रेखा की ज़िन्दगी के दर्द भरे लम्हों और सफलता के शिखर की कहानी

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"भानुरेखा बहुत शर्मीली और मुहब्बत से भरी हुई ऐसी लड़की थी जिसकी जिंदगी में सिर्फ अकेलापन था"

मशहूर तथा चर्चित फिल्मी अदाकारा के संघर्षपूर्ण जीवन की हकीकत बयान करती प्रसिद्ध लेखक यासिर उस्मान की पुस्तक ‘रेखा: कैसी पहेली ज़िंदगानी’ का हिन्दी अनुवाद जगरनॉट बुक्स द्वारा किया गया है। अनुवादक हैं -सुशीलचन्द्र तिवारी और अनुराग शुक्ला।

भानुरेखा गणेशन, जिन्हें रेखा के नाम से जाना जाता है, का जीवन बचपन से सफलता के शिखर तक पहुंचने में जिस संघर्ष और बेहद उपेक्षाओं से गुजरा उसका सिलसिलेवार वर्णन इस पुस्तक में बहुत सरल, सुरुचिपूर्ण ढंग तथा पठनीय शैली में किया गया है।

परिवार के खराब आर्थिक हालात में चौदह साल की, मोटे डील-डौल और गहरी रंगत वाली भानुरेखा कैसे बॉलीवुड आईं। कैसे वो फिल्म उद्योग की सबसे ग्लैमरस सेक्स सिंबल रेखा बनीं? कैसे उनके बेबाक रवैये और सेक्स पर खुले विचारों ने बॉलीवुड को हिलाया और कैसे इंडस्ट्री ने उन्हें कुचलने की कोशिश की?
यह किताब अपने वक्त के सुपरस्टार के साथ उनके रिश्तों, उनकी दूसरी प्रेम कहानियों, उनके पति की खुदकुशी और अपनी मर्दाना चाल-ढाल वाली उनकी सेक्रेटरी फरज़ाना से उनकी अजीबोगरीब रिश्ते की सच्ची दास्तान बयान करती है।

‘उमरावजान’ फिल्म में स्मिता पाटिल जैसी नामचीन अभिनेत्री को दरकिनार कर फिल्म निर्देशक मुजफ्फर अली द्वारा रेखा को लेने पर सवाल करने पर उन्होंने स्पष्ट कहा था -‘‘रेखा की आंखों में गिर कर उठने की कैफियत थी, जिंदगी लोगों को हिलाकर रख देती है। टूटकर बिखरने के बाद वापस संभलने की ताकत का अहसास रेखा की आंखों में था।’’ वास्तव में रेखा का अतीत दुख और दुश्वारियों से सराबोर जीवन को जीतने की दास्तां है।

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जब रेखा की मां पुष्पावल्ली ने उन्हें 1969 में मात्र 13 साल की उम्र में अपना कर्जा उतारने के लिए जबरन बम्बई कुलजीत पाल नामक फिल्म निर्माता की फिल्मों में काम करने को भेजा तो उसका जो दर्द छलका उसे लेखक ने रेखा के शब्दों में पुस्तक में यूं दर्ज किया है -
‘‘बम्बई एक जंगल जैसा था, जहां मैं खाली हाथ बिना किसी हथियार के आ पहुंची थी। वो मेरी ज़िन्दगी का बेहद डरावना दौर था। इस दुनिया के कायदों से मैं अनजान थी। मर्द मेरी संवेदनशीलता का फायदा उठाने की कोशिश करते। मुझे महसूस होता,‘मैं क्या कर रही हूं? मुझे स्कूल में होना चाहिए, आइसक्रीम और दोस्तों के साथ। मुझसे क्यों जबरदस्ती काम करवाया जा रहा है, क्यों मैं वो सबकुछ नहीं कर रही जो मेरी उम्र के बच्चे करते हैं?’ हरेक दिन मैं रोती। मुझे जबरदस्ती धकेल कर एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो ले जाया जाता था।’’

