इंदिरा गांधी की ज़िन्दगी के दिलचस्प ख़ुलासे

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यह पुस्तक हमें इंदिरा के हर उस दौर से रुबरु कराती है जिसमें एक राजेनता अनगिनत उतार-चढ़ावों से गुजरती हैं.


‘जवाहरलाल और कमला की बेटी, फिरोज़ की बीवी, संजय और राजीव की मां, सोनिया तथा मेनका की सास, प्रियंका, राहुल और वरुण की दादी मां, लेकिन इन सबसे भी अधिक देश भर की माता इंदिरा गांधी ने अनेक भूमिकाएं ऐसे कुशल अभिनेता की तरह निभाईं जिसका रंगमंच समूचा भारत बना।’

अनुभवी पत्रकार और विख्यात स्तंभ लेखिका सागरिका घोष द्वारा बहुत शोधपूर्ण आधार पर लिखी पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद कर अनंत मित्तल ने उसे हिन्दी पाठकों को सुलभ कराने का अच्छा प्रयास किया है। पुस्तक का नाम है ‘इंदिरा - भारत की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री’। इसका प्रकाशन जगरनॉट बुक्स ने किया है।

लेखिका सागरिका घोष ने प्रस्तावना में ही स्पष्ट कर दिया है कि वे कोई इतिहास लेखिका नहीं बल्कि अनुभवी पत्रकार और स्तंभ लेखिका हैं। हालांकि इतिहास उनका प्रिय विषय है तथा वे इतिहास से स्नातक भी हैं। वे इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व से प्रभावित रही हैं तथा इस पुस्तक को लिखने से पूर्व उनके करीबी कई नेताओं, नौकरशाहों तथा देशी-विदेशी पत्रकारों से बातचीत और इंदिरा गांधी की लिखी विभिन्न जीवनियों आदि के अध्ययन के आधार पर वास्तविक इंदिरा की खोज कर पाठकों तक पहुंचाने का इस पुस्तक के द्वारा प्रयास किया है।

सागरिका घोष ने इंदिरा गांधी के जीवनीपरक व्यक्तित्व और इंदिरा के स्त्रीरुपी तथा नेता के रुप में पत्रकारीय आकलन करते हुए उनका इतिहास लेखबद्ध किया है। इस पुस्तक में लेखिका ने वर्तमान भारतीय राजनीति में कुनबापरस्ती, लोकतंत्र, धार्मिक कलह, तानाशाह नेतृत्व और लैंगिक समीकरणों से जुड़े सवालों की तुलना इंदिरा गांधी के कार्यकाल से करते हुए जबाव की तलाश की कोशिश की है। इनका जबाव मौजूदा परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिक हो गया है।

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इंदिरा गांधी के जादू का आखिर रहस्य क्या है? ऐसा क्यों है कि उत्तर भारत की दूदराज बस्तियों में बड़े-बुजुर्ग आज भी उनका नाम सुनते ही भावुक होकर यादों के भंवर में गोते लगाने लगते हैं? ऐसा क्यों है कि दक्षिण भारत के गांवों में आज भी उनकी तस्वीर लोगों ने अपने घरों में लगा रखी है? ऐसा क्यों है कि नई दिल्ली के 1 सफरदगंज रोड स्थित उनके पुराने घर में बने उनके स्मारक संग्रहालय में आज भी बड़ी संख्या में लोग उनकी याद ताजा करने आते हैं जिनकी संख्या महात्मा गांधी के स्मारकों, गांधी स्मृति अथवा उनकी समाधि राजघाट के दर्शन करने आने वालों से कहीं अधिक है? ऐसा क्यों है कि उनके बाद दो पीढ़ियां निकलने के बावजूद कांग्रेस को वोट जुटाने के लिए उन्हीं के व्यक्तित्व को आगे रखना पड़ता है?

यह पुस्तक हमें इंदिरा के हर उस दौर से रुबरु कराती है जिसमें एक राजेनता अनगिनत उतार-चढ़ावों से गुजरती हैं। 49 वर्ष की आयु में इंदिरा पहली बार प्रधानमंत्री बनती हैं तो हवाओं का रुख बदल जाता है। हालांकि उससे कुछ समय पूर्व मोरारजी देसाई मांग करते हैं कि कांग्रेस के सभी सांसद दोनों में से एक को चुनने के लिए मतदान करें। जनवरी 1966 में हुए गुप्त मतदान में इंदिरा गांधी को 355 वोट प्राप्त होते हैं, जबकि मोरारजी मात्र 169 पर सिमट जाते हैं। पीएम की कुर्सी तक पहुंचने से पहले के बारे में सागरिका लिखती हैं कि यदि लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु न होती, यदि इंदिरा कनिष्ठ मंत्री ही बनी रहतीं तो शायद वे अंततः भारत छोड़ कर चली जातीं। समय ने ऐसी करवट ली कि शास्त्री की मृत्यु ने उनका रास्ता साफ कर दिया।

