इंडियापा : ज़िन्दादिली से भरी रोचक कहानी

इंडियापा का देसी दिल सचमुच ज़ोरों से धड़कते हुए आपसे संवाद करने को तैयार है.

जब शब्दों से जिंदगी के पलों के खूबसूरत चित्र खींचे जाते हैं तो कहानियां भी जिंदादिली से भर जाती हैं। समुद्र की लहरों से अठखेलियां करते जहाज के कप्तान विनोद दूबे हर उतार-चढ़ाव को बारीक नज़रों से समझते हैं। उनका पेशा ऐसा है कि वे गोते लगाती जिंदगी का हाल अच्छी तरह जानते हैं। यही वजह है उनके विचारों की उथलपुथल ने उन्हें एक ऐसी कहानी लिखने को प्रेरित किया जो उनकी अपनी कहानी भी है, और हमारी भी।

‘इंडियापा’ के लेखक विनोद दूबे हैं। पुस्तक का प्रकाशन हिन्द युग्म ने किया है। यह किताब हमें अपनी ही लगेगी क्योंकि यहां वह सब पढ़ा जा सकता है जो हमारे आसपास होता रहता है। यहां प्रेम है, वियोग है, हंसी है, खुशी है, रोमांच है, और वह सबकुछ जिसे आज का पाठक पढ़ने की इच्छा रखता है। सबसे बड़ी बात यहां अपना इंडिया है।

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विनोद दूबे की पुस्तक 'इंडियापा' का आवरण.

विनोद दूबे का यह पहला प्रयास है जिसे रिलीज से पूर्व ही काफी चर्चा मिल चुकी थी। अब जबकि किताब रिलीज हो चुकी है तो ऐसा कहा जाने लगा है कि यह 2018 की सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार होने की फेहरिस्त में दर्ज होने जा रही है।

पढ़कर बहुत सूकून मिलता है जब विनोद दूबे बनारस के घाटों का सजीव वर्णन करते हैं। ऐसा करना आसान नहीं लेकिन विनोद की कलम के जादू और लेखन शैली के अंदाज से हर कोई प्रभावित हुए बिना नहीं कर सकता। एक जगह वे लिखते हैं:
‘मार्च की उस शाम में जब सूरज आधा हीं डूबा था, थोड़ी सी सिहरन थी. गंगा के शांत पानी मे उसकी किरणों की लाली किसी के पैरों के महावर की तरह फैली थी. मेरे अन्दर चल रहे तूफ़ान से कोसों दूर, उस घाट पर लोग हमेशा की तरह अपनी धुन मे मगन थे. संध्या-स्नान के बाद माथे पर चन्दन का टीका लगाते कुछ सन्यासी, दूर से ही संध्या आरती का अज़ान पढ़ती कुछ मंदिरों की घंटिया,  गंगा आरती की तैयारी मे लगा सफेद और पीले कपड़ों मे पंडितों का एक हुजूम, आश्चर्य भरी आँखो से गंगा घाट की खूबसूरती निहारते कुछ अँगरेज़.
एक माँ अपने नन्हे बच्चे को आँचल मे छुपाए , गंगा से उसकी लंबी उम्र की दुआ मांग रही थी. एक नया-नया प्रेमी जोड़ा हाथ में हाथ पकड़कर चल रहा था. उनके नये नये शरमाते रिश्ते की तरह उनकी उंगलियाँ भी चलते चलते कभी एक दूसरे को छू लेती थीं, तो कभी शरमा के दूर चली जाती थीं. एक शादी-शुदा जोड़ा पंडित जी को साक्षी बनाकर,  गंगा मैया से इस बात का आशीर्वाद ले रहा था कि उनकी खुशियों को किसी की नज़र ना लग जाए. एक उम्रदराज़ जोड़ा एक दूसरे का सहारा बनकर घाट की सीढ़ियाँ उतर रहा था. एक दूसरे को हर सीढ़ी के बाद वे दोनो ऐसे देखते थे, जैसे डर था कि न जाने कौन सी सीढ़ी पर उनमे से कोई ठहर जाए, और दूसरे को बिना सहारे के आगे बढ़ना पड़े. वहीँ बगल के मणिकर्णिका घाट पर अलग बेबसी का नज़ारा था. कुछ लोग अपनों को मुखाग्नि देने की तैयारी में थे, इस कसमकस के साथ कि अब जिंदगी में कभी भी वो चेहरा नहीं दिखेगा.
रिश्तों का रंगमंच मेरी आँखों के सामने था | इन घाटों पर पहले भी, एक हीं पिक्चर फ्रेम मे ,  मैंने जीवन से मृत्यु तक का सफ़र देखा था. पर आज , इसी फ्रेम में पहली बार मैं अपने रिश्ते को बनते और सिमटते देखने जा रहा था.'

