लोक का प्रभाष : जीवन एक खुली किताब

प्रभाष जोशी पन्नों पर तैर रहे शब्दों के ज़रिये अपनी बात सादगी और साफगोई से कह डालते थे.

हिन्दी पत्रकारिता के महत्वपूर्ण स्तंभ स्व. प्रभाष जोशी की शोधपरक जीवनी पर रामाशंकर कुशवाहा ने ‘लोक का प्रभाष’ नामक पुस्तक में उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर विस्तार से प्रकाश डाला है। लेखक ने उनकी पत्रकारिता को जन-सम्बद्ध पत्रकारिता का नाम दिया है। पुस्तक पढ़ने से पता चलता है कि प्रभाष जोशी पत्रकारिता को जन सहभागिता का मंच मानते थे जहां हर किसी की आवाज को बिना किसी भेदभाव, बिना किसी लोभ-लालच या दबाव के साथ उठाया जाता हो। उसमें सत्ता हो या विपक्ष सभी के लिए एक समानता होनी चाहिए। बल्कि कमजोर को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। कमजोर तथा दबे, कुचले लोगों की आवाज उनकी पत्रकारिता थी।

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किताब कहती है: ‘प्रभाष जोशी ने पत्रकारिता को सार्वजनिक जीवन की तरह लिया। बचपन में उन्हें ग्राम-सेवा की धुन लग गयी। वही सिलसिला उन्हें पत्रकारिता में ले आया। उनकी पत्रकारिता में समाज-सेवा, देशज राजनीतिक व्यवस्था बनाने के विचार यानी व्यवस्था परिवर्तन और आम नागरिकों के अधिकारों की लड़ाई का मोर्चा दिखता था। क्रिकेट में उनका मन रमा हुआ था। बचपन में जिन भावनाओं और प्रेरणाओं ने उन्हें बढ़ाया, वही उनकी खोज बन गयी। आजीवन वे उसके व्रति बने रहे। इससे लोग प्रेरित होते थे और उनसे जुड़ते जाते थे। यही उनकी सार्वजनिकता थी जिसके केन्द्र में वे खुद को नहीं बल्कि समाज को रखते थे। वे आत्मकेन्द्रित तो बिल्कुल नहीं थे। उनका सरोकार देश, समाज, धर्म और परंपरा से होता था। उनका लिखना और बोलना भी उसी सरोकार का हिस्सा था, जिसके कारण उन्हें ‘सार्वजनिक बुद्धिजीवी’ की पहचान मिली। यह शब्द अंग्रेजी में सोचकर हिंदी में दिया गया है। इस जीवनी में इस शब्द को सुधारकर एक नया शब्द ‘लोकमुखी जीवन’ के रुप में प्रयोग किया गया है। इसे उनके जीवन की परिभाषा कह सकते हैं।’

लेखक का मानना है कि प्रभाष जोशी जैसे लोक-संबद्ध जीवन व्यक्तित्व की जीवन-गाथा के अनेक पड़ाव हैं। इस पुस्तक में पाठकों को उन पड़ावों का प्रमाणिक और विस्तृत वर्णन मिलेगा। पुस्तक में जहां लेखक प्रभाष जी के सार्वजनिक निर्भय सोच के संदर्भों को बेहतर ढंग से समझाने में सफल हुए हैं, वहीं उन्होंने जोशी जी के व्यक्तित्व जीवन के कई अनजाने प्रसंगों को भी बेबाकी के साथ रुचिपूर्ण भाषा शैली में पाठकों के सामने रखने का सफल प्रयास किया है।

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‘प्रभाष जोशी हिंदी के ऐसे अकेले संपादक हुए हैं, जिन्हें ‘इंडियन एक्सप्रेस’ को चंडीगढ़, दिल्ली और अहमदाबाद से निकालने और वहां जमाने का अनुभव था। इस प्रक्रिया से गुज़रकर उन्होंने ‘जनसत्ता’ अखबार निकाला, जिससे हिन्दी पत्रकारिता में नए युग की शुरुआत हुई।’

वे जनसत्ता में ‘कागद कारे’ काॅलम लिखते थे जो बेहद चर्चित हो चला था। उसे बार-बार पढ़ने का मन करता था और उनके शब्द जीवंत हैं। वे खुद की बात करते हुए समाज की बात करते हैं। वे खुद को जोड़ते हुए, खोलते हुए, उन भावनाओं को सपाट करते चलते हैं जिनसे जीवन चलता है। वे आगे चलते हैं, दूसरे उनका अनुसरण करते हैं। वे जमीन से जुड़ी बात करते हैं। उनके विचार दार्शनिक वाले हैं। वे दार्शनिक ही तो हैं।

