हाउ टू थिंक लाइक स्टीफन हॉकिंग : नामुमकिन को मुमकिन करने वाली सोच

‘हाउ टू थिंक लाइक स्टीफन हॉकिंग’ नामक पुस्तक शरीर पर मन के निरंतर संघर्ष की कहानी है.
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स्टीफन हॉकिंग दुनिया के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिकों में शुमार हैं। उनकी विद्धत्ता का आज के समय में कोई सानी नहीं है। उन्होंने अपने बेजान होते शरीर के बावजूद मजबूत इच्छाशक्ति और अपने दिमाग के बल पर खुद को वजूद में रखा है। उनके उन्नत विचारों का नतीजा है कि हम आज ब्रह्मांड के नये रहस्यों को जान सकते हैं और खगोल विद्या को नये आयाम दे रहे हैं।

‘हाउ टू थिंक लाइक स्टीफन हॉकिंग’ नामक पुस्तक शरीर पर मन के निरंतर संघर्ष की कहानी है। पुस्तक हमें एक अव्वल दर्जे के वैज्ञानिक के बचपन की कहानी सुनाती है कि हम उनके हर राज़ को करीब से जान सकें और वे करिश्माई व्यक्तित्व कैसे बने? साथ ही यह भी जान सकें कि उनकी तरह कैसे सोच सकें।

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बचपन में स्टीफन में ऐसी कोई खास प्रतिभा का संकेत नहीं दिया था। जबकि वे खुद यह मानते हैं कि उनकी बहन उनसे अधिक होशियार थी। वो चार साल की उम्र में पढ़ने लगी थी जबकि नन्हें स्टीफन को ऐसा करने में आठ साल लगे।

उन्हें कम उम्र में ही चलायमान मॉडल बनाने में दिलचस्पी थी। उन्होंने ब्रह्मांड के रहस्य जानने की तैयारी शायद तभी से कर ली थी। शायद वे खुद को दूसरों से बेहतर जान गये थे। वे दुनिया को अपने तरीके से देख रहे थे और उसी समय वे अपनी सोच में आसमान की रचनाओं को आकार दे रहे थे। वे हर चीज को उत्सकुतापूर्वक देखते थे। लेखक ने हमें उनके हर पहलू से रुबरु कराने की पूरी कोशिश की है। ताकि पाठक यह जान सकें कि महान सोच के लिए क्या होना महत्व रखता है।

स्टीफन हॉकिंग कहते हैं: ‘यदि आप ब्रह्मांड को समझते हैं तो एक तरह से आप इसे नियंत्रित करते हैं।’

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स्कूल के दिनों में उन्हें ‘आइंस्टाइन’ भी कहा जाने लगा था। यह उनकी विज्ञान के प्रति अधिक रुचि की बदौलत हुआ था। वहीं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान छात्रों को 13 मुश्किल सवाल हल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया था। स्टीफन हॉकिंग ने सबको चौंकाते हुए उसी दिन में 9 कठिन सवालों का हल खोज लिया था जबकि उनके सहपाठी दो हफ्ते की मियाद में एक या दो सवाल का उत्तर तलाश पाये थे।

अपनी जीवन संगिनी जेन वाइल्ड से मुलाकात के एक महीने बाद ही उन्हें अपनी बीमारी का पता चला। उनकी बीमारी ने ही उन्हें महत्वपूर्ण चीजों को ध्यान केन्द्रित करने का भरपूर समय दिया। उनके चिकित्सक ने बताया कि वे मुश्किल से दो साल जी सकते हैं। तब उन्होंने स्वयं को संभाला और संकल्प लिया। 75 साल की आयु में भी उनका दिमाग पूरी तरह काम कर रहा है। वे हर पल नये विचारों को जन्म देने में व्यस्त हैं और भौतिकी के लिए योगदान जारी रखे हुए हैं।

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किताब में लिखा है कि स्टीफन हॉकिंग दूसरे अक्षम लोगों को सलाह देते हैं कि वे अपनी विकलांगता को नजरअंदाज कर अपनी क्षमता के विषय में सोचें। एक बात जो स्टीफन के बारे में अहम हो जाती है कि उन्होंने अपनी सोच पर नियंत्रण रखा है। वे सकारात्मक ऊर्जा की बात करते हैं। वे उस दिशा की बात करते हैं जहां सब उजला है और विश्वास की भूमिका विशेष महत्व रखती है।

इस तरह की किताबें पढ़ने से हमारे मन में कई तरह के विचार गोते लगाते हैं। यह भी भरोसा होता है कि जब वे कर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं। ये पुस्तक प्रेरणा का एक बड़ा स्रोत है जो हमें ऐसे मस्तिष्क वाले इंसान से रुबरु कराती है जो खुद से ऐसे मुकाम पर पहुंचा है जहां तक उस अवस्था में पहुंचना दूसरों के लिए नामुमकिन है। पुस्तक हमें हौंसला देती है कि स्वयं पर विश्वास कर कुछ भी हासिल किया जा सकता है।

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'हाउ टू थिंक लाइक स्टीफन हॉकिंग’
लेखक : डैनियल स्मिथ
प्रकाशक : Amaryllis/मंजुल प्रकाशन
पृष्ठ : 224
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