बातें जो कही जा सकती हैं और नहीं कही जा सकतीं

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बातचीत के माध्यम से विभिन्न विषयों पर चर्चा इस किताब को खास बनाती है.

‘‘अरुंधति रॉय 2014 की सर्दियों में एडवर्ड स्नोडेन से मिलीं। उनके साथ में थे अभिनेता और लेखक जॉन क्यूज़ैक और डेनियल एल्सबर्ग, जिन्हें 60 के दशक का स्नोडेन कहा जाता है। उनकी बातचीत में शामिल थे हमारे वक्त के सभी बड़े विषय: राज्य की प्रकृति, एक बेमियादी जंग के दौर में खुफिया निगरानी, और देशभक्ति का मतलब। यह गैरमामूली, ताकतवर किताब बेचैन भी करती है और उकसाती भी है।’’

‘बातें जो कही जा सकती हैं और नहीं कही जा सकतीं: निबंध और बातचीत’ का प्रकाशन जगरनॉट बुक्स ने किया है। 'Things That Can and Cannot Be Said' का यह हिंदी अनुवाद है। पुस्तक का अनुवाद रेयाजुल हक द्वारा किया गया है।

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अरुंधती रॉय, डेनियल एल्सबर्ग, एडवर्ड स्नोडेन और जॉन क्यूज़ैक.

पहले अध्याय में जॉन क्यूज़ैक उनके और अरुंधति रॉय के मध्य हुई बातचीत के अंश हमें उपलब्ध कराते हैं। दोनों ने बेबाकी और रोचक ढंग से कई गंभीर मुद्दों पर अपनी राय दी है। वे इस्लामिक स्टेट की बात करते हैं तो उसके पैदा होने पर सवाल उठाये जाते हैं। अरुंधति कहती हैं कि ‘यह शैतान पैदा कैसे हुआ?’ फिर वे कहती हैं कि अमेरिका भी आईएसआईएस की तरह कर रहा है। हालांकि वे उनके बीच का फर्क भी बतलाती हैं। भारत पर बात करते हुए भी ढेरों सवाल उपजते हैं। शायद उनका उत्तर दोनों विचारक तलाश रहे हैं।

‘‘जब लोग कहते हैं,‘भारत के बारे में बताइए,’ मैं कहती हूं,‘कौन सा भारत?..कविताओं और जुनूनी बगावतों की धरती? वो धरती जहां यादगार संगीत और मन को मोह लेने वाली पोशाकें बनती हैं? वो मुल्क जिसने जाति व्यवस्था ईजाद की और जो मुसलमानों और सिखों के नस्ली सफाए और दलितों को पीट-पीट कर होने वाली हत्याओं का जश्न मनाता है? अरबों डॉलर की दौलत वाले अमीरों का देश? या वह मुल्क जिसमें 80 करोड़ लोग रोज़ाना आधे से भी कम डॉलर पर जिंदगी गुज़ारते हैं?’’  ~अरुंधति रॉय.

अरुंधति यह भी कहना नहीं भूलतीं कि एक ओर रेडिकल हिन्दू बम है और दूसरी ओर रेडिकल मुस्लिम बम। वे सीरिया के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करती हैं। वे यह कहने से भी नहीं चूकतीं कि उग्र इस्लाम और संयुक्त राज्य एक दूसरे के प्रेमी की तरह हैं।

पुस्तक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार की नीतियों और भविष्य पर भी अरुंधति रॉय ने चर्चा की है। वहीं उन्होंने अनपढ़ लोगों की आजादी का जिक्र करते हुए कहा है:‘अजीब फेर है कि जो लोग दूर-दराज के इलाकों में रहते हैं, अनपढ़ हैं और जिनके पास टीवी नहीं है, वे कई मामलों में आजाद हैं, क्योंकि वे आधुनिक जन माध्यमों द्वारा फैलाए जा रहे जहर की पहुंच से दूर हैं।’’

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यह पुस्तक हमें अफगानिस्तान के उस दौर से भी रुबरु कराती है जब औरतें घरों से बाहर निकलती थीं, पढ़ने की आजादी थी, आजादी से घूमती थीं और जो चाहे पहनती थीं। अरुंधति कहती हैं कि औरतों की आजादी को तालिबान ने छीन लिया। लेकिन उसके लिए असली जिम्मेदार संयुक्त राज्य है जिसने मुजाहिदीनों को पैसे देने शुरु किये जिसके बाद सबकुछ बदल गया।

डैनियल एल्सबर्ग से अरुंधति रॉय ने कई मुद्दों पर चर्चा की। उन्होंने आतंकवाद और उसके भयावह परिणाम तथा उसमें खुफिया जिम्मेदारियों पर बात की। उन्होंने जनमत और सार्वजनिक नैतिकता की अवधारणा पर भी विस्तार से चर्चा की। उनकी यह चर्चा पढ़ने लायक है क्योंकि यह हमारे मन को खंगालने का काम भी करती है। हमें एक नजरिये नहीं, बल्कि कई नजरियों से सोचने पर विवश करती है कि आखिर ऐसा क्यों कहा गया? क्या ऐसा कहा जाना चाहिए था? क्या जो वे कह रहे हैं उसके परिणाम भविष्य में देखने को मिलेंगे? क्या जो परिणाम हम अब देख रहे हैं वे पुरानी खुराफातों के नतीजें हैं?

बातचीत के माध्यम से विभिन्न विषयों पर चर्चा इस किताब को खास बनाती है। इसे पढ़कर मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य, आंतरिक हलचलों आदि के बारे में नयी चर्चा भी शुरु की जा सकती है।

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'बातें जो कही जा सकती हैं और नहीं कही जा सकतीं
(Things That Can and Cannot Be Said)
लेखक : अरुंधति रॉय - जॉन क्यूज़ैक
अनुवाद : रेयाजुल हक     
प्रकाशक : जगरनॉट बुक्स
पृष्ठ : 152

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