गिरिराज किशोर का उपन्यास पढ़ें और जानें हनुमान कौन थे?

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हनुमान कथा को उपन्यास में नया स्वरुप प्रदान करने के बावजूद मूल कथा में कोई बदलाव नहीं किया है.
साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित सुप्रसिद्ध उपन्यासकार, कहानीकार, निबंध और नाटकों के लेखक गिरिराज किशोर का पहला मिथकीय उपन्यास ‘आंजनेय जयते’ राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। इस उपन्यास में गिरिराज किशोर ने तुलसी के रामचरित मानस की तरह हनुमान को कपि(बन्दर) या कपीस(बन्दरों का राजा) मानने के बजाय आदिवासी समुदाय की एक वानर जाति माना है। वे मानते हैं हनुमान वनवासी हैं, वानरवंशी हैं लेकिन वानर नहीं हैं।

लेखक स्वयं कहते हैं कि हनुमान का नाम मैंने इसलिए उपयोग नहीं किया क्योंकि उससे वही वानर की आकृति सामने आएगी जो परम्परागत रुप से हमारे मस्तिष्कों में जमी हुई है। तुलसीदास ने यद्यपि उन्हें ‘ज्ञान गुण सागर’ कहा है, पर वानर आकृति को बरकरार रखा। यद्यपि वानर-आकृति और ‘ज्ञान गुण सागर’ होना साथ-साथ नहीं जाता, पर सदियों से वानर-आकृति और उनका बौद्धिक तथा सर्वगुण-सम्पन्न स्वरुप साथ-साथ चला आ रहा है। यह सम्भवतः रामचरितमानस की देन है।

इतने बड़े-बड़े विद्वान, संवदेनशील विचारक और मींमांसक हुए, यह सवाल क्या कभी किसी के मस्तिष्क में नहीं आया होगा कि वानर क्या ज्ञान गुण सागर और अद्वितीय महाबली हो सकता है? आया होता तो क्या वे विचार न करते? ऐसा नहीं लगता कि यह कोई धार्मिक प्रतिबद्धतता रही हो कि अगर हनुमान है तो उसे वानर ही होना चाहिए। इस बात से अनेक विद्वान अचंभित भी हैं और असहमत भी, कि हनुमान वानर थे।

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इस उपन्यास में अंजनी पुत्र आंजनेय से जुड़ी राम-रावण युद्ध, सीता-वनवास, लवकुश जन्म सहित पूरे उत्तर कांड की कहानी तुलसी कृत रामचरित मानस सदृश्य है। केवल लेखक का दृष्टिकोण सर्वथा अलग है।

जैसा कि ‘आंजनेय जयते’ पुस्तक के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है, इस उपन्यास में आंजनेय अर्थात हनुमान ही बाली वध से लेकर रावण वध और सीता को राम को सौंपने तक एक नायक हैं। लेखक ने हनुमान को राम का संकट-मोचक करार देने का प्रयास करते हुए राम-कथा में उपस्थित  अद्भुत विद्वान, शास्त्र ज्ञाता, विलक्षण राजनीतिज्ञ और अतुलित बल का भण्डार तक सिद्ध कर दिया है। इसी के साथ उन्हें कई आलौकिक शक्तियों का स्वामी भी करार दिया है।

यह उपन्यास अपनी अलग विशेषता के कारण पठनीय तो है ही लेकिन मिथकीय लेखन और सामाजिक हकीकत के बीच कई अजीब धारणाओं पर मंथन की ओर भी पाठक को ले जाने का प्रयास करता है।

लेखक कहते हैं कि ‘मैं भले ही आंजनेय को मानव कहने का पूर्ण अधिकार नहीं रखता, पर व्यक्तिगत स्तर पर मेरा मत है कि आंजनेय जैसे राजनय के ज्ञाता, वार्ताकार, ज्ञानी, अद्वितीय वीर, भक्त, संकटमोचन का वानर होना, अंधश्रद्धा रखने वालों के अलावा किसी के लिए स्वीकार नहीं होना चाहिए।

‘आंजनेय जयते’ उपन्यास को शुरु से अंत तक पाठक एकाग्र होकर पढ़ता है। इस कथा में लेखक आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था को भी समाहित कर बैठते हैं। यथा हनुमान मानते हैं कि हमारे स्वामी सुग्रीव और आगन्तुक भगवान राम की समस्याएं समान हैं। ऐसे में समझौतावादी खेल स्पष्ट होता है।

कुल मिलाकर लेखक ने हनुमान कथा को अपने उपन्यास में नया स्वरुप प्रदान करने के बावजूद मूल कथा में कोई बदलाव नहीं किया है। विद्वान लेखक की यह पुस्तक पठनीय है।

"आंजनेय जयते"
लेखक : गिरिराज किशोर
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ : 168

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