बहुत काम की है ‘बातें बेमतलब’ : हास्य व्यंग्य का बेमिसाल मसाला

एक-एक शब्द को सरल, सजग और बोधगम्यता के रुप में जिस तरह हास्य प्रधान बनाया वह दुर्लभ है.

बातों की शक्ल हमें याद नहीं रहती। बातों की अक्ल वाली बात हमें याद रह जाती है, कभी भूल जाते हैं। जब बातें बेमतलब की हों तो भी यही हाल हो सकता है। वहीं जब बेमतलब की बातें मतलब की बात करें तो सबकुछ याद रह सकता है। बशर्ते बातें करने वाला अपनी बात कहना जानता हो।

अनुज खरे द्वारा लिखी किताब ‘बातें बेमतलब’ व्यंग्य लेखन के क्षेत्र में एक ऐसा प्रयास है जिसे पढ़कर नीरस और उदास व्यक्ति भी तारोताजा होकर मुस्कराने और खिलखिलाने को मजबूर हो जायेगा। वास्तव में पुस्तक का शीर्षक भी व्यंग्य की अद्भुत शैली का प्रमाण है। यहां संपूर्ण लेखन बेमतलब की बात को बहुत मतलब की बात के साथ आगे बढ़ाता है।

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भूतटाइप विषय उठाकर लेखक ने यूथटाइप किताब लिख मारी है, जिसमें जुमलों की काॅइल, मवाली सी इस्टाइल, भाषा की गुलेल, नए विषयों का खेल खेला गया है। ये पढ़ने वाले के दिमाग में बवंडर, दिल में थंडर उठाकर रहेगा। अमेरिका की हवस में पागल टेकीज़ के लिए चायनीज़ ज्ञान पटका है। चले तो चांद तक नहीं तो शाम तक। एच-1 वीज़ा की आग में जलते बंदों के ज़मीर का खमीर उठाया है। अंग्रेज़ी की टांग तोड़ने ‘डैशिंग’ पीसों को लंगड़ा बनाया है। क्रांति करने को उतारु सज्जनों की कमीनता बताई है। हर बात पर ‘हां जी’ कहते हराम... की हैवानियत दिखाई है। चपटी नाक से हिमेश से रुबरु करवाया है। ‘तुझे देखा तो ये जाना सनम...’ गाने से लड़की नहीं पलटती है, इस अध्यात्म से भी मिलवाया है। दिल में दो किलो दर्द हो तभी हो सकती है सेटिंग, नहीं तो खाली एफबी पर चैटिंग से कुछ नहीं होता - जैसी हकीकत बयां की है। खुल्ला लिख डाला है कि बोलने से कोई बाबा नहीं होता है और धमकी देने से कोई दादा नहीं होता। ऊंट जब पहाड़ के नीचे आता है तो सेल्फी नहीं ले पाता अर्थात् गांधी के पथ पर चलने से कोई महात्मा नहीं हो जाता। उन लोगों के दिमाग में झंझावात चलाया है जो टेंशन में लगे हैं। ऐसी ही ‘बेमतलब की बातों’ से ज़िंदगी का सार निकाला है, फिर लोगों से उम्मीद भी की है कि इनका सार पकड़कर ज्ञानी हो जाएं। दूसरों का भेजा खाएं। मच्छरों का माइकल जैक्सन बन जाएं। डांस करें और ड्रामा दिखाकर बड़े आदमी हो जाएं।

हास्य व्यंग्य के नाम पर आजकल बहुत-कुछ लिखा जाता है और बहुत कुछ छपता है, लेकिन वह एक निर्जीव और बचकाना ही लगता है। 160 पृष्ठों की इस पुस्तक में लेखक ने 36 विषयों पर अलग-अलग खंडों में पृथक-पृथक शीर्षकों से जिस प्रकार सटीक-व्यंग्यात्मक हास्य को जन्म दिया, वह एक विलक्षण तथा बहुत ही ठोस शैली है। हर बार विषयानुसार या कहें संदर्भगत एक अलग तथ्य को भिन्न वैचारिकता के साथ खूबसूरत आनन्द मिश्रित हास्य-व्यंग्य में सफलता के साथ शब्दजाल में बांधें रखा है।

एक-एक शब्द को सरल, सजग और बोधगम्यता के रुप में जिस तरह हास्य प्रधान बनाया वह दुर्लभ है। ये बेमतलब की बातें एक गूढ़ मतलब रखती हैं। पहले खण्ड से ही लेखक अपने ऊपर व्यंग्यात्मक लांछनों के साथ पाठक का मनोरंजन करते हुए आगे बढ़ता है। पूरी पुस्तक पढ़कर पता चलता है कि लेखक के लपेटे में कहां-कहां कौन आता है तथा किस प्रकार पाठकों के स्वस्थ मनोरंजन का कारक बनता है।

अनुज खरे ने हर उस आदमी की बात की है जो आम जीवन से जुड़ा है। उन्होंने प्यार से लेकर मोबाइल पर चुटकी ली है। उन्होंने फिल्मों से लेकर राजनीति की बात कर डाली है। उन्होंने हर वह बात कर डाली है जिसका मतलब होता है और जिससे हर कोई प्रभावित होता है।

लेखक ने देहाती लव को 'जेहाद' बताया है। उन्होंने बुद्धिजीवी की परिभाषा बेहद मजेदार तरीके से दी है।

'विचार' के बारे में अनुज खरे लिखते हैं :'विचारों की उड़ान को स्पेस के कैंची मारकर धड़ाम से ज़मीन पर गिरा दिया जाता है। फिर बेचारा घायल विचार फड़फड़ाता रहता है। घायल विचार किसी का ध्यान खींच पाते हैं भला!'

