सुर बंजारन : इतिहास और समय का बड़ा कैनवास

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भगवानदास मोरवाल का यह उपन्यास नौटंकी विधा पर बात करते हुए नयी ताज़गी का एहसास कराता है.

भगवानदास मोरवाल का उपन्यास 'सुर बंजारन' पढ़ते हुए, एकाएक आप ठिठकते हैं उस दोराहे पर आकर, जहाँ ये तय करना एक पाठक के लिए कठिन हो जाता है कि उपन्यासकार को किस धरातल पर रखकर परखें? वो लेखक, जिसका अब तक का लेखकीय चरित्र एक सामाजिक-राजनैतिक उपन्यासकार का रहा है. 'काला पहाड़', 'हलाला' और 'रेत' लिखकर कोई व्यक्ति अचानक नौटंकी की गुमनाम हो चली नायिका को अपने उपन्यास का प्लॉट बनाएगा, ये जानना अचरज पैदा करता है. हालाँकि, अपनी स्मृतियों की किताब 'पकी जेठ का गुलमोहर' में मोरवाल जी ऐसे कई सूत्र देते से जान पड़ते हैं.

हाथरस शैली की एक दौर में बेहद प्रचलित रही नौटंकी विधा और उसकी ढेरों नायिकाओं की तरह नज़र आने वालीं कृष्णा कुमारी के बहाने 'सुर-बंजारन' में लेखक ने परतदार आख्यान गढ़ते हुए उस इतिहास और समय का एक बड़ा कैनवास रच दिया है. इस तथ्य पर चौकन्नी निगाह रखते हुए कि इतिहास से गुज़रकर, उसकी जड़ता से दूरी बनाकर वर्तमान के उस बंजर तक सफल ढंग से आने की लेखकीय पहल हो सके. जिसकी नयी ज़मीन पर ढेरों कृष्णा कुमारी लगभग हाशिये पर जीते हुए दम तोड़ने को विवश खड़ी हैं.

संगीत पर आधारित कोई रचना हो, तो बरबस कुछ चीजों की सुध आती है. उस दौर का सांस्कृतिक परिवेश कैसा था? स्त्रियाँ अपने हुनर का इस्तेमाल घर की चाहरदीवारी से बाहर किस तरह कर सकती थीं? भाषा और संगीत के सहमेल से बनने वाली आवाज़ों के वृत्तान्त कौन सहेज रहा था? और सबसे ज़्यादा ये बात कि कहानी का उन्मेष किस सत्य या तर्क पर अपनी संरचना की सम्भावना तलाश रहा था. 'सुर-बंजारन' के संदर्भ में इन सारी जिज्ञासाओं के कुछ-कुछ समाधान मिलते हैं. और सुखद रूप से वो हल ख़ुद नौटंकी की कलाकार के मार्फ़त लेखक की रचनात्मकता के बहाने सामने आते हैं. 

अगर किसी उपन्यास में इसके सबसे सुंदर सन्धान को उदाहरण देकर बात की जाए तो 'उमराव जान अदा' में मिर्ज़ा हादी रुसवा और अवध की तवायफ़ उमराव जान के आपसी सम्बन्धों और गुफ़्तगू से उपन्यास अपनी रवानी पाता है. ये वैसे ही है, जैसे रस्सी पर काँपते हुए नट का तनाव और उसके कलात्मक संतुलन से बनने वाली अचूक करतबों की कतारें.आपसी विवेक का सुफल होती हैं.

'सुर-बंजारन', इसलिए ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए कि एक कुशल नट की तरह इस उपन्यास में भाषा, शिल्प, आख्यान और स्मृति को अत्यंत कलात्मक करतब में तब्दील किया गया है... एक पवित्र तरलता के साथ, जैसे कथानक ख़ुद नदी या जल होना चाहता हो. स्मृतियों के संसार का वर्तमान में रूपांकन इतना सुंदर बन गया है कि लगता है हम बचपन की उन टिमटिमाती कंदीलों से झाँकने वाली रंग-बिरंगी रोशनी के किसी उत्सव में अचानक ही आ गए हों.

