राजा हरुहीत : उत्तराखंड के कुमाऊं का एक वचनबद्ध वीर

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बेहद रोचकता से लिखा गया यह प्रेणादायक इतिहास उत्तराखंड के लोगों को एक सूत्र में बांधता है.

हिमालय का सौन्दर्य जितना आकर्षक है उतनी ही सुन्दर कहानियाँ यहाँ की लोक कथाओं और गीतों में दिखाई देती है। उत्तराखंड के विभिन हिस्सों की कहानियाँ हमेशा लोकगाथाओं के रूप में जन जन तक पहुँची हैं। ऐसी ही एक लोककथा राजा हरुहीत की है। राजा हरूहीत की मार्मिक कहानी को फिर एक पुस्तक में संजोने का काम सल्ट के युवा लेखक भगत रावत ने किया है। यह पुस्तक सिया पब्लिशिंग हाउस द्वारा हाल ही में प्रकाशित की गई है।

राजा हरुहीत की कहानी लगभग 200 वर्ष पुरानी है। उत्तराखंड के लोग उन्हें भगवान के रूप में पूजते हैं। आज भी लोग उनके मंदिर में दुआ मांगते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में जगह जगह इनके मंदिर दिखाई देते हैं। राजा हरुहीत कूमाऊँ की संस्कृति और आस्था के प्रतीक हैं। न्याय के लिए गुहार करने वाले लोगों का विश्वास है कि राजा हरुहीत सही न्याय करते हैं और लोग राजा जी के दर्शन के लिये दूर-दूर से आते हैं।

हरुहीत सम्राट समर सिंह के आठवे संतान थे। राजा समर और उनके सात पुत्रों के मृत्यु के समय हरुहीत अपनी माँ की कोख में थे। राजा समर के मृत्यु उपरान्त राजा को मिलने वाली रकम बंद हो गई थी और राजकोष भी पूरी तरह खाली हो चुका था। उस समय हरूहीत की माँ और सात भाभियाँ बड़े ही दुखदायी दिन काट रहे थे। एक दिन खेल-खेल में राजा हरूहीत को अपने बीते हुये समय के बारे में पता चला तो वह माँ के आगे जिद कर के बैठ जाते हैं कि उन्हें उनके बीते समय का इतिहास बतायें। माँ ने राजा हरूहीत को उनके सातो भाईयों के और अपने राजकाज के बारे में विस्तारपूर्वक बताया। जिसके बाद हरूहीत ने सभी लोगों को आदेश दिया कि वो उनके वचनों का पालन करे और चौदह साल की रकम एक साथ वसूल कर जमा कर जायें। हरूहीत की पुकार सुन पूरे इलाके में खलबली मच गई और एक दिन में ही सब कुछ चौदह वर्ष पहले की भांति कामकाज चलने लगा। वीर बालक हरूहीत के कार्यप्रणाली से दुश्मनों ने उनकी भाभियों को भड़का दिया और वह घर छोड़कर दो भाई भैसियों के घर चले गई। बाद में हरूहीत उन्हें ढूँढ़ते वहां पहुँच जाते हैं और रानीखेत युद्ध में एक बार हारकर मृत्यु शरीर में फिर से जीवन लौटने के बाद दोनों भाईयों को बुरी मौत देते हैं।

बाद में सातों भाभियों की शर्त पर हरुहीत भोट देश के यात्रा पर जाते हैं। इस देश के लोग जादू टोने से मनुष्य को जो चाहे बना सकते थे और उस जमाने में जो भी भोट देश के यात्रा पर जाता था वह वापस नहीं लौटता था।

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'राजा हरुहीत : एक वचनबद्ध वीर' पुस्तक का प्रकाशन सिया पब्लिशिंग हाउस ने किया है.

भोट यात्रा के दौरान उन्हें जगह-जगह पर स्थानीय राजाओं या समस्याओं से लड़ना पड़ा। हरूहीत लुतलेख के रास्ते भोट के साथ ही बागनाथ के मन्दिर में पूजा-अर्चना करते हैं। गंगला संग सात बहनों के भोट के जादुई मन्त्रों के शिकार हुये हरूहीत को मालू पुन: जीवित करती है। मालू अपने पिता और हरूहीत में एक का चयन चंद पलों में कर हरूहीत का आजीवन साथ देने की कसम लेती है। आगे भोट पर विजय प्राप्त कर मालू से विवाह के साथ भोट से राजा हरूहीत सल्ट को वापस आ जाते हैं। सल्ट लौटकर सातों भाभियों ने कुछ दिन के अन्तराल में ही रानी मालू शाही को रामगंगा के गहरे पानी में डूबो दिया। मालू शाही की मौत से राजा पूरी तरह जीवन के सार से खिन्न हो जाते हैं और सातो भाभियों को दण्ड देते हुए हिन्दू रिवाज के साथ अग्नि को समर्पित कर देते हैं। आगे माँ से आग्रह करते है कि वह अपने सांस को रोक कर प्रभू के चरणों में अपने प्राण रख दे। माँ के मृत्यु के साथ माँ की अन्तेष्टि करने के बाद राजा हरूहीत दो चिता लगाकर मालू संग खुद और अपने हमदर्द घोड़े को भी अग्नि को समर्पित कर देते हैं।

पुस्तक को लिखने के मकसद के बारे में बात करते हुए लेखक भगत रावत कहते हैं -'उत्तराखंड से पलायन के कारण वहां के रीति-रिवाज़ और कुल देवी देवताओं के प्रति लोगों की भावनाएं भी पलायन कर रही हैं। राजा हरुहीत ने जिस तरह से अपने बंजर खेतों को फिर से उपजाऊ बनाया और अपनी प्रथा का हमेशा पालन किया था। इस तरह का प्रेणादायक इतिहास उत्तराखंड के लोगों को एक सूत्र में बांधता है। यह हमें अपने पूर्वजों के बलिदान की याद भी दिलाता है.'

पहाड़ों में ही जीवन व्यतित कर रहे साधारण परिवार के भगत रावत पहाड़ के परम्पराओं और रीति रिवाजों के साथ पहाड़ के संस्कृति और कुल देवताओं के प्रति युवाओं के बढ़ती उदासीनता को देखते हुए कुमाऊँ के वीर राजा हरुहीत की जीवन गाथा पर लिखी इस पुस्तक से पहाड़ की विलुप्त होती परम्परा और वीरगाथाओं की भूमि के प्रति युवाओं से आह्वान करते हैं कि हम सभी लोग जहाँ भी रहे अपने पहाड़ प्रेम के प्रति सदैव सकारात्मक रहें।

भगत रावत कुमाऊं विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एम.ए. हैं. साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले भगत एक साधारण दुकान से अपनी आजीविका चलाते हैं.
‘राजा हरुहीत : एक वचनबद्ध वीर'
लेखक : भगत रावत
प्रकाशक : सिया पब्लिशिंग हाउस
पृष्ठ : 74

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