‘सलाखों के पीछे’ की असली ज़िंदगी को महसूस कराने वाली किताब

यह एक जरुरी किताब की तरह है जिसे पढ़ना सलाखों के पीछे की ज़िंदगी को महसूस करना है.
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जेल की दीवारों के बीच बसी दुनिया की दर्दनाक दास्तानों की हकीकत को बयान करने वाली किताब है ‘सलाखों के पीछे’। जेलों के बीच कई बेकसूर और कसूरवार, अमीर तथा गरीब लोगों की ज़िंदगी जीने में क्या अंतर है? क्या अपराधियों का सुधार घर ये जेलें अथवा पहले ही अन्याय का शिकार कई बेकसूर भी इन जेलों में घूस कर दूसरे अन्यायों का शिकार होने को मजबूर किये जा रहे हैं? इस तरह के कई सवालों का जवाब इस पुस्तक की लेखिका सुनेत्रा चौधरी ने जेल जीवन का अनुभव करने वाले कई पूंजीपतियों, नेताओं, हाई प्रोफाइल अपराधों से जुड़े आरोपियों और कई बेकसूर भुक्तभोगियों से साक्षात्कार के बाद तलाशने का प्रयास है। पुस्तक पढ़ने से हमारे देश की पुलिस, खुफिया एजेंसियों तथा कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया को संचालित करने वाली शक्तियों की खामियों का भी पता चलता है।

कई बड़े लोगों, जिनकी शोहरत, धन-बल और राजनीतिक ताकत जेलों से बाहर जितनी शक्तिशाली होती है वह जेल की सलाखों में भी वही रंग-ढंग से चलती है। बड़े-बड़े अपराधी भी जेलों में हर तरह की सुविधाओं का भोग करते हैं। जबकि छोटा अपराधी वहां पूरी तरह नारकीय जीवन जीने को मजबूर होता है।

‘सलाखों के पीछे: भारत के प्रसिद्ध लोगों के जेल से जुड़े किस्से’ पुस्तक को मंजुल प्रकाशन ने हिन्दी में प्रकाशित किया है। इसे टीवी पत्रकार सुनेत्रा चौधरी ने लिखा है। सुनेत्रा दो दशक से पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं। यह किताब ‘Behind Bars - Prism Tales of India's Most Famous’ का हिन्दी अनुवाद है जिसे रोली बुक्स ने प्रकाशित किया था। हिन्दी अनुवाद मदन सोनी ने किया है।

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सुनेत्रा चौधरी के लिए यह किताब अलग अनुभव रहा। वे लिखती हैं:‘शुरुआत में लोगों का मुंह खुलवाने में मुश्किल पेश आई। मसलन, डासना जेल में राजेश और नूपुर तलवार ने अपने को जीवित बनाए रखने का एक तंत्र तैयार कर लिया था। जेल में सुपरिटेंडेंट के कमरे में उनसे हुई मुलाकात के दौरान जिन बहुत-सी चीजों में एक चीज़ ने मुझे चौंकाया, वह बहुत ही अच्छी तरह से इस्तरी किये हुए उनके कुर्ते थे। वे दोनों ही अपनी कमसिन बेटी आरुषि की हत्या के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी कैद में बिताने की संभावना से स्तब्ध थे, लेकिन उनको अपने कपड़ों की धुलाई और इस्तरी की चिंता करने की जरुरत नहीं थी। न ही दोनों में किसी का वज़न ही कम हुआ था, बावजूद इसके कि तब तक वे एक साल से ज्यादा का वक्त डासना में बिता चुके थे। यह चीज़ मेरे मन में हमेशा कौतूहल जगाती थी। प्रभावशाली लोगों के लिए यह कैसे मुमकिन हो पाता था कि जेल में रहने के बावजूद वे अलग नहीं दिखे थे?’

लेखिका को भी हैरानी होती होगी जब वे अलग-अलग तरह के लोगों से सलाखों के पीछे मिलती होंगी या उनके बारे में जानकारी करती होंगी। हालांकि वे पत्रकार हैं और उनका आमना-सामना हर तरह के लोगों से होता रहता है, मगर जेल में बंदियों से इस तरह वे पहली बार मिलीं। इसमें सबसे हैरानी वाली बात यह रही कि उन्होंने बहुत बारीकी से जेलों के पीछे कैद जिंदगी का अध्ययन किया जिसके बाद वे कई नतीज़ों पर पहुंची जिनसे यह किताब मुमकिन हो पायी।

