शब्दों को ज़िन्दगी देने वाली कविताएं

भावनाओं के धागों में लिपटी दीपक रमोला की कविताएं ज़िन्दगी की वास्तविकता बतलाती हैं.
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दीपक रमोला का पहला काव्य संग्रह 'इतना तो मैं समझ गया हूँ'.

शब्द महसूस किये जाते हैं। उनका सीधा असर हमपर होता है। शब्द तैर रहे हैं फिज़ाओं में, शब्द इतने मखमली हैं कि उनके बादल रुई से इतरा रहे हैं, ज़िन्दगी को खुशमिज़ाज कर रहे हैं।

दीपक रमोला युवा हैं जिनकी कविताएं पहले काव्य संग्रह में उनके शब्दों से चमत्कार वाले जज़्बे को दर्शा रही हैं। उन्होंने इस पुस्तक से यह साफ कर दिया है कि शब्दों की ताकत असर जरुर करती है। कविताएं रुह को सुकून देती हैं।

‘इतना तो मैं समझ गया हूं’ दीपक रमोला का पहला काव्य संग्रह है जिसे वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। इसका आवरण देखकर मन जिज्ञासु होता है। खूबसूरत आवरण अपनी एक कहानी कहता है। पतंग, पंछी और आजादी। कई मायने हैं जिन्हें जहां अपनी कूची से साकार किया है नीरव दोषी ने, वहीं दीपक रमोला ने शब्दों को ज़िन्दगी दी है।

शब्द जो अनगिनत रंगों को अपने में समेटे हैं। दीपक रमोला ने ज़िन्दगी की परतों को महसूस किया है। जो पाया वो लिखा है। शब्दों में उजाला है, नयापन है। पतंग-सा उत्साह है जिसकी डोर हमें उनकी ओर खींचती है। यही उनके शब्दों का जादू है।

भावनाओं के धागों में लिपटी दीपक रमोला की कविताएं ज़िन्दगी की वास्तविकता बतलाती चलती हैं। रिश्तों के उलझे तारों को बयान करने से पीछे नहीं हटतीं, किताब की पहली कविता देखें:
‘रिश्ता हमारा भी
इस पुल की तरह ही था
बस पहाड़ों की ज़िद में
टिक नहीं पाया
वक्त की गहरी खाई में
वो धड़कता, मुस्कुराता पुल जा समाया।’

किस बारीकी से दीपक रमोला ने शब्दों को बांधा है, देखें:
‘कांच की तरह
रिश्ता टूटा नहीं था हमारा
बस उसके सिरे खुल गये थे।’

इन्हें पढ़कर कवि की परिपक्वता और विचारों की गूढ़ता के दर्शन होते हैं। यह भी गलत नहीं कि युवा कवि अनुभव से भरा हुआ है।

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इन कविताओं में ज़िन्दगी की सच्चाई है.
‘दीपक रमोला की कविताएं उनके जीवन की स्वानुभूत अभिव्यक्तियां हैं जिनमें उनका हृदय धड़कता है। इन्हें किसी एक मनोभूमि में नहीं समेटा जा सकता, ये अनेक अनुभवों की परछाईं हैं जैसे समुद्र के किनारे फैले शंखों में छिपे नाद। इनकी अभिव्यक्ति उम्र के पड़ाव से कहीं आगे विचरती है। नवयुवा मन में चुभन है जो ज़िन्दगी के आसपास से लिए प्रसंगों को मुखरित कर देती है। कविता ‘ज़िन्दगी चोंच मारती है’ इसी का परिणाम है। दीपक की पैनी निगाहों में ज़िन्दगी एक आसान कसीदाकारी नहीं जिसमें सहज, सरल तरतीब से चलने वाले सूई-धागे की नफ़ासत उभरे। इनके लिए हर लम्हा एक चुनौती है जिसे स्वीकारना ही है अंजाम ना जाने क्या निकले।
इनकी रचनाओं को पढ़ना समझना आसान है कि कहीं ये संवदेनशील कवि हैं, कहीं गज़लकार और कहीं किसी कहानी की पकड़ी कड़ी को खूबसूरती से गीतों में ढालते गीतकार। कवि हृदय सामयिक घटनाओं से उलझता है और परिणामतः सृजन होता है ‘इजाज़त’ और ‘एक बुरा सपना’। इनकी पर्वतीय उपत्यका में हुई परवरिश ने इन्हें प्रकृति से जुड़ने की प्रेरणा दी है। वहीं अंदर तक भोगा हुआ तृप्त मन है जो आज की ज़िन्दगी की आपाधापी से अनछुआ है। अगर प्यार है तो इन्ज़ार में अधिक रस है, मिलन में विकर्षण। ज़िंदगी में मेहनत है, उपलब्धियां हैं पर गहन तनहाई है। जहां कवि खुद ही से रुबरु है, रिश्ते, नाते, मीत सभी बेमानी हैं।
दीपक की कविताओं में रुमानियत उनकी कहानियों से छिटककर बिखरी पड़ी है। ये सच्ची जीवन गाथाएं हैं जिन्हें बड़ी शिद्दत से जीवन शिक्षा के रुप में उन्होंने यहां-वहां से सहेजा है।’

दीपक रमोला की कविता ‘गलियों से गुज़रते हुए’ बार-बार पढ़ने का मन करता है:
‘छोटी-छोटी गलियों में भी देखो जीवन बसता है
आधे-खुले बंद दरवाज़ों से
मुझको औंधे मुंह तकता है
घुटी-घुटी दीवारों में अब भी सांसें चलती हैं
चुप्पी साधे खड़ी जुबां कितनी बातें करती है’

जीवन को समझना और उसपर रचना करना सरल नहीं। दीपक रमोला का अनुभव शब्दों से जोड़ता है। उनका मन कविता कहता है क्योंकि विचार थके नहीं हैं, उनमें पैनापन है, सरलता है, स्पष्टता है और वे उनके मन पर बोझ नहीं हैं। यही वजह है कि उनकी कविताएं ताज़गी भरी हैं, उदासी लिए हुए नहीं। सफर के साथी की तरह पन्ने बोलते हैं। तन्हाई के आलम में भारीपन को दूर करती मालूम पड़ती हैं ये कविताएं।

एक बात जो इस पुस्तक को ख़ास बनाती है वह है कविताओं से साथ सुंदर चित्र जो कविताओं को नए मुकाम पर ले जाते हैं। नीरव दोषी ने भी कवितानुसार चित्रण कर शब्दों को जीवंत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

मार्च के महीने में यह खास किताब आपके लिए है।

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‘‘इतना तो मैं समझ गया हूं’
दीपक रमोला
वाणी प्रकाशन
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