इंदिरा गांधी ने ‘ईश्वर के नाम पर शपथ’ लेने के बजाय ‘मैं विधिपूर्वक प्रतिज्ञा करती हूं’ शब्दों का उच्चारण किया। ऐसे तमाम उदाहरण इस पुस्तक में देखने को मिलते हैं जब नेहरु की बेटी चीजों को अपनी तरह से मोड़ते हुए आगे बढ़ती है। उसका उद्देश्य जो भी रहा हो, लेकिन वह ‘गूंगी गुड़िया’ की अपनी छवि को बदलती गयी। वह तानाशाह की अपनी छवि को अपने आखिरी दिनों में बदल रही थी। 1984 में इंदिरा गांधी की उनके सुरक्षा गार्ड हत्या कर देते हैं। वह घटना और उसके बाद की घटनाएं भारत को बदल कर रख देती हैं।

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यह किताब कई उत्तर तलाशती है और कई रहस्यों का तथ्यों के साथ खुलासा करती है। उस समय की राजनीति और आज की राजनीति किस तरह परिवर्तित हुई, आपातकाल में क्या हुआ सहित निजि खुलासे भी इस किताब को पढ़ने लायक बनाते हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि इंदिरा गांधी और उनसे जुड़े लोगों की जिंदगी में झांकने का यह आसान जरिया मालूम पड़ती है।

आपातकाल के दौर पर सागरिका लिखती हैं कि बीबीसी के मार्क टली सहित विदेशी पत्रकारों को भारत छोड़ कर जाने का फरमान सुना दिया गया था। ढाइ सौ से अधिक पत्रकारों को गिरफ्तार कर लिया गया जिनमें इंडियन एक्सप्रेस से जुड़े कुलदीप नैयर भी शामिल थे। एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार उस समय एक लाख से ज्यादा लोगों को बिना मुकदमे ही बंदी बनाकर रखा गया। कई बंदी सलाखों के पीछे मर गए। जयपुर की महारानी गायत्री देवी और ग्वालियर की विजया राजे सिंधिया को चोर-उच्चकों के बीच जेल में डाल दिया गया। सागरिका लिखती हैं कि संजय गांधी के साथी बंसीलाल और ओम मेहता केन्द्र सरकार में रक्षा और गृह मंत्रालय का भार संभाल चुके थे। प्रधानमंत्री सचिवालय और समानांतर सरकार के बीच बार-बार खींचतान होने लगी थी।

‘संजयवाद के चढ़ते सूरज, नागरिकों पर कोड़े बरसा कर उन्हें सरकारी नीति के अनुसार ढालने को उद्धत निरंकुश राज सत्ता के दबदबे को दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके से झोंपड़-पट्टी हटाने और जबरिया नसबंदी मुहिम के पीछे महसूस किया गया।’

सागरिका घोष की यह पुस्तक अपनी अलग तरह की पुस्तक इसलिए भी है क्योंकि यह इंदिरा गांधी के नरम पहलुओं को भी एक सिरे से उभारती है। यह उनकी सकारात्मक छवि और नकारात्मक छवि को परिभाषित करती है। यह इंदिरा का महिमामंडन न करते हुए तर्कसंगत बात करती है।

मेनका गांधी याद करती हैं कि वे हम सभी के लिए कुछ न कुछ सिखाने वाली मां थीं।’ वहीं नटवर सिंह कहते हैं कि ‘वे जब कमरे में आतीं तो ऐसा लगता मानो बिजली कड़क गयी हो। जबकि पत्रकार मार्क टली उन्हें ‘लौह महिला’ नहीं मानते। टली इंदिरा को ‘द्वैत की शिकार महिला’ समझते हैं जो निर्णय करने में इतनी देर लगा देती थीं कि परिस्थितियां उनके हाथ से निकल जाती थीं कि उन्हें कई गुना अधिक भरपाई करनी पड़ती थी और ‘कड़े उपाय’ अपनाने पड़ते थे।

सागरिका घोष की यह पुस्तक इंदिरा गांधी की कहानी का दिलचस्प दस्तावेज है!

'इंदिरा - भारत की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री
(Indira: India’s Most Powerful Prime Minister)
लेखिका : सागरिका घोष
अनुवाद : अनंत मित्तल     
प्रकाशक : जगरनॉट बुक्स
पृष्ठ : 152

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