सहेला रे : संगीत की अनूठी यात्रा पर ले जाने वाला खूबसूरत उपन्यास

यह उपन्यास हमें किसी खुबसूरत धुन को महसूस कराता है, गौर से पढ़ेंगे तो संगीत की अलग दुनिया को पढ़ेंगे.
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मृणाल पाण्डे का उपन्यास ‘सहेला रे’ हमें एक अलग ही यात्रा पर ले जाता है। शीर्षक की सटीकता उपन्यास पढ़कर स्पष्ट हो जाती है। राजकमल प्रकाशन के उपक्रम राधाकृष्ण पेपरबैक्स ने इसका प्रकाशन किया है।

संगीत के सुर-ताल जिस तरह सुनने वालों को भाव-विभोर कर देते हैं, उसी तरह यह उपन्यास विभिन्न यात्राओं से गुजरते हुए पाठकों को खुद में डूब जाने के लिए मजबूर करता है। सबसे बड़ी बात यह है कि मृणाल पाण्डे ने बेहद खूबसूरती से इसे अलग ही लय में रचा है। यह एक मीठे संगीत की तरह है जो पन्नों में शब्दों के जरिये बह रहा है। या यों कहें कि शब्द बेहद मीठे हैं। उपन्यास संगीत की समझ रखने वालों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं है। जिन्हें संगीत की उतनी समझ नहीं वे भी इसे लुत्फ लेकर पढ़ सकते हैं। इ-मेल के जरिये शुरु हुई कहानी बहुत रोचक, उत्सुक करने वाली बन पड़ी है।

किताब कहती है: ‘‘भारतीय संगीत का एक दौर रहा है जब संगीत के प्रस्तोता नहीं, साधक हुआ करते थे। वे अपने लिए गाते थे और सुननेवाले उनके स्वरों को प्रसाद की तरह ग्रहण करते थे। ऐसा नहीं कि आज के गायकों-कलाकारों की तरह वे सेलेब्रिटी नहीं थे, वे शायद उससे भी ज्यादा कुछ थे, लेकिन कुरुचि के आक्रमणों से वे इतनी दूर हुआ करते थे जैसे पापाचारी देहधारियों से दूर कहीं देवता रहें। बाजार के इशारों पर न उनके अपने पैमाने झुकते थे, न उनकी वह स्वर-शुचिता जिसे वे अपने लिए तय करते थे। उनका बाज़ार भी गलियों-कूचों में फैला आज-सा सीमाहीन बाज़ार नहीं था, वह सुरुचि का एक किला था जिसमें अच्छे कान वाले ही प्रवेश पा सकते थे।
मृणाल पाण्डे का यह उपन्यास टुकड़ों-टुकड़ों में उसी दुनिया का एक पूरा चित्र खींचता है। केन्द्र में हैं पहाड़ पर अंग्रेज बाप से जन्मी अंजलिबाई और उसकी मां हीरा। दोनों अपने वक्तों की बड़ी और मशहूर गोनेवालियां। न सिर्फ गोनवालियां बल्कि खूबसूरती और सभ्याचार में अपनी मिसाल आप। पहाड़ की बेटी हीरा एक अंग्रेज अफसर एडवर्ड के. हिवेट की नज़र को भायी तो उसने उस समय के अंग्रेज अफ़सरों की अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए उसे अपने घर बिठा लिया और एक बेटी को जन्म दिया, नाम रखा विक्टोरिया मसीह। हिवेट की लाश एक दिन जंगलों में पाई गयी और नाज़-नखरों में पल रही विक्टोरिया अनाथ हो गयी। शरण मिली बनारस में जो संगीत का और संगीत के पारखियों का गढ़ था। लेकिन यह कहानी उपन्यासकार को कहीं लिखी हुई नहीं मिली, उसे उसने अपने उद्यम से, यात्राएं करके, लोगों से मिलकर, बातें करके, यहां-वहां बिखरी लिखित-मौखिक, जानकारियों को इकट्ठा करके पूरा किया है। इस तरह पत्र-शैली में लिखा गया यह उपन्यास कुछ-कुछ जासूसी उपन्यास जैसा सुख भी देता है।’’

लेखिका मृणाल पाण्डे ने संगीत की एक अलग यात्रा तय की है। उन्होंने उत्सुकता जगाने वाली कहानी लिखी है जो शुरु से अंत तक पाठकों को बांध कर रखती है।