रेखा की मां से प्रेम विवाह करने वाले सुपरस्टार जैमिनी गणेशन चार बच्चों के बाद उन्हें छोड़कर अलग चले गये। घर की आर्थिक हालत खराब होने तथा रेखा की मां को फिल्मों में काम न मिलने से कर्ज भी बढ़ गया। इससे बेखबर नौंवी कक्षा में पढ़ने वाली रेखा की पढ़ाई बंद कर उसे फिल्मी दुनिया में उनकी मां ने जबरन धकेल दिया। एक साल लंबे संघर्ष के बाद रेखा को किसी तरह उपरोक्त निर्माता ने साइन किया।

इस पुस्तक में रेखा की किशोरवय से संघर्ष, चुनौतियों और टूटने, बिखरने तथा इस सबके बावजूद बार-बार ताकत के साथ फिर से उठ खड़े होने की लम्बी दास्तान दर्ज है। बड़ी-बड़ी अभिनेत्रियों को उन्होंने अपने बेजोड़ अभिनय से पीछे छोड़ दिया। यहां तक पहुंचने के लिए उन्हें अपनी मां की जोर जबरदस्ती, निर्माताओं के उत्पीड़न, भाई की मारपीट तथा लोगों से अशोभनीय टिप्पणियों को सहना करना पड़ा। वे इन कष्टों को झेलते और मुसीबतों को दरकिनार कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाने में सफल रहीं।

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1980 में उनकी फिल्म ‘खूबसूरत’ ने जमाना बदलकर रख दिया। इसमें वे दो चोटियों की लड़की के रोल में थीं। तमाम लड़कियों में दो चोटियों का रिवाज़ चल पड़ा। युवाओं को इस फिल्म में रेखा ने दीवाना बना दिया। इसी दौरान ‘मांग भरो सजना’, ‘जुदाई’, ‘एक ही भूल’, ‘साजन की सहेली’ और ‘बसेरा’ जैसी उनकी फिल्मों ने रेखा को सफलता के शिखर पर पहुंचाया। उन्हें 1981 में राष्ट्रपति ने श्रेष्ठतम अभिनेत्री के पुरस्कार से नवाजा। उनको सर्वश्रेष्ठ अदाकारा बनाने वाली फिल्म उमरावजान 1981 में आयी।

अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र, जितेन्द्र, सुनील दत्त और राजेश खन्ना जैसे विख्यात अभिनेताओं के साथ उनका प्रदर्शन जबरदस्त रहा। लेकिन इनमें से कई कलाकारों की पत्नियों को रेखा से ईर्ष्या होने लगी। जिनमें जया बच्चन और डिंपल कपाड़िया का नाम प्रमुख है। कई बड़े अभिनेताओं ने रेखा को बदनाम करने के किस्से गढ़े। इस तरह की विस्तृत जानकारी इस पुस्तक में है। प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह की रेखा के प्रति क्या राय थी, वह भी पुस्तक में है।

रेखा के अभिनय की कद्र करने वालों को उनके बारे में विस्तृत जानकारी के लिए यह पुस्तक जरुर पढ़नी चाहिए।

रेखा ने कहा था -‘‘मैं भानुरेखा हूं और हमेशा भानुरेखा ही रहूंगी। मुझे नहीं लगता कि लोग बदलते हैं। भानुरेखा बहुत शर्मीली और मुहब्बत से भरी हुई ऐसी लड़की थी जिसकी जिंदगी में सिर्फ अकेलापन था, और मैं आज भी बिल्कुल वैसे ही हूं।’’

'‘रेखा : कैसी पहेली ज़िंदगानी’
लेखक : यासिर उस्मान
अनुवाद : सुशीलचन्द्र तिवारी, अनुराग शुक्ला 
प्रकाशक : जगरनॉट बुक्स
पृष्ठ : 232

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