक 'A Soldier's General : An Autobiography' का हिंदी अनुवाद है।  352 पृष्ठों की यह पुस्तक हमें केवल जनरल जे.जे. सिंह के जीवन संघर्षों से ही परिचित नहीं कराती बल्कि भारतीय सैनिकों की त्याग, बलिदान, संघर्ष, देशभक्ति तथा समर्पण का सजीव चित्रण प्रस्तुत करती है।

जनरल जे.जे. सिंह अपने दादा आत्मा सिंह के उस विश्वास को कायम रखने में सफल रहे जिसे उन्होंने बचपन में अपने दादा के मुख से सुना था। उनके दादा ने कहा: ‘काका, रब राखा, सिपाही दा बेटा करनैल, ते करनैल द बेटा जरनैल बनेगा।’ वे सैनिक परिवार की तीसरी पीढ़ी में वास्तव में भारतीय सेना प्रमुख बने और अपने दादा का विश्वास पुख्ता किया।

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इस पुस्तक में जनरल जे.जे. सिंह ने अपने दादा आत्मा सिंह द्वारा प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भाग लेते समय की कई घटनाओं से शुरू करते हुए भारतीय सेना की चुनौतियों तथा संघर्ष के बावजूद विश्वभर में फहरायी विजय पताकाओं का बहुत ही सरल और पाठनीय भाषा शैली में वर्णन किया है। सिपाही आत्मा सिंह, उनके बेटे लेफ्टिनेंट कर्नल जसवंत सिंह तथा पौत्र सेनाध्यक्ष जनरल जे.जे. सिंह की तीन पीढ़ियों के लगभग सौ वर्षों (1914 से 2007) की प्रमुख सैनिक सेवाओं का सिलसिलेवार वर्णन ‘एक सेनाध्यक्ष की आत्मकथा’ नामक पुस्तक में किया गया है।
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यही नहीं अपने साथ आतंकी आॅप्रेशनों से लेकर सियाचिन युद्ध जैसे मौकों पर भाग लेने वाले जांबाज सैनिकों के त्याग और संघर्षपूर्ण कौशल की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है तथा उनपर गर्व किया है।

वे मात्र 15 वर्ष की आयु में ही एनडीए में भर्ती हुए। जनरल जे.जे. सिंह को पहले सिख थल सेनाध्यक्ष बनने का गौरव हासिल है।

किताब कहती है: ‘देश के उत्तरपूर्वी इलाकों में उग्रवादियों को जंगल तक खदेड़ा, दूसरी तरफ कश्मीर में उन्होंने आतंकवादियों की गोलियों का सामना किया। 1991-93 के बीच कश्मीर में ब्रिगेड कमांडर के रुप में उन्होंने एक नई रणनीति अपनाई और गांववालों को यह समझाना शुरु किया कि कैसे आतंकवादी उन्हें राह से भटकाने का काम कर रहे हैं। सेनाध्यक्ष का पद संभालने (2005-07) के बाद उन्होंने ‘लोहे की मुट्ठी और मखमल के दस्ताने’ की नीति अपनाई।’

‘इस दिलचस्प पुस्तक में जनरल सिंह ने बताया है कि सरकार के सर्वोच्च स्तर पर देश की सुरक्षा के बड़े फैसले किस प्रकार किये जाते हैं, चाहें वह सियाचिन का मामला हो, युद्ध (कारगिल) का या फिर सीमा पर भारी तादाद में फौज का जमावड़ा (आॅपरेशन पराक्रम) करना हो।’

‘सैन्य जीवन को पूरी जिंदादिली से जीने और उसके भरपूर आकर्षण तथा रोमांच का सजीव वर्णन करने के साथ ही जनरल सिंह ने पाकिस्तान और चीन से मिलने वाली चुनौतियों, आतंकवाद, उग्रवाद और नक्सलवाद के खतरे, सैनिक कूटनीति का महत्व, और तेजी आदि अहम और गंभीर मुद्दों का बहुत सुंदर मूल्यांकन तथा विवेचन किया है।’

‘जीतने के लिए लड़ो’ के ध्येय के साथ उन्होंने मुश्किलों का धैर्य के साथ सामना किया और इस बात का ध्यान रखा कि उनके अधीन सैनिकों को कुशल नेतृत्व मिले तथा वे हमेशा लड़ने के लिए तैयार रहें।’

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यह पुस्तक तीसरी पीढ़ी के एक सैनिक की कहानी है, जो कर्मठता से कार्य करता हुआ भारतीय सेना के सर्वोच्च पद तक पहुंचा. जनरल जे.जे. सिंह के दादा ने उनके लिए जो संदेश दिया, वह मुझे पसंद आया, जिसमें सिपाही आत्मा सिंह ने कहा है कि अच्छे नेता आदर प्राप्त करते हैं, उसे मांगते नहीं हैं; सम्मान तो अर्जित किया जाता है. मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक सैनिकों के लिए एक आदर्श मानक साबित होगी और युवाओं को प्रोत्साहित करेगी.
-डाॅ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, पूर्व राष्ट्रपति.