मायके गयी पत्नी को लिखा 'भैरंट पत्र' पढ़िए तो आनंद आएगा। 'यारां दा ठर्रापना' में अनुज खरे ने 'नाग-नागिन डांस' का मजेदार तरह से ज़िक्र किया है और बारात का भी।

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नेताओं के बारे में एक जगह अनुज लिखते हैं : 'पहले नेता टुच्ची-सी राय भी रखते थे तो पब्लिक उसमें भी बुद्धिमानी तलाश लेती थी। अब तो हर बात में मुश्किल है क्योंकि विपक्ष पूरी तरह से हरामीपने पर उतरा हुआ है। ज़रा-सा आरोप लगाओ तो वे भी आपके ख़िलाफ़ ज्यादा सच्चे आरोप ले आते हैं।'

पुराने दिनों को याद करते हुए कस्बे के कवि सम्मेलनों के बारे में अनुज खरे ने लिखा है : 'कहीं से जोड़जाड़ के सात-आठ कविवर पकड़ लिए, बस कवि सम्मेलन रेडी टू स्टार्ट। जनता में ऐसे कवि काफ़ी पॉपुलर थे। सालभर की मार-पिटाई, गाली-गलौच का कोटा एक बार में पूरा कर लिया जाता था। बाजूवाले से बहस, पीछेवाले से लड़ाई, दोनों ही मौके नहीं मिले तो आयोजकों को ही लपका दिया। इस सारे अवसरों के हाथ नहीं आने की स्थिति में कवि तो हैं ही, वे कहां बच पाएंगे।'

पुस्तक में अध्याय छोटे होने के साथ-साथ रोचक और सोच-समझ से भरे पड़े हैं जिन्हें लेखक ने व्यंग्य की चाशनी में जी भर कर डुबोया है और जिसे पाठक भी चटकारे लेकर पढ़ने को मजबूर होगा।

जिंदगी को सिखा रहे हैं अनुज खरे, और हमें यह भी बता रहे हैं कि मजेदार बातों के पीछे कड़वापन भी होता है। कुछ सच्ची बातें :
🔲 ग़लतफ़हमी के 'वायरस' से बचाने वाला मां-बाप या क़रीबी दोस्तों वाला 'एंटी वायरस' 'हम-तुम' वाली ज़िंदगी के सॉफ्टवेयर में अपलोड ही नहीं किया जा रहा है. नतीजे रिश्ते 'करप्ट' हो रहे हैं. अविश्वास का 'स्पैम' भारी पड़ रहा है.
🔲 विकास की राह में दलाली के कीटाणु फैलते हैं. लोग बीमार होते हैं. विकसित हो-होकर स्वर्ग सिधारते रहते हैं. इतने बावजूद भी सरकार योजनायें बनाने से पीछे नहीं हटती.
🔲 इलेक्शन तो ईश्वरत्व के लिए ही चुनौती दिख रहा है. फिर विचारधारा तो हमेशा से सर्वहारा के उत्थान की रही है.
🔲 कई मनुष्यों में पहनने की जीन्स के अतिरिक्त किसी चीज़ में टाइटनेस नहीं पाई जाती है. इसलिए तो कैरेक्टर भी एक्स्ट्रा लूज़ ही होते हैं.
🔲 कई बंदों में तो सुसाइडल इंडीकेशन केवल इसी बात पर भी मिलने शुरू हो सकते हैं कि साढ़े सत्रह मिनट तक कोई फ़ोन या अलर्ट या मैसेज नहीं आया है.
🔲 किसी दिन मौका देखकर ज़िंदगी के कंप्यूटर को 'रीबूट' कीजिए न! कुछ बचपने वाली फ़ाइलें डाउनलोड कीजिए न! अच्छे पलों को हर बार सेव कीजिए न!
🔲 जीवन में मॉल कल्चर के साथ मां-बाप को भी 'एंटर' कीजिए न!

यकीनन अनुज खरे की पुस्तक ‘बातें बेमतलब’ आपको गुदगुदायेगी, गंभीर चिंतन करायेगी और ऐसे संसार में ले जायेगी जहां आप बेफिक्री से रोजमर्रा की बातों का लुत्फ ले सकते हैं। यह हास्य व्यंग्य का बेमिसाल मसाला है जिसे बार-बार पढ़ा जा सकता है।

'एक बार दुनिया जहान की बातों को 'शटडाउन' करके इन बातों पर गौर करके तो देखिये, आपके रिश्तों की 'बैटरी' हमेशा 'फुलचार्ज़' दिखाएगी सच मानिए...!

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अनुज खरे ने ढेर सारे व्यंग्य लिखे हैं. दो व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं. उनके द्वारा लिखा नाटक 'नौटंकी' का कई शहरों में मंचन हो चुका है. उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हैं. अनुज खरे दैनिक भास्कर डॉट कॉम के संपादक हैं.
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'बातें बेमतलब’
लेखक : अनुज खरे
प्रकाशक : मंजुल प्रकाशन
पृष्ठ : 162
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