‘कागद कारे’ में एक जगह उन्होंने लिखा:‘लेकिन सफलता की ऐसी-तैसी। सबसे बड़ा संतोष या सार्थकता यह कि इन चौंतीस साल में कभी ऐसी जगह काम नहीं करना पड़ा, जहां मन ही नहीं लगता। कभी अपनी मर्जी के खिलाफ नहीं लिखा, न किसी को लिखने के लिए मजबूर किया। पता नहीं, कौन कहते हैं और क्यों कहते हैं कि पत्रकारिता में भाड़े का टट्टू होना पड़ता है। जिन्हें होना पड़ता है, उनकी अपनी कोई चाल नहीं होती। होती हो तो उस पर चलने की हिम्मत और उसकी कीमत चुकाने को तैयारी होती। इसमें सब कुछ आ गया है, जिसे जीवन-दर्शन कहते हैं।’

प्रभाष जोशी का जीवन सार्वजनिक था। लोग उन्हें एक तरह से उतना ही जानते थे, जैसा वे थे। वे शब्दों से वास्तविकता की बात करते थे। उसमें बनावट की बात नहीं होती थी। उनका जीवन साफ पानी की तरह था क्योंकि वे स्पष्टवादी थे। समुद्र में उगी शैवाल को देखने के लिए पानी का आरपार होना जरुरी है। वे खुद भी समाज को एक आईना दिखाते थे। उनका स्वयं समाज था जिसे वे अच्छी तरह समझते और उसपर खुलकर बात करते तथा अपनी बात भी उसी तरह पहुंचाते। उनकी जीवनी का सार यह हो सकता है कि पत्रकार पहले आम आदमी होता है। उसकी जिम्मेदारी बड़ी है। वह जनकल्याण की बात करता है और मुखरता से हर समस्या को उठाता है। सही मायने में वह जनता की आवाज है।

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नई दुनिया, जनसत्ता जैसे अखबारों को मजबूत पहचान देने में प्रभाष जोशी का योगदान अतुलनीय था। उनकी पत्रकारिता की जड़ों तक समझ के कारण ही वे पाठक का नजिरया पढ़ने के महारथी थे, तो वहीं सत्ता पक्ष से सीधा मुकाबला करने का हौंसला भी था। वे कभी राजनीतिक शक्तियों के आगे नतमस्तक नहीं हुआ, बल्कि सिख दंगों और अयोध्या विवाद पर खुलकर लिखा।

उन्होंने लिखा: ‘राम की जय बोलने वाले धोखेबाज विध्वंसकों ने कल मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रघुकुल की रीति पर कालिख पोत दी।...वह धर्मस्थल बाबरी मस्जिद भी था और रामलला का मंदिर भी।’

लेखक ने लिखा है कि प्रभाष जोशी को इससे अधिक फर्क नहीं पड़ता था कि किसकी क्या राजनीति है। वे सबकी राजनीति समझते थे। ऐसे व्यक्तित्व कम ही मिलते हैं। आज के समय में ऐसे लोग लगभग गायब हैं जो पत्रकारिता को उतनी बारीकी से समझते हैं और उसके जनहित की बात पर जोर देते हैं।

वे खेलों के प्रति बेहद लगाव रखते थे। उनके साथ काम करने वाले मानते हैं कि महान क्रिकेटर कपिल देव उन्हीं की खोज हैं।

प्रभाष जी का जीवन किसी खुली किताब की तरह था। वे पन्नों पर तैर रहे शब्दों के ज़रिये अपनी बात सादगी और साफगोई से कह डालते थे।

‘लोक का प्रभाष’ में लेखक रामाशंकर कुशवाहा ने प्रभाष जोशी के जीवन परिचय को बेहद सरलता से लिखा है। बचपन के रोचक पहलुओं से लेकर प्रभाष जी के बारे में लेखक ने पत्रकारिता जीवन के दौरान घटी दिलचस्प घटनाओं का उल्लेख किया है।

‘स्वभाव से अक्खड़ होने के बाद भी प्रभाष जोशी दैनिक जीवन में बहुत शालीन थे। उन्होंने कभी अपने कद और रुतबे का दिखावा नहीं किया। दफ्तर जाने के लिए गाड़ी न आ पाए तो आॅटो से चले जाते थे। अपने साथ काम करने वालों की हर तरह से मदद करने के लिए तैयार रहते थे। कोई बीमार हो जाए तो उसकी तीमारदारी भी करवाने का प्रबंध करते और जबतक वह व्यक्ति पूरी तरह ठीक न हो जाए तब तक उसका ख्याल रखते थे।’

