महाभारत का रहस्य : किताब अंश

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"संसार महाभारत को तो जानेगा लेकिन उस भयानक रहस्य का उसे कभी पता नहीं चलेगा जिसे यह ग्रंथ छिपाए हुए है."

ईसा पूर्व 244

सम्राट अशोक और उनके दरबारी सूरसेन पहाड़ी पर, जंगल की गहराई में, अँधेरी खुली जगह में खड़े हुए थे। उनके पहाड़ी पर पहुँचने से पहले उनके साथ के थोड़े-से सैनिक पीछे छूट चुके थे। यह दल इस खोज के निरीक्षण के सूरसेन के ख़ुफ़िया अभियान के बाद दस दिन पहले पाटलिपुत्र से चला था।

सूरसेन का प्रतिवेदन सुनने के बाद अशोक ने गुफा और उसके अंदर की चीज़ों को ख़ुद अपनी आँखों से देखने का आग्रह किया था और तुरंत पाटलिपुत्र से चल देने का फ़ैसला किया था। अपनी खोज की अहमियत को समझते हुए सूरसेन सम्राट को गुफा में ले जाने के लिए राज़ी हो गया था।

अशोक और सूरसेन ने गुफा के अंदर जाते गलियारे में प्रवेश किया।

सम्राट उस हलकी, मद्धिम रोशनी को आश्चर्य से देख रहे थे जो गलियारे से गुज़रते हुए उनके चारों ओर झिलमिला रही थी। लेकिन जब अंदर पहुँचने पर उसने गुफा पर निगाह डाली तो उनके विस्मय का ठिकाना न रहा।

बावजूद इसके कि सूरसेन ने सम्राट को इसके लिए पहले से ही तैयार कर दिया था, सम्राट अशोक कुछ पल तक स्तब्ध खड़े मंत्रमुग्ध होकर उस दृश्य को देखते रह गए जो उनके सामने था।

इस शुरुआती विस्मय पर किसी तरह क़ाबू पाने के बाद अशोक ने ख़ामोशी से गुफा का चक्कर लगाते हुए उसके एक-एक अंगुल का मुआयना किया।

तब जाकर वह दूसरी खोज उनके हाथ लगी। एक इस क़दर भयावह रहस्य कि अशोक को लगा कि वह हमेशा के लिए दफ़न रहता तो बेहतर होता - एक ऐसा रहस्य जो दुनिया को तबाह कर सकता था।

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ईसा पूर्व 242

सूरसेन राजमहल के प्रांगण के बीचोंबीच छाल-पत्र पर अंकित पांडुलिपियों के उस ढेर के सामने खड़ा था। उसने इस जगह का चुनाव इसलिए किया था कि यह राजमहल का एक पुराना, सुनसान हिस्सा था, अशोक के दादा चंद्रगुप्त के ज़माने का। बहुत कम लोग थे जो यहाँ आने का साहस करते थे, अन्यथा लोग अशोक द्वारा बनवाए गए राजमहल के नए हिस्सों के वातावरण को ही पसंद करते थे।

वह अपनी बग़ल में खड़े कातिब की ओर मुड़ा, जो दुखी भाव से उन पांडुलिपियों का निरीक्षण कर रहा था। वे सारी पांडुलिपियाँ महाभारत की प्रतिलिपियाँ थीं जिनको पिछले दो सालों के दौरान समूचे राज्य से इकट्ठा किया गया था। गुफा के रहस्य को छिपाने की अपनी योजना का निश्चय करने के बाद उसने अपना ध्यान उस रहस्य के उद्गम की ओर मोड़ा था।

महाभारत।

क्योंकि, इस महान महाकाव्य के पन्नों के भीतर ही अशोक की खोज के पीछे का क़िस्सा छिपा हुआ था; वह क़िस्सा जिसको अशोक ने, उस रहस्य के साथ, हमेशा-हमेशा के लिए दफ़न कर देने का फै़सला किया था; ताकि वह उनकी प्रजा की स्मृति से लुप्त हो जाए।

शाही दूतों को राज्य के सुदूर कोनों तक भेजा गया था ताकि वे महाकाव्य की उस एक-एक पांडुलिपि को लेकर आएँ जो अस्तित्व में थीं।

“बस यही है?“ सूरसेन ने कातिब से पूछा। ”एक-एक पांडुलिपि?”

कातिब ने हामी में सिर हिलाया, उसका दिल भारी हो रहा था। वह जानता था कि आगे क्या होने वाला था।

सूरसेन ने आदेश दिया। ”उन्हें जला दो।“

उसने राजमहल की दीवार से एक मशाल खींची और आग लगा दी। सूखे भूर्ज-पत्रों की उन पांडुलिपियों ने तुरंत ही आग पकड़ ली और कुछ ही पलों में सारा ढेर लपटों में समा गया।

कातिब के हलक़ से एक दबी हुई-सी सिसकी निकली। उसने शाही फ़रमान की तामील की थी, लेकिन यह बात उसे समझ में नहीं आई थी।

सिर्फ़ सूरसेन ही जानता था; जैसेकि उसके साथ के आठ अन्य दरबारी जानते थे। उन सबों ने अशोक के सामने उस रहस्य को गुप्त रखने की सौगंध ली थी।

आग की लपटों द्वारा पांडुलिपियों को निगलते देखते हुए उसके दिमाग़ में उस यादगार रात में सम्राट की ज़ुबान से निकले हुए शब्द गूँज उठे।