~यतीन्द्र मिश्र (चर्चित पुस्तक 'लता - सुर गाथा' के लेखक)

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पढ़ें 'सुर बंजारन' का एक अंश..

गिर्राज प्रसाद!

नौटंकी, बल्कि कहिए स्वाँग के पाँचवे और छठे दशक की ऐसी हस्ती जिसके नाम भरतपुर के राजमहलों से लेकर, उसी की एक तहसील डीग की कन्हैयालाल-रामचन्द्र की मंडली, हाथरस के पण्डित नथाराम शर्मा गौड़; कन्नौज के निवासी, जाति से कुर्मी व नौटंकी की कानपुर शैली के पितामह त्रिमोहनलाल, और कन्नौज के ही बंधना गाँव के लालमन नम्बरदार की कम्पनियों की ख़ाक छानने का इतिहास दर्ज़ है।

भरतपुर के राजमहलों से जुड़ने का वाक़या, गिर्राज प्रसाद की यादों में आज भी किसी पुरानी हवेली के प्रवेश-द्वार के दोनों तरफ़, मेहँदी के अमिट हाथिए की तरह आज भी छपा हुआ है। यह गाना इन्हें आज भी याद है जिसे यहाँ के महाराजा प्रद्युम्न सिंह काँसे (शाम का खाना खाना) पर बैठने के बाद, आख़िर में ज़रूर सुनते थे। इस गाने का ज़िक्र एक बार जब राधेश्याम शर्मा ने बिजली कॉटन मिल के मालिक लाला रामबाबूलाल के सामने किया, तो वे भी इसे सुनने का लोभ संवरण नहीं कर पाये।

“गिर्राज जी, आपके उस गीत की हमने बड़ी चर्चा सुनी है, जिसे सुने बिना महराजा भरतपुर को नींद नहीं आती थी। ज़रा हमें भी तो सुनाओ उस गीत को! आख़िर उसमें ऐसा क्या है जिसे महाराज रोज़ाना सुनते थे।”

गिर्राज प्रसाद बिजली कॉटन मिल के मालिक लाला रामबाबूलाल के इस इसरार को टाल नहीं पाये, और सुनाने लगे यह गीत –

प्रेम कहानी सखी सुनत सुहावै ,
चोर चुरावै माल खज़ाना
सैंया नैनवा की निंदिया चुरावै
प्रेम कहानी सखी सुनत सुहावै।

लाला रामबाबूलाल ने गिर्राज प्रसाद के सुरीले कंठ से यह गीत सुना, तो वे भी पलभर के लिए जैसे सुधबुध खो बैठे। इसके बाद तो जब भी लाला रामबाबूलाल को फ़ुरसत मिलती, गिर्राज प्रसाद की यादों में क़ैद नौटंकी से जुड़े क़िस्सों की पिटारी खुलवाने के लिए मचल उठते। उस दिन भी ऐसा ही हुआ।

“गिर्राज जी, हाजी साहब का वो क़िस्सा ज़रा एक बार फिर से सुनाओ!”

“बाबू जी, आपको भी इन क़िस्सों को सुनने में बड़ा मज़ा आता है। इन्हें बार-बार सुनने के बावजूद आपका मन नहीं भरता है।” गिर्राज प्रसाद मुस्कराते हुए कहते।

“एक बात कहूँ गिर्राज जी, ये आपको लगते होंगे क़िस्से। मगर आप नहीं जानते कि दरअस्ल इन क़िस्सों में ही स्वाँग, मेरा मतलब है नौटंकी का इतिहास छिपा हुआ है।” लाला रामबाबूलाल ने धीरे-से अपने पोर से इतिहास का ज़र्द पन्ना पलटते हुए कहा।