प्रभाष जोशी ने मास्टरी की, उन्होंने बढ़ई के साथ रंदा चलाया, चक्की से आटा पीसा, कहानी, कविता लिखीं। कहने को वे अलग किस्म के आदमी थे, मगर पत्रकार बनने के बाद उन्होंने उस क्षेत्र को विस्तारित किया।

पत्रकारिता को नये आयाम तक पहुंचाने में उनका योगदान हमेशा याद किया जाता रहेगा। वे एक के नहीं, सबके हैं; उनके विचार हर पीढ़ी पर असर डालते हैं। वे दिल की बात रखते थे, दिमाग से बात करते थे। तथ्यों की रेल नहीं बनाते हुए, सरलता से जटिलता को समझाने की कला भी जानते थे। वे साहित्यकार थे जो पत्रकारिता करता था और वे पत्रकार थे जो साहित्य को उसमें भी डुबो देना जानता था।

'लोक का प्रभाष' हमें प्रभाष जोशी के जीवन से जुड़े कई अनछुए पहलुओं से अवगत कराती है। उनके विचार और व्यवहार के बारे में इस पुस्तक में बहुत विस्तार से दिया गया है। उनकी छवि का स्पष्ट वर्णन किया गया है। उनके सामने बड़ा आदमी और छोटी आदमी एक समान था। वे हर किसी को बराबरी का मानते थे। उन्होंने इंसानियत की बात की।
इस पुस्तक की ख़ासियत इसके लेखक की शैली भी है जिसे पढ़कर अलग तरह का आनंद भी आता है. लेखक रामाशंकर कुशवाह ने सरल और प्रभावपूर्ण भाषा शैली के इस्तेमाल से इसे खूबसूरती से रची गयी जीवनी बना दिया है. उनकी एक विशेषता यह है कि वे अपनी बात कहने में घुमाव-फिराव को तवज्जो नहीं देते, बल्कि कम शब्दों में आसानी से कह देते हैं. उन्हें पढ़ना उनसे जुड़ना भी है. लेखक से जुड़कर हम प्रभाष जोशी को और करीब से जान पाए. इस पुस्तक को पत्रकारिता जगत से जुड़े हर किसी व्यक्ति को जरुर पढ़ना चाहिए. ख़ासकर युवाओं को उनके जीवन से सीख लेनी चाहिए. उनकी इस जीवनी के हिस्से छात्रों को पढ़ाये भी जाने चाहिए ताकि वे कलम की ताकत और उसकी वास्तविकता को जान सकें. 
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‘मैं मानता हूं कि हिन्दी गद्य के निर्माताओं का जब नाम लिया जायेगा और साहित्यकारों के नाम आएंगे तो उनमें निश्चित रुप से अगर पहला नहीं तो महत्वपूर्ण नाम प्रभाष जोशी का होगा. हिन्दी गद्यकार के रुप में वे याद किए जायेंगे.’ -नामवर सिंह.
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‘मैंने पाया कि प्रभाष जी एक कुशल संपादक के अलावा बड़े सजग नागरिक भी हैं और समस्याओं के प्रति उनका दृष्टिकोण हमेशा सकारात्मक रहा है. वे हर समस्या के उचित समाधान की राह खोजने की कोशिश करते हैं.’ -बी.जी. वर्गीज.
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‘प्रभाष जोशी ने ‘जनसत्ता’ को हिन्दीभाषी बुद्धिजीवियों का चिंतन-मंच और जातीय प्रवक्ता बना दिया. ऐसे लेखकों का एक मंडल तैयार किया जिससे सामयिक और गंभीर राजनीतिक, सांस्कृतिक समस्याओं पर सक्षम गद्य की आंतरिक क्षमता का विकास हुआ.’ -विश्वनाथ त्रिपाठी.
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‘प्रभाष जोशी को हमेशा इसलिए याद किया जायेगा क्योंकि वे हर समय किसी मिशन पर लगे होते थे. वे पत्रकारिता के ऐसे शिखर थे जो गांधी और विनोबा से प्रेरित थे. उन्हें भारतीय संस्कृति की गहरी समझ थी.’ -एच.के. दुआ.
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‘जब वह कम पैसा पाते थे तब भी मन राजा जैसा ही था. आयोजनप्रिय, उत्सवप्रिय. मतलब कि फटी बनियान और फटी धोती में भी वही आनन्द लिया जो बाद में महंगे कपड़ों में लिया होगा.’ -अनुपम मिश्रा.

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 रामाशंकर  कुशवाह ने बनारस हिन्दू विश्विद्यालय से स्नातक किया है. पी.एच.डी. दिल्ली विश्वविद्यालय से की है. दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक कार्यरत हैं.
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'लोक का प्रभाष’
लेखक : रामाशंकर कुशवाहा
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ : 328
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