नोटबंदी, भारतीय मुद्रा और पैसे की असली कीमत

sachin-mittal-book-review
इस पुस्तक में कई ऐसे तथ्यों को सिलसिलेवार ढंग से बताया गया है जिनसे हमारा नाता है.
नोटबंदी के बाद से देश के हालात काफी बदले हैं। देश की आम जनता उससे अभी तक पूरी तरह उबर नहीं पाई है। कालाधन, भ्रष्टाचार और आतंकवादियों को ध्वस्त करने की जो बात 8 नवंबर 2016 को देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कही थी, वर्तमान स्थिति तक वह सही साबित नहीं हुई। नोटबंदी से न तो कालेधन पर लगाम लगी, न भ्रष्टाचार रुका और न ही किसी तरह की आतंकवादी घटना। बल्कि देखा जाए, उसके बाद से आम जनता को जो समस्यायें झेलनी पड़ीं, और कारोबार तथा उद्योग-धंधे चौपट हुए, उससे आर्थिक तौर पर हम पिछड़ते जा रहे हैं। किसी राजनीतिज्ञ या अमीर आदमी पर नोटबंदी का असर नहीं पड़ा। फिर हम कैसे मान लें कि पीएम मोदी का फैसला उचित था?

वित्तीय मामलों के विशेषज्ञ सचिन मित्तल अपनी किताब 'Are You Living the Biggest SCAM called MONEY?' के जरिए नोटबंदी और उससे उपजे सवालों पर अपनी राय रखते हैं। पुस्तक का प्रकाशन जोरबा बुक्स ने किया है।

पुस्तक में सचिन मित्तल ने स्पष्ट किया है कि वे नोटबंदी और उसके कारकों का मूल्यांकन नहीं कर रहे। उन्होंने कागज की मुद्रा की व्यापक स्तर पर वैधता पर गंभीर चर्चा की है। उन्हें लगता है कि ये मात्र कागज के टुकड़े हैं। कहीं हम इस बड़े घोटाले में तो नहीं जी रहे?

sachin-mittal-book-zorba
सचिन मित्तल नोटबंदी को पंचतंत्र की एक कहानी से जोड़कर चित्रों के माध्यम से समझाते हैं। उन्होंने मगरमच्छ और मछलियों के जरिये बेहद दिलचस्प तरीके से पूरी कहानी बताई है। जिस तरह नोटबंदी के बाद देश की जनता को उम्मीद बंधाई गई कि सब अच्छा होगा, उसी तरह मछलियों को भी मगरमच्छ से हमेशा के लिए निजात दिलाने का दावा किया गया, मगर हुआ वही -‘ढाक के तीन पात’।

लेखक ने बहुत ही अच्छी तरह से मुद्रा और धन के अंतर को स्पष्ट किया है। इस पर एक पूरा अध्याय लिखा गया है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया है कि जिस तरह सरकार ने कागज के नोटों को अवैध घोषित कर दिया था, क्या सरकार सोना और चांदी को भी किसी दिन अवैध घोषित कर सकती है? उत्तर है, नहीं वह ऐसा नहीं कर सकती। ऐसा इसलिए, क्योंकि ये आवश्यक वस्तुएं हैं और हमेशा जरुरी रहेंगी। सोलहवीं शताब्दी से ही व्यापार के क्षेत्र में सोना और चांदी वैध रहे हैं। जबकि कागज के नोटों की कीमत समय के साथ घटती या बढ़ती रहती है। उसी हिसाब से महंगाई भी कम या ज्यादा होती रहती है।

सचिन ने जिम्बावे का उदाहरण देकर कई बातों को उठाया है। उस देश में मुद्रा की कीमत इतनी गिर गयी थी कि गट्ठर भर जिम्बावे डॉलर से एक मामूली ब्रेड का टुकड़ा नहीं मिल पा रहा था। लोगों ने सोने में व्यापार करना शुरु किया। उनके लिए कागज की मुद्रा किसी काम की नहीं थी।

लेखक ने सवाल उठाया है कि ऐसा क्यों हुआ कि भारत में आरबीआई ने नोटबंदी पर सरकार के फैसले को बिना हिचक के मान लिया? सरकार को क्या अधिकार है कि वह हमारी गाढी कमाई को रातों-रात अवैध घोषित कर दे? आरबीआई की इस मसले पर चुप्पी ने आजतक कई सवाल खड़े किये हैं, मसलन नोटबंदी क्यों की गयी और इससे हमने हासिल क्या किया।

इस पुस्तक में कई ऐसे तथ्यों को सिलसिलेवार ढंग से बताया गया है जिनसे हमारा नाता है। हालांकि लेखक नोटबंदी के साइड इफैक्ट्स पर चर्चा अधिक करते नजर आए हैं, लेकिन उसके ज़रिए उन्होंने पाठकों को वित्तीय बारीकियों की हकीकत भी तफसील से समझाने का प्रयास किया है। कुल मिलाकर यह पुस्तक हर किसी के लिए सरल भाषा में पैसे की असली कीमत समझने के लिए अच्छी जानकारी मुहैया कराती है।

"Are You Living the Biggest SCAM called MONEY?"
लेखक : सचिन मित्तल
प्रकाशक : ज़ोरबा बुक्स
पृष्ठ : 134

No comments