“चलिए, आपको ऐसा लगता है तो एक बार फिर से यह क़िस्सा सुना ही देता हूँ। जैसाकि कि बाबू जी, मैं पहले भी बता चुका हूँ कि मुझे यह तो याद नहीं रहा कि यह वाक़या है कहाँ का।  मगर है बड़ा ही दिलचस्प। हुआ यह कि एक बार हमारी मंडली को नौटंकी के लिए बुलाया गया। हमारी मंडली जब वहाँ पहुँची, तो वहाँ के एक रुसूख़दार हाजी साहब ने नौटंकी करने से यह कहते हुए साफ़ मना कर दिया कि उनके घर में आज उनकी पोती की शादी है। हमारी मंडली के वहाँ पहुँचने पर उन्हें शायद यह लगा था कि इस नौटंकी मंडली को बेटे वाले लाये हैं। वैसे वे ख़ुद ऐसा नहीं चाहते थे, उन्हें तो किसी मौलाना ने यह समझा दिया था कि मुसलमानों में शादी-ब्याह के मौक़ों पर नाच-गाना शरीयत के ख़िलाफ़ होता है।

तो साब, अब हमारे लिए बड़ी परेशानी खड़ी हो गयी। बड़े मान-मनौव्वल के बाद वहाँ के लोगों ने हमारे ठहरने का इंतज़ाम कर दिया। खाने का हमें सूखा सामान भी दे दिया। मगर इसके बाद जैसे-जैसे वहाँ के लोगों में यह ख़बर फ़ैलने लगी कि गिर्राज की नौटंकी पार्टी आयी है, तो लोग इकट्ठे होने लगे। देखते-ही-देखते कुछ ही घंटों में तक़रीबन दस हज़ार आदमी इकट्ठे हो गये। अब तो पार्टी बुलाने वाले भी परेशान हो गये कि इस हाजी साहब को कैसे समझाया जाए। हार कर मैंने पब्लिक के सामने यह ऐलान कर दिया कि साहिबान आज आपके यहाँ खेल नहीं होगा। बस साब, इधर मैंने ऐलान किया और उधर पब्लिक जम कर बैठ गयी। मैंने उन्हें बहुत समझाने की कोशिश की कि जिन हाजी साहब की पोती की शादी है, जब वही कह रहे हैं कि हमारे मज़हब में इसका फ़रमान नहीं है, तो हम इस फ़रमान की कैसे तौहीन कर सकते हैं। अब साब, हमने ऐसा कह तो दिया मगर ऊपर से यह भी डर लग रहा था कि अगर शो नहीं होगा, तो पैसे भी नहीं मिलेंगे...और अगर पैसे नहीं मिलेंगे तो आर्टिस्टों और साज़िन्दों का ख़र्चा कैसे निकलेगा।”

“तो आपकी पार्टी वहाँ से बिना शो किये चली आयी?” वहाँ मौजूद पहली बार इस क़िस्से को सुन रहे एक श्रोता ने जिज्ञासा प्रकट करते हुए पूछा।

“अजी साब, कैसे चले आते। उसी वक़्त मुझे वहाँ एक बुज़ुर्ग दिखाई दिये। मैं उनके पास गया और उनसे गुज़ारिश की कि आप हमारे ऊपर एक एहसान कीजिएगा कि जहाँ हाजी साहब तशरीफ़ रखते हैं, आप हमें वहाँ ले चलिए। हम उनका दीदार करना चाहते हैं। वे हमें हाजी साहब के पास ले गये। हमने उन्हें आदाब किया और उनकी इजाज़त पाकर हम बैठ गये।

‘कहिए जनाब, कैसे आना हुआ?’ हाजी साहब ने बिना हमारी तरफ़ देखे बड़ी रौआबदार आवाज़ में पूछा। मैंने बड़ी मुलामियत के साथ कहा,’बंदा परवर, आपसे एक दरख़ास्त और गुज़ारिश यह है कि बाहर जो दस हज़ार आदमी धरना देकर बैठे हैं, वे क्या करें?’ ‘क्या करें, चले जाएँ अपने-अपने घर। आपको बता तो दिया गया है कि ऐसे खेल-तमाशे हमारी शरीयत के ख़िलाफ़ हैं।’ हाजी साहब ने पहले से ज़्यादा कड़क आवाज़ में कहा। इस पर मैंने कहा,’जनाब, आप दुरुस्त फ़रमा रहे हैं...बिलकुल शरीयत के ख़िलाफ़ हैं। मगर एक छोटी-सी दरख़ास्त है कि आप खेल देख लें। आपको जहाँ भी खेल पसंद नहीं आएगा, हम उसे उसी वक़्त रोक देंगे और अपना सामान समेट कर बाइज़्ज़त वापस लौट जाएँगे। इससे पब्लिक का भी मन रह जाएगा और जो लोग आपके यहाँ शादी में आये हैं उनकी भी परेशानी दूर हो जाएगी।’

