बॉम्बे बार: बारबालाओं की जख्मी ‘रुहों’ की दास्तां

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''यह किताब मुम्बई की बारबालाओं की ज़िन्दगी की अबतक अनकही दास्तान को तफसील से बयान करती है''

प्रसिद्ध खोजी पत्रकार विवेक अग्रवाल ने मुम्बई की बारबालाओं के जीवन की धूप-छांह भरी ज़िन्दगी की वास्तविक तस्वीर को समाज के सामने रखने की ईमानदार कोशिश की है। उनकी पुस्तक ‘बॉम्बे बार -चिटके तो फटके’ चर्चा में है। राधाकृष्ण प्रकाशन ने इस पुस्तक को प्रकाशित किया है।

पुस्तक पढ़कर पता चलता है कि बारबालाओं के उत्तेजक नाच का क्या मतलब है? उनके नितम्बों से वक्ष तक जो उभार हैं, उनके बेहया प्रदर्शन का क्या अर्थ है? उनकी मादक अदाओं, कंटीली चितवन के पीछे छिपे दर्द और मजबूरियों के अलावा भी इन देहजीवाओं की ज़िन्दगी में क्या-क्या जहर घुले हैं?

मुम्बई की बारबालाओं के हर रंग, हर रुप और हर खेल की पूरी पड़ताल को लेखक इस पुस्तक में बहुत ही मौलिक, स्वतंत्र, ईमानदार, कारुणिक तथा दिलचस्प भाषा शैली में पाठकों के सामने रखा है।

‘औरत भले ही ‘बाजारु’ क्यों न हो, उसे सबकी पसंद का ख्याल ठीक वैसे ही रहता है, जैसे एक मां, बहन, भाभी, चाची, मौसी या दादी को। उबली हुई सब्जियां देखीं, तो यही भाव उबल पड़े।’

पुस्तक में बारबालाओं के शोषण में जहां पुलिस, होटल वाले, नेता, गुंडों और असमाजिक तत्वों के शामिल होने के प्रमाण दिये गये हैं, वहीं मुम्बई के निकट बसे बेडिया समुदाय द्वारा अपनी बेटियों को जवान होते ही बार बालाओं की अंधेरी दुनिया में सौंपने का भी सटीक वर्णन किया है।

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'बॉम्बे बार -चिटके तो फटके'  (राधाकृष्ण प्रकाशन).
‘यह किताब मुम्बई की बारबालाओं की ज़िन्दगी की अबतक अनकही दास्तान को तफसील से बयान करती है। यह बारबालाओं की ज़िन्दगी की उन सच्चाईयों से परिचित कराती है जो निहायत तकलीफदेह हैं। बारबालाएं अपने हुस्न और हुनर से दूसरों का मनोरंजन करती हैं। यह उनकी जाहिर दुनिया है। लेकिन शायद ही कोई जानता होगा कि दूर किसी शहर में मौजूद अपने परिवार से अपनी सच्चाई को लगातार छुपाती हुई वे उसकी हर जिम्मेदारी उठाती हैं। वे अपने परिचितों की मददगार बनती हैं। लेकिन अपनी हसरतों को वे अकसर मरता हुआ देखने को विवश होती हैं। कुछ बारबालाएं अकूत दौलत और शोहरत हासिल करने में कामयाब हो जाती हैं, पर इसके बावजूद जो उन्हें हासिल नहीं हो पाता, वह है सामाजिक प्रतिष्ठा और सुकून-भरी सामान्य पारिवारिक ज़िन्दगी।
विवेक बतलाते हैं कि बारबालाओं की ज़िन्दगी के तमाम कोने अंधियारों से इस कदर भरे हैं कि उनमें रोशनी की एक अदद लकीर की गुंजाइश भी नज़र नहीं आती। इससे निकलने की जद्दोजहद बारबालाओं को कई बार अपराध और थाना-पुलिस के ऐसे चक्कर में डाल देती है, जो एक और दोजख है। लेकिन नाउम्मीदी-भरी इस दुनिया में विवेक हमें शर्वरी सोनावणे जैसी लड़की से भी मिलवाते हैं जो बारबालाओं को जिस्मफरोशी के धंधे में धकेलनेवालों के खिलाफ कानूनी जंग छेड़े हुए है।
किन्नर की इस दास्तान के एक अहम किरदार हैं, जो डांसबारों में नाचते हैं। अपनी खूबसूरती की बदौलत इस पेशे में जगह मिलने से वे सम्मानित महसूस करते हैं। हालांकि उनकी ज़िन्दगी भी किसी अन्य बारबाला की तरह तमाम झमेलों में उलझी हुई है।’