दिलचस्प यह बन जाता है कि कैद ज़िंदगी खुले आसमान में उड़ती ज़िंदगी से किस तरह अलग होती है या कुछ लोगों के लिए इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता कि वे कहां हैं? वे जहां रहेंगे वहां उनकी मौज रहने वाली है क्योंकि उनका रसूख ही ऐसा है। तो क्या पैसा और रसूख आदमी को दोनों जगह एक तरह का जीवन जीने का मौका देता है? ऐसे कई सवाल हैं जिनसे सुनेत्रा चौधरी दो चार हुईं। उनका अंर्तमन भी कई बार जरुर उथलपुथल के दौर में गया होगा जब उन्होंने अपनी आंखें विस्मय से बड़ी की होंगी और उन आम कैदियों की ज़िंदगी को भी करीब से जाना होगा।

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लेखिका ने सबसे अच्छा उदाहरण सुब्रत राय सहारा का दिया है जिन्होंने तो ‘इतिहास’ ही रच डाला। वे तिहाड़ जेल के इतिहास में पहले बंदी रहे जिन्हें एसी की सुविधा मिली हुई थी। सुनेत्रा लिखती हैं:‘चाहें आप ए. राजा हों, पप्पू यादव रहे हों, मनु शर्मा रहे हों या संजीव नंदा रहे हों, ऐश के नाम पर आपको कूलर, टाइलों वाला फर्श और आपकी अपनी निजि कोठरी ही मिल सकती थी जिसमें आप अपना बिस्तर डाल सकते थे। लेकिन अदालत ने रॉय को वीडियो कॉन्फ्रेंस सुविधा के इस्तेमाल की छूट दी हुई थी। उनको जेल नंबर 1 के 9 नंबर वार्ड से तिहाड़ जेल की पुरानी इमारत में भेजा गया। उसमें बैठक और कॉन्फ्रेंस के कक्ष थे और क्योंकि वह एक कार्यालय जैसा था, इसलिए उसमें एयरकंडीशनर की सुविधा भी थी। ‘यहां तक कि जब इंदिरा गांधी को यहां रुकना पड़ा था तब उनको भी यह सुविधा हासिल नहीं हुई थी।’’

अमर सिंह की अनसुनी बातों को पढ़कर कोई भी चौंक सकता है। कभी वे बच्चन परिवार के बेहद करीबी हुआ करते थे और जब अमिताभ बच्चन की कंपनी दीवालिया होने वाली थी तो वे अमर सिंह थे जिन्होंने उनकी वित्तीय मदद की। यह कभी न भूलने वाला एहसान था। मगर जब अमर सिंह जेल गये तो रिश्ते वैसे नहीं रहे। हवा बदल गयी और अमर सिंह ‘इस बात के लिए बच्चन को माफ नहीं कर सकते।’

‘जैसाकि अमर सिंह कहते हैं, अंबानी लोग, बच्चन लोग, ‘इट क्राउड,’ सब ‘भाप बनकर उड़ गए’ और सबसे गहरी चोट ये थी कि उनके बीआईपी डॉक्टर पद्मश्री प्राप्त नेफ्रोलाॅजिस्ट डॉ. रमेश कुमार ने भी उनसे किनारा कर लिया।’

जयाप्रदा ही ऐसी रहीं जो अमर सिंह के साथ हर मोड़ पर खड़ी रहीं। सुनेत्रा चौधरी अमर सिंह के हवाले से लिखती हैं:‘जब बच्चनों से, अंबानियों से सहाराओं तक कोई कहीं नज़र नहीं आ रहा था, वह (जयाप्रदा) एकमात्र पहचाना हुआ चेहरा था जो आगे आया और उनकी सांसद की हैसियत के चलते उनको कुछ विशेष सुविधाएं मिल सकीं।’

अंका वर्मा और अभिषेक वर्मा का किस्सा भी दर्ज है। इसमें बॉलीवुड अभिनेता राजपाल यादव का भी जिक्र है जिन्होंने अभिषेक के बाहर आने पर अंका के साथ मिलकर मौर्या शेरेटन में बुखारा रेस्तरां में रिहाई का जश्न मनाया। सुनेत्रा चौधरी लिखती हैं:‘राजपाल ने जेल में 10 दिन बिताए थे। अभिषेक ने उसके दिनों को आरामदायक बनाया था। इसीलिए वह उसकी रिहाई पर हवाई यात्रा कर उससे मिलने आया था। कारावास में होने की यही खासियत है - वहां जो रिश्ते और स्मृतियां आप रचते हैं, वे ज़िंदगी भर आपके साथ बने रहते हैं।’

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रहमाना की कहानी पढ़कर आप भावुक हो सकते हैं। सुनेत्रा ने यह कहानी सुनाकर किताब में और जान डाल दी है। रहमाना के शब्द देखें:‘मेरी रुख़सत अभी तक नहीं हुई थी। एक तरह से मेरी विदाई जेल में हुई। मेहंदी नहीं, उन्होंने मेरे हाथों में कालिख पोती।’

