ख़ास किताबें : ज़िन्दगी के पहलुओं से रूबरू होने का शानदार अवसर

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इस महीने पढ़ें कुछ ख़ास किताबें जो अलग रंगों की अनुभूति कराती हैं.

किताबों के अलग-अलग रंगों को पढ़ने से ज़िन्दगी के कई पहलुओं से रूबरू होने का शानदार अवसर मिलता है. हाल में रिलीज़ हुई ख़ास किताबों पर नज़र डालते हैं जिन्हें आप जरुर पढ़ें :

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चुगलखोर दिल और अन्य कहानियाँ :
यूँ तो कहानियाँ गद्य में प्रस्तुत संक्षिप्त आख्यान की प्राचीनतम और सार्वभौमिक विधा है, लेकिन इसका व्यवस्थित आधुनिक विधागत रूप उन्नीसवीं सदी में विकसित हुआ और बीसवीं सदी में, विशेष रूप से रूस, जर्मनी, फ़्रांस और अमेरिका में परवान चढ़ा. वैश्विक कथा - परिदृश्य इतना व्यापक और समृद्ध है कि कम से कम साठ वर्ष पूर्व दिवांगत हो चुके लेखकों के बीच से इन चौदह कहानियों को आपके सामने प्रस्तुत किया गया है.

विश्व की श्रेष्ट कहानियों का एक सम्यक और प्रतिनिधि संग्रह एक बड़े और एकाधिक खंडों वाले संचयन की मांग करता है. सत्रहवीं सदी से लेकर आरंभिक बीसवीं सदी के प्रदीर्घ अंतराल को समेटने के नाते और कहानी की विधा को आविष्कृत-परिभाषित करने वाली कालजयी विभूतियों की उपस्तिथि के नाते यह संचयन बेहतरीन है. मूल अंग्रेज़ी कहानियों के साथ - साथ सभी गैरअंग्रेज़ी भाषी कहानियों के अनुवाद इन कहानियों के अंग्रेज़ी अनुवादों पर आधारित हैं.

संकलन : मदन सोनी
प्रकाशक : मंजुल  प्रकाशन
पृष्ठ : 258

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आवाज़ दो हम एक हैं :
'आवाज़ दो हम एक हैं' हिंदी में जां निसार अख़्तर की आज भी जवान शायरी की पहली मुकम्मल किताब है, जो उनके शायराना मिज़ाज और कलंदराना अंदाज़ से हिंदी के पाठकों को रूबरू कराएगी. उर्दू में प्रकाशित उनकी सभी 6 किताबों से ली गई चुनिंदा रचनाओं को संपादित कर यह संकलन तैयार किया गया है. लगभग आधी सदी पहले लिखी गई उनकी शायरी अपनी पूरी चमक के साथ मौजूद है, और हिंदी जगत को इस गौरव, ख़ुशी और उम्मीद के साथ समर्पित है कि यह अदब के एक बड़े फ़नकार का सही मायने में परिचय करा पाएगी.

जां निसार अख़्तर का जन्म 14 फ़रवरी 1914 को ख़ैराबाद (उत्तर प्रदेश) में हुआ. घर पर साहित्यिक माहौल मिलने के कारण वे दस वर्ष की उम्र से ही शायरी करने लगे. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद ग्वालियर के विक्टोरिया कॉलेज और भोपाल के हमीदिया कॉलेज में उर्दू प्राध्यापक रहे. शायरी की किताबें लिखने के अलावा मुंबई में फ़िल्मों के गीत भी लिखे. उन्होंने हिन्दोस्तां हमारा के अंतर्गत 300 वर्षों की श्रेष्ठ उर्दू शायरी के वृहद और महत्वपूर्ण संकलन का संपादन किया. उन्हें सोवियत पुरस्कार तथा महाराष्ट्र अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया.

लेखक : जां निसार अख़्तर
प्रकाशक : मंजुल  प्रकाशन
पृष्ठ : 240

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चराग़ :
वसीम बरेलवी की रचनायें खास व आम दोनों ही तरह के लोगों की ज़बान पर रहते हैं. इनकी इन्हीं रचनाओं का संकलन है चराग़. आसान और आम फ़हम ज़बान का इस्तेमाल कर वसीम की शायरी सभी का दिल जीत लेती है.

चराग़ में वसीम बरेलवी अपना जुड़ाव इस युग, माहौल और मिट्टी से भरपूर दर्शाते हैं. वह सिर्फ़ काल्पनिक दुनिया की बातें नहीं करते बल्कि अपने आस-पास से पूरी तरह बाख़बर रहते हैं और जदीद मौजूआत, अर्थात समकालीन समस्याओं और घटनाओं पर पूरी नज़र रखते हुए इन्हें अपनी शायरी का हिस्सा बनाते हैं.

रचनाकार : वसीम बरेलवी
प्रकाशक : मंजुल प्रकाशन
पृष्ठ : 174

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मलमल कच्चे रंगों की :
अंजुम रहबर ने गीत ग़ज़लों के साहित्यिक एवं मूल्यात्मक क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान बना ली है. उनकी रचनाओं में जहां वैयक्तिक अनुभूतियों की मिठास, कड़वाहट और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का रसपूर्ण मिश्रण है, वहीं आज के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनितिक विकृतियों और विद्रूपताओं की भी मार्मिक अभिव्यक्ति है.

उनके गीत और ग़ज़लें यद्यपि परंपरागत रूप से भी संयुक्त हैं तथापि वे नवगीत और आधुनिक ग़ज़ल की समस्त विशेषताओं को भी अपने आप में संजोये हुए हैं. भावानुरूप भाषा और नए बिम्बों की मनोहारी छवि उनकी रचनाओं को जन-जन का कण्ठहार बनाती है.

प्रस्तुत संग्रह की रचनाएं जीवन और जगत के अनेक रूपों और रंगों का मणि दर्पण हैं. निश्चित ही जो भी पाठक इन रचनाओं में झांकेगा उसे अवश्य ही अपना और अपने समाज का कोई-न-कोई रूप अवश्य दिखाई देगा.

लेखिका : अंजुम रहबर
प्रकाशक : मंजुल प्रकाशन
पृष्ठ : 118

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