रिसर्च स्कॉलर विद्या पत्र लिखना शुरु करती है। वह एक पुस्तक पर शोध कर रही है। पहले इ-मेल से जिज्ञासा उत्पन्न होने लगती है। वह अपने तमाम रिश्तेदारों और परिचितों से बातचीत करती है ताकि पक्की जानकारी जुटा सके। उसका विषय संगीत से जुड़े उन लोगों को तह तक जानना है जिन्होंने संगीत में खुद को पूरी तरह भिगोया है। वे उस अनमोल प्रवाह में झूमे, जुटे, सिमटे जो उनके दिल और दिमाग को भी सुकून से भरता था, साथ ही उनको भी बहा ले जाता था जो उन्हें सुनते थे।

किताब के द्वारा हम रामपुर की अल्लारखी बी के बारे में जान पाते हैं। फिर रानीखेत का दौरा और वहां की मशहूर हीराबाई की जानकारी प्राप्त होती है। अंजलिबाई की कहानी के जरिये बनारस के संगीत रसिकों का पता चलता है। पत्रों के जरिये अंजलिबाई के जीवन के अनकहे पहलुओं की परते खुलते देखना अच्छा लगता है और उसकी जिंदगी के उजले और स्याह जीवन में झांकने का मौका मिलता है। उसके द्वारा कहा एक शेर देखिये:
‘‘हम तो मर कर भी किताबों में रहेंगे जिन्दा,
गम उन्हीं का है जो मर जाएं तो गुज़र जाते हैं।’’
वह कभी शोहरत की बुलंदियों पर थी, बाद में उसका ठाठ जाता रहा।

मृणाल पांडे ने बहुत ही आसान तरीके से हर चित्रण को सजीव बनाया है। इसलिए यह उपन्यास अपना-सा लगने लगता है। लेखिका एक जगह लिखती है,‘‘अल्लारखी बी तेल से सने तकिये पर निढाल सर रखे अब एक सिकुड़ी हुई किशमिश-सी भले लगने लगी हों, लेकिन खंडहर बताते थे कि रुप की इमारत कभी बुलंद रही होगी।’’

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‘‘बुढ़ापा एक तवायफ का सबसे बड़ा डर होता है जो सपनों तक में उसका पीछा करता है।’’
‘‘अपने जमाने के बूढ़े शेरों से ही हमने भी कभी इस किस्म के गुर सीखे थे, कि किस तरह बागेश्री में पंचम लगाकर कभी-कभार गुणीजनों के बीच खंबाज बनाकर पेश कर महफिल लूटी जा सकती है।’’
‘‘संगीत के सुर तो देवता हैं जो अपने सच्चे साधकों और रसिकों के आगे ही अपना पूरा स्वरुप उजागर किया करते हैं।’’

पत्रों के जरिये पूरा उपन्यास लिखना कोई सरल कार्य नहीं। मृणाल पाण्डे ने यह किया।

ज़िंदगी नीरस हो सकती है, खुशियों से भरपूर भी, जिसके रंग संगीत में साकार होते हैं। यह उपन्यास हमें किसी खुबसूरत धुन को महसूस कराता है। यह नीरसता को ख़त्म करता हुआ एक बेहतर एहसास के जैसा है। एक-एक शब्द बहुत मायने वाला है। गौर से पढ़ेंगे तो संगीत की अलग दुनिया को पढ़ेंगे। मृणाल जी को पढ़ना हर बार अलग पढ़ना है। वे आपसे कहती नहीं, आप तो बस उनसे बंध जाते हैं। यह अपने में अनोखा है, कभी-कभी रहस्यमय भी। जुड़े, फिर जुड़े, लेकिन कभी टूटने का अवसर नहीं होगा। यही उनकी ख़ासियत है।

यह एक दस्तावेज है जिसे संजो कर रखा जा सकता है। आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे पढ़ना और भी शानदार अनुभव होगा। वास्तव में यह उपन्यास संगीत की अनूठी यात्रा है जिसे हर किसी को पढ़ना चाहिए।

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‘सहेला रे
लेखिका : मृणाल पाण्डे
प्रकाशक: राधाकृष्ण पेपरबैक्स (राजकमल प्रकाशन)
पृष्ठ: 198
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