सुनेत्रा ने लिखा है:‘सालों जेल में गुजारने के बाद आपकी ज़िंदगी कभी पटरी पर वापस नहीं लौटती। रहमाना अभी भी उस एक कमरे के किराये के मकान में रहती है। उसने भले ही अपने आपको बेदाग साबित कर लिया है लेकिन अब मुरादाबाद वापस नहीं जा सकती। ये पाकिस्तान में रहने वाले आरिफ का परिवार था जिसने उसके लिए और आरिफ के लिए वकील की फीस चुकाई थी, और इसलिए अब कई ऐसे रिश्ते हैं जिनमें वह उसके साथ साझा करती है।’

‘जब कभी उसको अपने परिवार की याद आती है तो वह मुरादाबाद चली जाती है या वे लोग उसके पास आ जाते हैं। इस आतंकवादी की दुल्हन की ज़िंदगी की एक ही मुहिम है -अपने पति को ‘आतंकवादी’ होने के कलंक से छुटकारा दिलाना। या कम-से-कम मौत की सज़ा से छुटकारा दिलाना।’

सुनेत्रा चौधरी ने इस पुस्तक से साबित किया है कि कैदी होना कलंक है। आम कैदी ज़िंदगी की कड़वी सच्चाई से रुबरु होते हैं। जाने कितने लोग बेकसूर होने के बाद भी सलाखों में जीवन काटने को मजबूर हैं। सलाखों के पीछे जिंदगी मौत से बदतर हो जाती है।

2जी घोटाले में पूर्व केन्द्रीय मंत्री ए. राजा को जेल में रहना पड़ा। पिछले दिनों वे आजाद भी हो गये। सीबीआई की आदलत ने उन्हें दोषमुक्त करते हुए कह दिया कि कोई घोटाला ही नहीं हुआ। किताब में ए. राजा के निजि जीवन के हिस्सों को बारीकी से लिखने की कोशिश की गयी है। 2जी ने यूपीए सरकार को सत्ता से बेदखल करने में अहम भूमिका निभाई थी।

कभी स्टार न्यूज़ के सीईओ रहे पीटर मुखर्जी और उनकी बीवी इंद्राणी मुखर्जी की दिलचस्प कहानी को सुनेत्रा चौधरी ने इस पुस्तक में संजोया है। सौतेली बेटी शीना के मर्डर की दास्तान के अनछुए पहलुओं को आप यहां पढ़ सकते हैं।

पीटर मुखर्जी किताब में एक जगह कहते हैं:‘जेल का अनुभव अच्छा नहीं है, ये बहुत सख्त है और ज्यादातर लोग उसको कभी भी दोहराना नहीं चाहते। हालांकि ये कहना सही है कि जेल का जीवन आपको सही विवेक देता है और इस बात का अहसास भी कराता है कि आपके सच्चे हितैषी कौन हैं और कौन ऐसे लोग हैं जो वाकई कभी आपके दोस्त नहीं थे।’

किताब को पढ़कर ऐसा लगता है कि जैसे ज़िंदगी की कोई कीमत नहीं होती। पुलिस के कई चेहरे भी सामने आते हैं जिन्हें पढ़कर आप अमानवीयता का पता लगा सकते हैं।

वाहिद की कहानी भी दिल दहला देने वाली है। वह कई साल के बाद जेल से बाहर आया। साथ ही एक किन्नर बार डांसर की कहानी जिसके साथ पुलिस हिरासत में सामूहिक बलात्कार हुआ। न्याय की आस हर किसी को है। ऐसा न्याय जो उन्हें मिलना चाहिए था।

किताब का आखिरी किस्सा सामाजिक कार्यकर्ता कोबाड गांधी का है। वे 70 साल के होने को हैं और जेल में इंसाफ का इंतजार कर रहे हैं। वे लंदन से सीए किये हुए हैं और पुस्तकें पढ़ने में समय बिता रहे हैं। वे जेल कैसे पहुंचे और वहां क्या-क्या होता है, उसकी वास्तविकता उनकी चिट्ठियों से हो जाती है जो वे अपने मित्र को हर सप्ताह लिखते हैं। सुनेत्रा ने उनके जरिये जेल की ज़िंदगी को समझने में हमारी मदद की है।

लेखिका ने एक ऐसा दस्तावेज तैयार किया है जिसे संग्रह कर रखा जा सकता है। यह एक जरुरी किताब की तरह हो गयी है जिसे पढ़ना सलाखों के पीछे की ज़िंदगी को महसूस करना है।

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‘‘सलाखों के पीछे: भारत के प्रसिद्ध लोगों के जेल से जुड़े किस्से’
लेखिका : सुनेत्रा चौधरी
अनुवाद : मदन सोनी
प्रकाशक: मंजुल प्रकाशन
पृष्ठ: 260
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