विवेक ने रेश्मा का जिक्र किया है। रेश्मा एक जगह कहती है,‘मैं अजमेर शरीफ गयी। अपने गुनाह बख्शवाने के लिए न जाने क्या-क्या करती रही। न जाने किस-किस के दर पर माथा रगड़ा। तब से तीन रुहें भटक रही हैं। दो तो मेरे अब्बू-अम्मी की हैं। एक मेरी है -एक जिन्दा लाश की रुह।’

‘यूं अगर गुनाहों की मुआफी होती तो सारी मसजिदें वीरान हो जातीं। यह बात मुझे भी अब समझ आई। मेरी जिन्दगी सोने-हीरों के पिंजरे में कैद उस बुलबुल की मानिन्द थी, जिसकी आह भी लोग गाना समझते थे। मेरी चीत्कारों पर भी चांदी के सिक्के बरसते थे।’

‘जब तब बार चले, कदम चले, मेरी किस्मत चली। बार क्या बन्द हुए किस्मत पर भी ताला लग गया।’

सुजाता की कहानी भी लेखक ने लिखी है जिसे पढ़कर आप सोच में पड़ जाते हैं। वह एक घटना का जिक्र करते हुए कहती है,‘कमाई आज भी मोटी की, लेकिन गंवा कर बहुत कुछ आई। गन्दी निगाहों और फिकरों ने मुझे इस कदर आहत किया कि मन रो रहा था। आज दो पुलिस वाले भी आए थे। ऐसे देख रहे थे मानो आंखों से ही बलात्कार कर रहे हों।’

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'बॉम्बे बार' की पुस्तक विवेक अग्रवाल में बारबालाओं की अनकही दास्तानें हैं.

लेखक विवेक अग्रवाल ने पुस्तक में स्पष्ट लिखा है कि उनका यह हाल है कि वे बाहर गैरों के हाथ छली जाती हैं, अन्दर घरवालों से। उनकी कमाई पर घर वाले मौज उड़ाते हैं। यदि कोई बारबाला विरोध करती है तो घरवाले ही उसपर जुल्म ढाने लगते हैं।

‘बॉम्बे बार’ एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें उन ज़िन्दगियों के किस्से हैं जिनकी ज़िन्दगी खुद एक किस्सा बनकर रह गयी है। असल में यह किताब बारबालाओं की जख्मी ‘रुहों’ की संजीदगी से लिखी दास्तां है जो हमें सोचने पर मजबूर करती है और हमारे सामने ढेरों सवाल छोड़ जाती है।

विवेक अग्रवाल दशकों से अपराध, कानून, सैन्य, आतंकवाद और आर्थिक अपराधों की खोजी पत्रकारिता कर रहे हैं. वे जनसत्ता, जनमत जैसे प्रतिष्ठित अख़बारों से जुड़े रहे. मराठी चैनल 'मी मराठी' में भी कार्य किया. विवेक की विशेषज्ञता का लाभ हॉलैंड के मशहूर चैनल 'ईओ' तथा 'एपिक' भी उठा चुके हैं. 'मुंभाई, मुंभाई रिटर्न्स और खेल खल्लास' नामक चर्चित किताबों के लेखक हैं. ‘अंडरवर्ल्ड बुलेट्स’ नाम से अगली किताब शीघ्र प्रकाशय.
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बॉम्बे बार -चिटके तो फटके'
लेखक : विवेक अग्रवाल 
प्रकाशक: राधाकृष्ण प्रकाशन
पृष्ठ : 144
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1 comment:

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