”इस मिथक को इंसान की जानकारी से ग़ायब हो जाना चाहिए, उस रहस्य के साथ जिसका ज़िक्र इसमें किया गया है। संसार महाभारत को तो जानेगा लेकिन उस भयानक रहस्य का उसको कभी पता नहीं चलेगा जिसे यह ग्रंथ अपनी अंदरूनी गहराई में छिपाए हुए है।“

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500 ईसवी

राजवीरगढ़ 

पाल ने लड़के को एक सिक्का दिया। ”इसके पहले कि किसी को तुम्हारे इरादे का पता चले, भाग जाओ।“

लड़का उस इनाम से रोमांचित होकर भाग खड़ा हुआ।

पाल सोच में डूबा हुआ मुड़ा। तो, शिलालेख का पता चल गया था और उसकी कहानी और भ्रातृसंघ के बीच के रिश्ते को ढूँढ़ लिया गया था।

कोई था जो भ्रातृसंघ के बारे में जानता था।

कोई था जो उसके बारे में जानता था।

और वे उसकी जान लेने आ रहे होंगे।

उसने फुर्ती से अपनी चीज़ों को इकट्ठा किया। वे थोड़ी-सी थीं। लेकिन ये वे नहीं थीं जिनको लेकर वह परेशान था। वह भ्रातृसंघ के कहीं ज़्यादा बड़े ख़ज़ानों का संरक्षक था; वे ख़ज़ाने जो अब राजवीरगढ़ में महफ़ूज़ नहीं थे। उसे मालूम था कि उसको ठीक किस जगह जाना होगा।

उत्तर-पश्चिम की दिशा में कई मील दूर, बामियान में, एक छोटे-से मठ में, भ्रातृसंघ के दो सदस्य रहते थे जिनको वह जानता था; संथाल, एक भिक्षु।

उसको पांडुलिपियाँ और धातुई चकती संथाल तक ले जानी थीं। यही वह चीज़ थी जिसपर उसने तब सहमति दी थी जब वह भ्रातृसंघ में शामिल हुआ था। संथाल उन दो सदस्यों में से एक था जिसने अपनी असली पहचान पाल के सामने उजागर की थी। वे इस शपथ से बँधे हुए थे कि उन दोनों में से जो भी व्यक्ति रहस्यों के लिए ज़िम्मेदार होगा वह उन रहस्यों पर किसी भी तरह का कोई संकट आने की स्थिति में उन्हें दूसरे तक पहुँचाएगा।

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पाल चुपचाप महल से निकलकर महल के पीछे के जंगल में ग़ायब हो गया। उस जंगल की गहराई में एक कुदरती गुफा में वे पांडुलिपियाँ और वह धातुई चकती छिपी हुई थी जिनकी अपने जीवन को दाँव पर लगाकर रक्षा करने की उसने शपथ ली हुई थी। उसने सँजोकर रखी गई उन चीज़ों को चमड़े के जर्जर थैले में भरा और उसको अपनी गर्दन में लटका लिया।

एक गहरी साँस लेते हुए वह गुफा से बाहर आया और उस लंबी यात्रा पर चल पड़ा जो उसको बामियान तक ले जाने वाली थी।

और उसकी मौत तक।

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मार्च 2001

संसार भर के टेलीविज़न की ब्रेकिंग न्यूज़

”तालिबान ने बामियान बुद्ध को ध्वस्त कर दिया है।“

समाचार उद्घोषक के चेहरे की जगह एक दूसरे वीडियो ने ले ली, उसकी आवाज़ सुनाई देती रही। ”तालिबान द्वारा कुछ घंटों पहले जारी किए गए इस वीडियो में उन दोनों मूर्तियों को बम से उड़ाए जाते दिखाया गया है। 1500 साल पुरानी इन मूर्तियों के विनाश पर दुनिया भर के पुरातत्ववेत्ताओं, इतिहासकारों और लोगों ने अपना ख़ौफ़ ज़ाहिर किया है।“

”इसमें कोई शक नहीं कि इन प्राचीन मूर्तियों का विनाश बेहद विचलित करने वाला है। लेकिन अकादमिक दुनिया के लोग उस चीज़ को लेकर काफ़ी उत्तेजित हैं जो इस विनाश से सामने आई है। तालिबान द्वारा जारी किए गए टेप साफ़ तौर पर उन गुफाओं को दर्शाते हैं जिनका खोखल टीलों पर बुद्ध मूर्तियों के पीछे उभर आया है। पिछले 1500 सालों से दो मूर्तियों के पीछे छिपी रही ये गुफाएँ अपने में क्या छिपाए हुए हैं? यह वह सवाल है जो आज के पुरातत्त्ववेत्ताओं और इतिहासकारों के मन में बना हुआ है।“

”बामियान स्थित अपने संवाददाता से हमें ऐसी अपुष्ट सूचनाएँ भी मिल रही हैं कि एक गुफा से एक कंकाल भी मिला है। यह कंकाल 1500 साल पुराना प्रतीत होता है। फ़िलहाल आगे की कोई जानकारी नहीं आ रही है।“

क्रिस्टोफर सी. डॉयल ने सेंट स्टेफन्स कॉलेज, दिल्ली से अर्थशास्त्र में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है. IIM कोलकत्ता में बिज़नेस मैनेजमेंट का अध्ययन किया है. उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.
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'महाभारत का रहस्य
लेखक : क्रिस्टोफर सी. डॉयल
अनुवाद : मदन सोनी
प्रकाशक : मंजुल प्रकाशन
पृष्ठ : 240
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