खामोशी, दर्द और खौफ़ से भरी दास्तान

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एक लड़की के साथ क्या-क्या होता रहा है, और वह खामोशी से उसे नियति मानकर सहती रही.
उसे तनिक भी अंदाजा नहीं था कि अनजाने में घर में किसी अजनबी द्वारा खींचे वे चंद फोटो उसकी पूरी ज़िन्दगी बदल कर रख देंगे। यकीनन उसके बाद उसकी ज़िन्दगी दूसरों की हो गयी। जो इंसान इसका ज़िम्मेदार है उससे आजतक उतनी ही नफरत है, लेकिन लेखिका की नासमझी भी काफी हद तक जिम्मेदार है।

यदि उस दिन वह उसे अपने घर न बुलाती। यदि उस दिन अलग-अलग अंदाज में फोटो लेने वाले से वह मना कर देती। यदि वह उस दौरान घर आये अपने भाई से कुछ न छुपाती। यदि दरवाज़ा बंद होने पर वह थोड़ा-सा विरोध भी करती तो शायद वह अपने शरीर की मालिक खुद होती, उसपर दूसरे किसी शख्स का हक न होता। फिर वह उन लोगों के पास न भेजी जाती जिनमें कई तो उसके बाप-दादा की उम्र के थे।

वह सौदेबाजों की गुलाम क्यों बनी? क्यों सीधी-सादी लड़की होना उसके लिए गुनाह बना? यह उपन्यास लेखिका की आपबीती है, जो आपके रोंगटे खड़े कर सकता है।

आखिर तब उसकी उम्र ही क्या थी...!!

वह तो केवल चौदह साल की थी, जब पहली बार उसके घर में उसका रेप हुआ।

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कैटलिन स्पेंसर द्वारा लिखी किताब ‘Please Let Me Go’ उनकी खुद की कहानी है। कैसे लेखिका का जीवन यौन-तस्करों ने बर्बाद कर दिया? कैसे उन्हें अपनी दो बच्चियों के लिए संघर्ष करना पड़ा? और, किस तरह वह तस्करों के चंगुल से निकल सकी? इस किताब का प्रकाशन मंजुल पब्लिशिंग हाउस ने किया है।

यह सच्ची दास्तान रुह को कंपा देती है। लेखिका की आपबीती सुनकर एक बार बेहद गुस्सा भी आता है। कई बार मन भर भी आता है। आखिर एक लड़की के साथ क्या-क्या होता रहा है, और वह खामोशी से उसे नियति मानकर सहती रही। वह सदमे में जीती रही, उसे बाईपोलर डिसऑर्डर भी हुआ। वह कायर भी नहीं कही जा सकती। हां, उसे बहादुर जरुर कहा जा सकता है। इतना, और उन भयानक परिस्थितयों में अक्सर लोग टूट कर बिखर जाते हैं। वह क्या था जिसने लेखिका को टूटने से बचाए रखा? वह क्या था जिसने उसे गहरी और सड़ांध भरी दलदल से बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया? यह किताब आपको तफ़सील से बताएगी।

कैटलिन लिखती हैं कि उन्हें एक के बाद दूसरे व्यक्ति के पास पहुंचाया जाता। कभी-कभी एक बार में कई-कई लोग होते। वे दर्द से छटपटातीं, कराहतीं, रहम की भीख मांगती, लेकिन बहशी उनके तन को तार-तार कर रहे होते। कई बार ऐसी स्थिति हो जाती कि लेखिका के शरीर का हर हिस्सा दर्द से भर जाता। उन्हें दरिंदगी से हवस का शिकार बनाया जाता था, और बहुत बार बिना किसी सुरक्षात्मक तरीका इस्तेमाल किए। एक दशक से अधिक लंबे समय तक वे जिस्म के सौदागरों के हाथों में खेलती रहीं। एक गैंग से दूसरे, फिर तीसरे, इस तरह उन्हें ब्रिटेन में जिस्मफरोशी करवाने वालों ने अपना गुलाम बनाया।

लेखिका को यह भी अच्छी तरह याद नहीं कि उनके साथ कितने लोगों ने दुराचार किया। वे कहती हैं कि शायद हजारों लोगों ने उनके साथ बलात्कार किया। हर उम्र के लोगों ने उनका फायदा उठाया। एक पिता ने तो अपने बेटे के जन्मदिन के मौके लेखिका को उसे बर्थडे गिफ्ट की तरह भेंट किया। दोनों ने तब कैटलिन का रेप किया।

लेखिका 11 बार गर्भवती हुई। 9 बार उसका गर्भपात हुआ। आज कैटलिन दो बच्चियां की मां हैं, जिनके पिता के बारे में वे दावे के साथ अधिक नहीं कह सकतीं।

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जब ज़िन्दगी नर्क से बदतर बन जाए तो अक्सर लोग खुद को खत्म करने की सोचते हैं। कैटलिन ने भी कई बार खुद को मारना चाहा। कभी ब्लेड से ख़ुद को काटा, कभी अधिक मात्रा में नशे की गोलियां निगल लीं। वे करती भी क्या, ऐसी ज़िंदगी से मौत भली। उन्हें हर बार बचा लिया गया।

लेखिका को दुख इस बात का है कि जिस्मफरोशी करवाने वालों का कुछ नहीं बिगड़ा। उनमें से अधिकतर एशियाई मूल के हैं जिनमें पाकिस्तान के बड़ी संख्या में हैं। ये लोग समूह बनाकर, संगठित रुप से किशोर लड़कियों को अपना शिकार बनाते हैं। लड़कियों को किसी भी तरह -बहला-फुसलाकर, ब्लैक-मेल कर, प्रताड़ित कर धंधे में उतार दिया जाता है। पुलिस भी उनका कुछ खास नहीं बिगाड़ पाती। यह खेल जारी है।

लेकिन वे भरोसे के साथ हैं और हिदायत भी देती हैं कि माता-पिता अपने बच्चों पर नज़र बनाए रखें, खासकर लड़कियों पर। कब उन्हें शिकार बना लिया जाए, कोई नहीं जानता। जैसे वे स्वयं सालों तक खुद से लगातार हो रहे रेप को परिवार वालों से छिपाती रहीं, अलग तरह के खौफ में जीती रहीं, वे नहीं चाहतीं कि बेटियां डर के साए में जिएं।

यह किताब समाज के लिए एक आईना है। किताब उन परतों को एक-एक कर छीलती चलती है, जो जिस्मफरोशी के धंधेबाजों को संगठित अपराध करने में मदद करता है। यह साफ करती है कि हम इंसान अभी तक जानवर हैं। हम सभ्य होकर भी पाश्विकता को दर्शाते हैं। हमारे लिए दूसरों की बेटियां हवस का सामान हैं, और जिंदा मांस जिसे जब चाहें भूखे गिद्धों की तरह नोंच खाएं। यह किताब एक सच्ची दास्तान है जिसे भुगतभोगी ने खुद लिखा है जिसे पढ़कर पाठक की सहानुभूति लेखिका के साथ हो जाती है। उसकी नज़रों में उसका कद बढ़ जाता है। शायद हर पाठक के मन में यह विचार जरुर कौंधता होगा कि हम ऐसे क्यों हैं, कि दूसरों का दर्द, तकलीफ हमारे लिए आनंद है।

"Please Let Me Go"
Caitlin Spencer with Linda Watson-Brown
Amaryllis (An imprint of Manjul Publishing House)
Pages : 288

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