लैटर्स फ्राॅम कारगिल : ख़तों के ज़रिये कारगिल युद्ध की मर्मस्पर्शी कहानी

भावनाओं में बहते ख़तों से सजी पुस्तक जिसे पढ़कर युद्ध क्षेत्र में चल रही गतिविधियों को जाना जा सकता है.

शहीद की बेटी होने पर उसे गर्व है। वह अपने पिता सहित उन तमाम सच्चे वीरों को नमन करती है जिनपर देश को हमेशा फक्र रहेगा और उनकी बहादुरी के किस्से जिंदा रहेंगे। वह बेटी तब बहुत छोटी थी जब उसके पिता कारगिल के युद्ध में शहीद हुए थे। उसने उनकी यादों को उन खतों के जरिये समेट रखा है, जो उस दौरान लिखे गये थे। वे ख़त जो उन खट्टी-मीठी और प्रेरणादायक बातों से भरे थे। उनमें अनुभवों का ख़ज़ाना है और भविष्य के लिए अनगिनत काम की बातें।

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जगरनाॅट ने ‘लैटर्स फ्राॅम कारगिल’ नामक पुस्तक प्रकाशित की है जिसमें निजि भावनाओं का लेखा-जोखा है। ये एक परिवार की निजि कहानी नहीं है, बल्कि उन सभी परिवारों को समर्पित है जिनका उस जंग के मैदान से नाता था। किताब की लेखिका दीक्षा द्विवेदी कारगिल युद्ध में शहीद मेजर चन्द्रभूषण द्विवेदी की बेटी हैं।

दीक्षा ने 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए कारगिल युद्ध को पुस्तक में बयान करते हुए हमें उन जवानों की असलियत से रुबरु कराया है जो कठोर हालातों में दुश्मन सेना से लोहा ले रहे थे। लेखिका ने उन लम्हों का हमारे जांबाजों के द्वारा अपने परिजनों को लिखे गये ख़तों और डायरियों के जरिये परिचय कराया है। युद्ध के दौरान परिवारों पर क्या बीत रही थी, उनकी भावनाओं का उल्लेख बहुत ही मर्मस्पर्शी तरीके से किया गया है।

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कई जगह ऐसे मौके भी आते हैं जब आप ख़त पढ़ते-पढ़ते बहुत भावुक हो जाते हैं और अपने आंसू नहीं रोक पाते। दीक्षा ने हर माहौल का बारीकी से अध्ययन करने के बाद उसे शब्दों में उकेरा है। उन्होंने यह साहसी कदम उठाया ऐसे अलग विषय को अपने तरीके से चुनकर और उनकी निजि बातों को सबके सामने लाकर।

जब कारगिल युद्ध शुरु हुआ तो लेखिका की उम्र महज आठ साल थी। उसकी बहन 12 साल की थी। हाल ही में उन्होंने शानदार छुट्टियां मनायी थीं, लेकिन उनकी जिंदगी मानो ठहर गयी थी। मगर बहादुर पिता की बहादुर बेटियां और उनकी मां ने परिवार को मुश्किल हालात में संभाले रखा।

दीक्षा द्विवेदी ने लिखा है कि उन्होंने देश की रक्षा करते हुए भी हमें हर कदम पर अपने ख़तों के द्वारा थामे रखा और हमें यादों को सहेजना सिखाया।

ये पुस्तक हमें जवानों के परिवारों से भी जोड़ते हुई चलती है. उनकी पारिवारिक जिंदगी के अनछुए हिस्सों का भी पता चलता है. वे देश के लिए जान देने को हमेशा तैयार हैं, मगर आखिर वे भी इंसान हैं. वे सीमा पर डटे हैं, दिन-रात चौकन्ने हैं, जाग रहे हैं ताकि दूसरे परिवार चैन से सो सकें. वे अपने परिवार की जितनी परवाह करते हैं, उससे अधिक परवाह उन्हें अपने देश की है, सभी परिवार उनके अपने हैं.

एक पत्र में लिखा है:‘जिस समय आपको यह ख़त मिलेगा, मैं आसमान से आपको देख रहा होंगा। यदि मैं अगले जन्म में इंसान बना तो भी मैं आर्मी ज्वाइन करुंगा और अपने देश के लिए लड़ूंगा। अगर आप आ सकते हैं, तो आकर देखिए कि भारतीय सेना ने आपके कल के लिए कहां लड़ाई की है।’

अन्य भावनात्मक खत देखिये:‘भले ही मैं आप सभी से मेरे मरने के बाद नहीं रोने के लिए कहूं, मैं जानता हूं आप फिर भी रोयेंगे क्योंकि आप मुझसे प्यार करते हैं।’

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शहीद हुए लोगों ने जो आखिरी पत्र अपने परिवारों को लिखे उनमें उस समय के हालातों का उल्लेख किया गया है जिसके जरिये हम अंदाज़ा लगा सकते हैं कि हमारे सैनिकों ने देश को सुरक्षित रखने के लिए किन-किन परिस्थितियों का सामना किया है।

दीक्षा द्विवेदी ने पुस्तक लिखने से पूर्व काफी रिसर्च की है। उन्होंने युद्ध में लड़ने वाले जवानों के परिवारों से ख़त एकत्रित किये। यह कार्य बिल्कुल भी आसान नहीं था, मगर उस युद्ध में शहीद हुए एक जाबांज की बेटी ने उसे मुमकिन किया।

‘लैटर्स फ्राॅम कारगिल’ भावनाओं में बहते हुए ख़तों से सजी ऐसी पुस्तक है जिसे पढ़कर सेना के आॅप्रेशनों और युद्ध क्षेत्र में चल रही गतिविधियों को करीब से जाना जा सकता है। एक सांस में इस किताब को पढ़ा जा सकता है। जगरनाॅट बुक्स की ओर से यह बेहतरीन प्रयास है।

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दीक्षा द्विवेदी की यह पहली किताब है. वे  www.akkarbakkar.comकी सह-संस्थापक हैं.
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'लैटर्स फ्राॅम कारगिल’
(Letters From Kargil)
लेखिका : दीक्षा द्विवेदी
प्रकाशक : जगरनाॅट
पृष्ठ : 168
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