मां, माटी, मानुष : प्रकृति से स्पष्ट संवाद

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प्रकृति तथा पर्यावरण प्रेम से साक्षात्कार के लिए ‘मां, माटी, मानुष’ एक बेहद पठनीय काव्य संग्रह है.

“कहने की जरूरत नहीं कि इन कविताओं में हम एक सफल सार्वजनिक हस्ती के मन के एकांत को, और मस्तिष्क की व्याकुलता को साफ़-साफ़ शब्दों में पढ़ सकते हैं”

राजकमल प्रकाशन ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कविताओं का संग्रह प्रकाशित कर पाठकों को ‘मां, माटी, मानुष’ नामक पुस्तक के रुप में उपलब्ध कराकर ममता के कवि हृदय का परिचय कराया है। इस पुस्तक में दीदी की 110 कविताओं का संग्रह है। सभी कविताओं से पर्यावरण, प्रकृति और पशु पक्षियों के साथ मानवीय संवेदनाओं की गूंज स्पष्ट होती है।

कवयित्री को पहाड़ों, नदियों, झरनों, झीलों, वनों, पशु पक्षियों और बरसते बादलों के बीच अटूट मानवीय रिश्ता दिखाई देता है। वे चाहती हैं कि हमेशा इन्हीं के बीच जीवन गुज़ारें। उनकी कविताओं में झर-झर झरते झरनों की ध्वनि, कल-कल करती नदियों के नाद, बर्फीले पर्वतों की चोटियों की ऊंचाई, उनसे सूर्य की धवल धूप में पिघलता जल और पेड़ों पर चहचहाती चिड़ियों के कलरव तथा घुमड़ते बादलों की गर्जना का सजीव चित्रण उन्हें छायावाद से भी कई कदम आगे ले जाता है।

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ये ममता बनर्जी की कवितायेँ हैं; ममता बनर्जी, जो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं, अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की मुखिया और 'फायर ब्रांड' नेता, जिन्हें उनके दो टूक लहजे और अक्सर गुस्से के लिए भी जाना जाता है.
इन कविताओं को पढ़कर आश्चर्य नहीं होता. दरअसल सार्वजानिक जीवन में आपादमस्तक डूबे किसी मन के लिए बार-बार प्रकृति में सुकून के क्षण तलाश करना स्वाभाविक है. लेकिन ममता प्रकृति की छाँव में विश्राम नहीं करातीं, वे उससे संवाद करती हैं. प्रकृति के रहस्यों को सम्मान देती हैं, और मनुष्य मात्र से उस विराटता को धारण करने का आह्वान करती हैं जो प्रकृति के कण-कण में विद्यमान है.

ममता बनर्जी की कलम से :
कई भाषाओँ की जन्मभूमि भारतवर्ष से जितना मुझे प्रेम है उतना ही प्रेम है इस पुण्यभूमि की सारी भाषाओं से भी. इन भाषाओं में हिंदी भाषा मुझे विशेष प्रिय है. संसदीय राजनीति में मेरे कदम रखने के वर्षों पहले ही इस भाषा के साथ मेरा परिचय और सम्बन्ध दोनों स्थापित हो चुका था. केवल किसी विशेष प्रयोजन से यह भाषा सीखने के लिए मैं बाध्य नहीं हुई बल्कि बिना प्रयोजन के विभिन्न क्षेत्रों में जिस तरह से यह भाषा मेरे काम आई, इसी कारण ये भाषा मेरे प्रिय भाषा बन गयी. केवल बंगाल के इस पुराने शहर कलकत्ता में ही नहीं बल्कि बंगाल के प्रत्येक जिले में जो भाषा वैचित्र्य है, हिंदी भाषा की कद्र सर्वाधिक है. इसके फलस्वरूप हिंदी-भाषा भाई-बहनों को समझने के लिए, उनके साथ भावों का आदान-प्रदान करने के लिए हिंदी भाषा मेरे संप्रेषण-माध्यम बन गई. मुझे इस भाषा से उतना ही लगाव है, जितना लगाव इस भाषा के बोलने वालों से है. मेरी कविताओं के भाषांतरण का जब प्रश्न आया तो मेरे चित्त में पहली भाषा के रूप में हिंदी ही आयी. क्योंकि मैं जानती हूँ कि यह भाषा मेरी कविताओं के भाव और विषय-वस्तु को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचा पाएगी-पूरे देश में और देश के बाहर भी हिंदी-भाषी लोगों तक पहुँचा देगी.

अंधाधुंध वनों के कटान तथा नासमझी पूर्ण खनन से टूटते पहाड़ों की वेदना का सजीव चित्रण उन्होंने ‘पहाड़ रुदन’ नामक कविता में किया है। ‘हरियाली’ नामक कविता में ममता वृक्षारोपण और हरितधरा का आहवान करते हुए कहती हैं -
‘‘हरियाली बचाओ, हरियाली जगाओ
हरियाली बचाकर विवेक दिखाओ
हरियाली का ध्वंस करो मत
सृष्टि का मूलोच्छेदन करो मत.’’

‘मां माटी मानुष’ ममता बनर्जी की मूल रचनायें बांग्ला में हैं जिनका हिन्दी अनुवाद सोमा बनर्जी तथा प्रतीक सिंह ने किया है। कवयित्री ने पुस्तक में अपनी ओर से स्पष्ट किया है कि हिन्दी मेरी प्रिय भाषा है जिसे बोलने, पढ़ने तथा लिखने वाले दुनियाभर में हैं। इसलिए हिन्दी अनुवाद के बाद यह पुस्तक अधिक लोगों में पढ़ी जाएगी।

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पुस्तक में ‘शीत लहर’, ‘पहाड़ और नदी’, ‘वन सुन्दरी’, ‘प्रकृति का भंडार’, ‘पेड़ सृष्टि’, ‘बालुकामय सागर-तट’, ‘कूड़ा’, ‘मेरे आंगन में’, ‘वनांजलि’, ‘प्रकृति तीर्थ’, ‘नदी का ठिकाना’, ‘आंधी’ आदि शीर्षकों वाली कविताओं में छिपे संदेश आज के भौतिक युग में अत्यंत प्रासंगिक हैं। इस पुस्तक को उन नेताओं तथा सामाजिक चिंतकों को भी पढ़ना चाहिए जो मां, माटी और मानुष के संबंधों तथा इनके अस्तित्व को दरकिनार कर पद, प्रतिष्ठा तथा धन लिप्सा में व्यस्त हैं। इन रचनाओं को पढ़ने पर दीदी के अंदर एक और दीदी के दर्शन होते हैं। वे जितनी राजनीतिक धरातल पर मजबूत तथा अविचल हैं उसी तरह एक महान रचनाकार भी हैं। ममता बनर्जी के प्रकृति तथा पर्यावरण प्रेम से साक्षात्कार के लिए ‘मां, माटी, मानुष’ एक बेहद पठनीय काव्य संग्रह है।

ममता बनर्जी अबतक कविता, निबंध, आत्मकथा, आलोचना और कहानी आदि कुल मिलाकर 45 पुस्तकें लिख चुकीं। राजनीति की अतिव्यस्तता में यह प्रयास बहुत दुर्लभ है। कन्याश्री योजना के लिए उन्हें पिछले साल यूनेस्को ने पुरस्कृत किया है।

"मां, माटी, मानुष"
ममता बनर्जी
अनुवाद : सोमा बनर्जी, प्रतीक सिंह 
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ : 184

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