पुस्तक में अध्याय छोटे रखे गये हैं जिसमें लेखक ने पूरी बात कह दी है। यह सैन्य युद्ध की कला सिखाने वाली पुस्तक नहीं, बल्कि भारतीय सैनिक कौशल, उत्साह को रोचकता से प्रस्तुत करने वाली किताब है। उन यादों को फिर से जीवित करने की सच्ची कोशिश है जिनसे हमारी सीमायें सुरक्षित हैं। एक अलग एहसास दिलाने वाली किताब जिसे पढ़ने के बाद हमारे कई सवालों के उत्तर भी मिल जाते हैं।

जनरल जे.जे. सिंह ने मिल्खा सिंह का जिक्र करते हुए लिखा है कि उनके पिता ने 1950 के दशक में उनमें एथलीट बनने के गुण को भांप लिया था। जे.जे. सिंह के पिता उनके कंपनी कमांडर थे और उन्होंने उन्हें बेटे की तरह संवारा। लेखक उस समय बच्चे थे और मिल्खा सिंह को दौड़ता हुआ देखकर उत्साहित होते थे।

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पूरा देश सशस्त्र बलों का सर्वोच्च सम्मान करता है. सैनिकों का एक जनरल इस आत्मकथा में बताता है कि ऐसा क्यों है? यह पुस्तक उल्लेखनीय जीवन-यात्रा का स्पष्टवादिता और विनम्रता से किया गया शानदार वर्णन है, जिसमें एक महान सैनिक और नायक का व्यक्तित्व निखरकर सामने आता है. -टीएसआर सुब्रह्मण्यम, पूर्व कैबिनेट सचिव.

जे.जे. सिंह पर्वतारोहण की ओर हमेशा आकर्षित रहे हैं। उन्होंने 1960 के दशक में हिमालय पर्वतारोहण संस्थान से उच्च पर्वतारोहण कोर्स किया जिसका अनुभव उनके लिए बाद के जीवन में बेहद कारगर साबित हुआ। उन्होंने लिखा: ‘लद्दाख, जोशीमठ सेक्टर और पूर्वोत्तर में वास्तविक नियंत्रण रेखा से लगी चीन के साथ हमारी ऊंचाईवाली सरहद तथा सियाचिन, कारगिल एवं कश्मीर क्षेत्रों में नियंत्रण रेखा की चुनौतियों से निपटने में मेरा यह प्रशिक्षण काम आया।’

इस आत्मकथा में उन्होंने अंतिम अध्याय में अरुणाचल प्रदेश में राज्यपाल रहते हुए जनसेवा के किये कार्यों का हवाला दिया है। वे एक सैनिक होने के नाते जनकल्याण की योजनाओं को अपनी आदत के मुताबिक आम आदमी तक पहुंचाने में सफल रहे। उन्होंने स्वयं को हर समय आम आदमी के बीच स्थापित किया।

यह पुस्तक हमें सेना की प्रतिरक्षा सेवाओं के साथ दूसरी बहुत सी सेवाओं की भी जानकारी प्रदान करती है।

17 सितंबर, 1945 को जन्मे जनरल जे.जे. सिंह एक अत्यंत गरिमामयी सैनिक हैं, राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी, भारतीय सैन्य अकादमी, डिफेंस सर्विस स्टाफ काॅलेज और नेशनल डिफेंस काॅलेज से स्नातक हैं. 1960 के दशक में नागालैंड में, 1980 के दशक में अरुणाचल प्रदेश में और 1991-92 के दौरान जम्मू-कश्मीर में छिड़े सक्रिय अभियानों का उन्हें प्रत्यक्ष अनुभव है. इसके अतिरिक्त 1987 से 1990 के बीच उन्होंने अल्जीरिया में भारतीय दूतावास के रक्षा अताशे का दायित्व निभाया. 31 जनवरी 2005 से 30 जनवरी 2007 के बीच सेनाध्यक्ष के दायित्व सफल निवर्हन के दौरान जनरल जे.जे. सिंह 2007 में स्टाफ समितियों के प्रमुखों के प्रमुख भी रहे. सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद उन्हें अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया। अपने उत्कृष्ट नेतृत्व के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित नागरिक सम्मानों से भी नवाज़ा गया है.
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'एक सेनाध्यक्ष की आत्मकथा’
लेखक : जनरल जे.जे. सिंह
प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन
पृष्ठ : 352
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