विनोद दूबे आपकी भाषा में बात करते हैं। वे उस अंदाज में अपनी रचनात्मकता दर्शाते हैं जिसे पढ़ना हमें उनके और करीब ले आता है। आप उन्हें पढ़कर जीभर मुस्करा सकते हैं, कई बार उस दृश्य को जीवंत होता हुए अपने सामने पाते हैं। दोस्तों की मस्ती देखें:
'' वैसे, भाभी dance अच्छा कर लेती हैं, पंडित जी. एक दम कटीली नचनिया choose किए हो” राजू तारीफ भी अपने अंदाज़ में हीं करता था .
''साले, इतनी घटिया बातें कर कैसे लेता है, थोडा मुझे भी सिखा दे” मैने उसे जलील किया.
तब तक पीछे से किसी हवसी ने कहा “असली चीज़ तो साला, लास्ट तक छुपा के रखा था इन्होने. अब जाके हीरा बाहर आया है. बस एक बार मिल जाए तो, तो सुधर जायें हम कसम से.” उसके हर शब्द मुझे आँखो में शीशे की तरह चुभे.
''What the hell are you talking, man? Is this the way, you bloody behave with all the girls?”
गुस्से में मै उसकी तरफ़ मुड़ा और मन का सारा ज़हर इंग्लिश में उगल दिया. Emotion में बहता हूँ तो मुँह से सुविधानुसार या तो अँग्रेज़ी निकलती है या फिर भोजपुरी. मेरा अँग्रेज़ी बम उस लड़के को समझ भले हीं ना आया हो पर उसने खिखियाना ज़रूर बंद कर दिया. लेकिन राजू ने मामला भाँप लिया.
''साले, देंगे घुमा के एक लप्पड़, मुँह पहुंचेगा साजन सिनेमा” राजू ने तुरंत मेरे इंग्लिश डांट को बनारसी में translate किया.

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एक ज़बरदस्त ताज़ा और मौलिक  हस्तक्षेप है यह उपन्यास। वैसे उपन्यास तो इसे कहा जा रहा है, जबकि है यह आपबीती और वो भी उसी ज़ेहन-ज़ुबान में जो हम आप जीते हैं। सागर की जद्दोजहद, खुशी, उलझनें, आशा, निराशा, प्यार, तड़प, वफा, बेवफाई, कश्मकश, बेबसी, इंतज़ार, मिलन, कोसना, सँजोना क्या-क्या लिखूँ हर रंग हर आयाम को छुआ है विनोद दूबे ने या यूँ कहूँ कि जस का तस रख दिया है भोगा,देखा या अनुभव किया यथार्थ। मज़ेदार यह है कि कहीं भी अपना और विशेषकर बनारस नहीं छूटता। बनारस बार-बार आपसे बोलता-बतियाता सा लगेगा। इंडियापा का देसी-दिल सचमुच ज़ोरों से धड़कते हुए आपसे संवाद करने को तैयार है। किसी भी शास्त्रीयता से दूर पहली बारिश में कच्ची मिट्टी की सोंधी महक है यह पुस्तक। कसा कथानक और खालिस देसी अंदाज़ इसके पढ़ने के स्वाद को बार-बार परवान चढ़ाते हैं। एक बेहद निराली-नई और मौलिक अभिव्यक्ति है इंडियापा।  (-डाॅ. श्लेष गौतम-कवि)

यह किताब भी किसी सफर से कम नहीं है, तमाम उतार चढ़ाव और तूफानों से जूझते ऐसे कपल की स्टोरी है जो आपके इर्द गिर्द होते हैं लेकिन वो अपनी बातें ख़ुद तक रखते हैं। कहानी एक मर्चेंट नेवी की है लेकिन कोई आत्मकथा नहीं है, एक लव स्टोरी है लेकिन दुहराव नहीं है, ड्रग्स वाली बात नहीं है, मल्टीप्ल अफेयर्स वाली बात नहीं है और वो तमाम बातें नहीं है जिसके लिए पब्लिसिटी मिलती है। लेकिन वो सब बातें है जिसके लिए किताबें लिखी जाती है और उसे पढ़ा जाता है।
(-अभिलेख गौतम -लेखक)

इंडियापा नाम भी नितांत नूतन है और आकर्षक भी. उपन्यास आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया है. फ़िनलैंड की बर्फीली हवाओं से बनारस की गलियों यहाँ तक कि संकरी गलियों का सफर निस्संदेह लाजवाब है. उपन्यास की आधारभूमि बनारस है.
मध्यम वर्गीय परिवार की परम्पराओं का चित्रण पढ़कर लगेगा जैसे उनके विषय में ही लिखा गया है.  कहानी में हास्य के छींटे भी है जो गुदगुदाते हैं. फ़िल्मी गानों तथा शंकर भगवान का प्रसंग बरबस मुस्कराहट ला देता है.  (-चित्रा गुप्ता -लेखिका)

हर पन्ने को पढ़कर ऐसा लगता है जैसा यह कहानी हमारी अपनी है। वैसे भी दिल से लिखी बातें दूसरों के दिल में भी ठहर जाती हैं और यह कला बखूबी विनोद दूबे जानते हैं। प्रेम की बातें करने में वे माहिर जान पड़ते हैं।

भावनाओं को अलग सिरे पर ले जाते हैं जहां से पाठक को भी लगता है कि क्या असल में ऐसा है या क्या यह उनके साथ घटी किसी कहानी का हिस्सा है। यहीं से पाठक भावनाओं में बहा चला जाता है। एक पन्ने के बाद दूसरा, उसके बाद वह किताब पढ़ता है क्योंकि यह किताब उसे अपनी लगने लगनी लगती है।

इंडियापा को पढ़िये और जिंदादिली की रोचक दास्तान में डूब जाइये।

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इंडियापा'
लेखक : विनोद दूबे 
प्रकाशक: हिन्द युग्म
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