बेपरवाह, बेधड़क गौरी लंकेश

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यह किताब नई उर्जा प्रदान करती है हर उस इंसान के लिए जो नई सोच, नये विचार रखता है.

हर उस लड़ाई में शिरकत करने की इच्छा करती थीं जो समाज में बदलाव के लिए लड़ी जा रही हो। उन्होंने यह नहीं देखा कि वे किसके खिलाफ़ खड़ी हैं, चाहें वह कितना ही ताकतवर हो, चाहें कितना खतरनाक हो, गौरी लंकेश का मकसद सिर्फ उस सोच के विरोध में अपनी आवाज़ उठाना भर नहीं था, बल्कि दूसरों के सामने उनकी असलियत उजागर करना भी था। वे अपने लिए कभी नहीं लड़ीं। उन्होंने समाज को नया आईना दिखाने की कोशिश की। उनके पास कलम की ताकत थी। वह उनका सबसे मजबूत हथियार भी था। और फिर एक दिन उनके विरोधियों ने उस आवाज़ को दबा दिया, लेकिन सवाल यह कि क्या वे ऐसा कर पाए?

‘मेरी नज़र से : चुनिंदा लेख’ का प्रकाशन जगरनॉट बुक्स ने किया है। यह गौरी लंकेश के चुनिंदा लेखों का संग्रह है। पुस्तक का संपादन चंदन गौड़ा ने किया है। अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद अनूप कुमार भटनागर ने किया है।

गौरी लंकेश एक एक्टिविस्ट-पत्रकार की मिसाल थीं जो अपनी पूरी ज़िन्दगी समझदारी के साथ वही करती रहीं, जिसे उनके दिल ने सही माना। यह संकलन उनके अधूरे रह गये काम और उनकी मेहनत की निशानी तो है ही, जो उनकी विरासत थी, साथ ही यह उनकी हमदर्द आवाज़ को भी संजोने की एक कोशिश है, ताकि उनसे प्रेरणा हासिल की जा सके, इससे अपनी राहें रोशन की जा सकें। उन्हें ज़िन्दगी के बीच से ही हमसे छीन लिया गया, एक व्यस्त ज़िन्दगी, खुले दिल वाली और दुनिया को देखती साफ़ नज़र वाली ज़िन्दगी, यह संकलन जिसका एक नमूना है।

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लोकतान्त्रिक समाज में हमेशा ही नये विचार और आलोचनाएँ होती हैं. यदि आलोचनाओं को अपमान के रूप में लेने की बजाए इनसे आत्म निरीक्षण किया जाए तो इससे धर्म, उसके मानने वालों और समाज की ही भलाई होती है. यदि हम इसी बात पर जोर देते रहेंगे कि जो हम कह रहे हैं वही सही है और हमारा दृष्टिकोण ही सबसे सही है तो धर्म, उसके मानने वाले और समाज में ठहराव आ जाता है और इससे सड़ांध आनी शुरू हो जाती है.
(-गौरी लंकेश)

गौरी लंकेश ने सत्ता पक्ष के बारे में भी खुलकर लिखा है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भगवा ब्रिगेड के विषय में लिखे गए उनके विचार इस पुस्तक में पढ़े जा सकते हैं। बीजेपी, कांग्रेस या अन्य पार्टियों की राजनीति पर उनकी चर्चा पढ़ने लायक है। उन्होंने एक पक्षीय सोच से हटकर हर पहलू की जांच के बाद ही अपनी कलम चलायी है।

यह पुस्तक गौरी लंकेश की ज़िन्दगी के कई पहलुओं को दिखाती है। उनके विचारों की उस शक्ति को परिभाषित करती है जिसने उनके जाने के बाद भी सच्चाई, हौंसले, बेपरवाह, बेधड़कपन की अलख को बुझने नहीं दिया है। पिता के निधन के बाद उनकी विरासत को संभाला और ‘लंकेश पत्रिके’ की संपादक बनीं। संपादक चंदन गौड़ा लिखते हैं कि कर्नाटक में नक्सलियों के प्रति गौरी लंकेश ने खुलापन दर्शाया, उसकी वजह से उनके भाई के साथ, जो साप्ताहिक के मालिक थे, मतभेद हो गए और इस वजह से उन्हें 2005 में ‘गौरी लंकेश पत्रिके’ नाम से नया साप्ताहिक शुरू करना पड़ा।

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गौरी लंकेश (1962-2017) ’गौरी लंकेश पत्रिके’ की संपादक थीं. अंग्रेज़ी भाषा में प्रिंट पत्रकार के रूप में अपना करियर शुरू करते हुए उन्होंने टाइम्स ऑफ़ इंडिया और संडे पत्रिका के लिए काम किया.1990 के दौर में नई दिल्ली में ईटीवी न्यूज़ की ब्यूरो प्रमुख थीं. 2000 में पिता पी. लंकेश के निधन के बाद गौरी ने साप्ताहिक पत्रिका ‘लंकेश पत्रिके’ का संपादकीय कार्य संभाला जिसे 1980 में उन्होंने शुरू किया था. 2003 में कर्नाटक सांप्रदायिक सद्भाव फोरम में शामिल होने के बाद वह कर्नाटक के सामाजिक आंदोलन का एक जाना माना चेहरा बन गई थीं. फोरम ने चिकमंगलूर के बाबा बूदनगिरि में दरगाह पर कब्जा करने के संघ परिवार के अभियान का मुकाबला किया. एक एक्टिविस्ट और पत्रकार के रूप में वह न्याय, समता और प्रेम के लिए अनेक संघर्षों में सबसे आगे खड़ी रहीं. 5 सितबर, 2017 को बेंगलुरू में कुछ अज्ञात बंदूकधारियों ने गौरी लंकेश की उनके घर के बाहर गोली मारकर हत्या कर दी.

विचार अगर उन्मुक्त हों, तो किसी भी व्यक्ति के लिए समाज में कई विरोध उत्पन्न हो जाते हैं। गौरी लंकेश के साथ भी ऐसा ही हुआ। उनके पिता की तरह वे भी विरोध का सामना करती रहीं। यह उनकी आखिरी सांस तक जारी रहा।

पुस्तक में उनका एक साक्षात्कार भी पढ़ा जा सकता है जिसमें वे कहती हैं :’मेरी पहली पसंद डॉक्टर बनना था परन्तु ऐसा नहीं हुआ, तो मैंने पत्रकार बनने का निर्णय लिया।’

गौरी के बारे में विभिन्न संगठनों से जुड़े लोगों के विचार भी आपको इस किताब में पढ़ने को मिलेंगे। उसके बाद हम गौरी को ओर करीब से जान सकते हैं।

कुल मिलाकर यह किताब नई उर्जा प्रदान करती है हर उस इंसान के लिए जो नई सोच, नये विचार रखता है। और सबसे बड़ी बात, जो आवाज़ उठाने की हिम्मत रखता है।

'मेरी नज़र से : चुनिंदा लेख
संपादक : चन्दन गौड़ा
अनुवाद : अनूप कुमार भटनागर
प्रकाशक : जगरनॉट बुक्स
पृष्ठ : 296

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