बाज़ारवाद के पागलपन की हकीकत है ज्ञान चतुर्वेदी का ‘पागलखाना’

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बाजारवाद की गिरफ्त में फंसते जा रहे समाज और कालांतर में उसके दुष्परिणामों की तस्वीर है.
“बाज़ार में लटके दर्पणों पर भी तो भरोसा नहीं किया जा सकता. फ्रेम कितने भी जड़ाऊ और नक्कासीदार हों, बड़ी बात हमेशा ये ही रहेगी कि दर्पण कैसा है? मान लो कि बाज़ार ने किसी और ही शख़्स को इस दर्पण में लाकर बिठा दिया हो, तो? क्या पता कि बाज़ार ने वहां भी अपना मनमाफ़िक नागरिक बिठा दिया हो? ....ठीक वैसा आदमी, जैसा बाज़ार आपको बनाना चाहता है. दर्पण में रोज उसी-उसी को देखोगे तो अपने असली ख़ुद को भूल जाओगे- बाज़ार का यही विश्वास होगा.”

ज्ञान चतुर्वेदी का पांचवां उपन्यास बाजारवाद की गिरफ्त में फंसते जा रहे हमारे समाज और कालांतर में उसके दुष्परिणामों की मनोरंजक, लोमहर्षक और भयावह तस्वीर की कहानी है। व्यंगात्मक लेखन शैली के बेजोड़ लेखक ने भले ही बाजारवाद और उसकी पकड़ में आ रही पूरी दुनिया के दुष्परिणामों की काल्पनिक कहानी यहां रची है लेकिन जो आकलन उन्होंने किया है वास्तव में वह इस बाजारवाद के आरंभ से इसके विध्वंस तक के पागलपन की हकीकत है।

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वे स्वयं लिखते हैं कि समय ऐसा आया है कि विचार, सोच, धज, कपड़े-लत्ते, भाव, प्यार, मुस्कान, संस्कृति, कला, संगीत, साहित्य, लोक-जीवन की हर शै बाज़ार के इशारे पर चले लगी। पर तब भी कुछ सिरफिरे जीवन को बाज़ार से बड़ा मानते रहे। वे मानते थे कि बाज़ार जीवन के लिए है पर जीवन मात्र बाज़ार के लिए नहीं, जीवन के अर्थ बड़े हैं। ये पागल कहलाए। यह उन्हीं पागलों की कथा है। यह आपके समय की कहानी है।

यह किताब इस समय की हकीकत बयान करती है. मौजूदा हालात के साथ-साथ भविष्य में होने वाले रोचक घटनाक्रमों को भी दर्शाती है। ज्ञान चतुर्वेदी ने ऐसी किताब लिख डाली जिसने 'पागलों' के सामने आईना रखने का काम किया है। आप अपनी सूरत को गौर से देख सकते हैं। अपने बालों को सँवार सकते हैं। सोच सकते हैं, विचार सकते हैं, योजनाएं बना सकते हैं।

मगर इंसान इस तरह अटका हुआ है कि वह असहाय-सा हो गया है। ख़ुद को गँवाने के बाद फिर ख़ुद की तलाश में निकल पड़ता है। ज़िन्दगी बाज़ार के हवाले कर उसका ग़ुलाम हो गया है।

ज़िन्दगी बाज़ार में सिमट कर रह गयी है। ऐसा लगता है जैसे ज़िन्दगी बाज़ार है, और बाज़ार ज़िन्दगी है।

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दुनिया बाजारवाद के कब्जे में आ गयी थी। दुनिया बाजार में रहना और जीना सीख रही थी। पर कुछ लोगों ने बाज़ारवाद को पागलपन माना और बाजार को पागलखाना। एक चमकीले अंधेरे से भरा हुआ पागलखाना।

लेखक की कहानी इस पागलखाने की चकाचौंध के बीच रहने वाली दुनिया और बाजार से भाग रहे लोगों के पागलपन के साथ ज्ञान चतुर्वेदी की शानदार व्यंगात्मक शैली में आगे बढ़ती है। बाज़ार का अंग बन चुके लोग और उससे भाग रहे लोग एक-दूसरे को पागल मानने का भ्रम पाले हैं।

उपन्यास के अंत में बाज़ारवादी पागलखाने के अभ्यस्त लोगों और बाज़ारवाद के खिलाफ पगलाए लोगों को बाज़ारवाद के दुष्परिणामों का पता चलता है तो वे उसके खिलाफ एकजुट होकर उसे ध्वस्त कर देते हैं। लेखक ने अद्भुत व्यंगात्मक शैली में बाज़ारवाद के भविष्य के परिणामों की जो तस्वीर हमारे सामने पेश की है उसे केवल काल्पनिक नहीं बल्कि एक तथ्यात्मक भविष्य की रुपरेखा माना जाना चाहिए।

"पागलखाना"
लेखक : ज्ञान चतुर्वेदी
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ : 152

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