‘चलिए, आपकी बात मान लेता हूँ मगर इस शर्त के साथ कि अगर हमें यह पसंद नहीं आया, तो इसे हम उसी वक़्त रुकवा देंगे!’ ‘बिलकुल जनाब। बहुत-बहुत-शुक्रिया आपका।’ तो साब, हाजी साहब ने अपने नौकरों से यह कहते हुए उसी समय दो गैस जलवा दी कि हम भी आ रहे हैं। देखेंगे क्या है। इस तरह हमने नौटंकी स्याहपोश शुरू कर दी। इस बीच हाजी साहब भी एक मूढ़े पर वहाँ आकर बैठ गये। हमने हाजी साहब के डर से कम, उनकी लम्बी और गहरी दाढ़ी के डर के मारे कुछ भी नाच-गाना नहीं कराया। सीधा स्याहपोश का वही सीन शुरू दिया, जिसमें महल के झरोखे में बैठी वज़ीरज़ादी अपने सामने रहल पर रखी कुरान की ग़लत तिलावत करती है।“

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इसके बाद गिर्राज प्रसाद ने सुर लिया और वज़ीरज़ादी द्वारा कुरान की ग़लत तिलावत करने वाले दोहे को गा कर सुनाने लगा –

अव्वल बिसमिल्लाह पढूँ, अल्ला: अल रहमान
करती सिपारा शुरू, अल्ला: अलम कुरान।

“तो साब, महल के नीचे खड़े गबरू ने जब यह सुना तो वह वज़ीरज़ादी को सुनाते हुए कहता है...क्या कहता है, ज़रा आप भी सुनें!” इतना कह गिर्राज ने फिर से बाएँ कान पर हाथ रखा ,और वज़ीरज़ादी को जवाब देते हुए गबरू के इस दोहे को सीधे पंचम सुर में लेते हुए गाकर सुनाने लगता है –

अव्वल आयत सही है, अल्ला: अल रहमान
सूरत सानी तलफ्फुज़, अल्लमल कुरान।

“तो बाबू जी, वज़ीरज़ादी ने पलट कर जैसे ही यह कहकर जवाब देना चाहा कि क्या मतलब है आपका, लीजै अपनी राह, वज़ीरज़ादी का किरदार निभाने वाली आर्टिस्ट को रुकने का इशारा कर, मैं हाजी साहब का चेहरा पढ़ने लगा। मैंने देखा कि अब वे नौटंकी की तरफ़ मुख़ातिब हो गये और अपनी दाढ़ी पर हाथ फैरने लगे। पहले उन्होंने शान्त बैठी भीड़ पर नज़र मारी और फिर एक पल रुक कर, हाथ उठा कर शो चालू रखने के लिए इशारा कर दिया। आप यक़ीन मानिए, बाख़ुदा ईमान से कह रहा हूँ कि जब तलक खेल ख़त्म नहीं हो गया, हाजी साहब अपनी जगह से हिले तक नहीं। वे भूल गये कि उनके घर में उनकी पोती की शादी भी है। जब खेल ख़त्म हो गया, तब वे मूढ़े से उठ कर मेरे पास आये और मेरा हाथ अपने हाथ में लेते हुए बोले,’माशा अल्लाह, हम आपसे बहुत ख़ुश हुए। क़सम से क्या गला पाया है आपने।’

मैंने इस पर कहा कि मुझे फ़ख्र है आप पर कि आप मेरी झोली में ख़ुशी भर रहे हैं...लेकिन यह बताइये कि आपको हमारा खेल कैसा लगा ? इस पर हाजी साहब बोले कि मेरे ईमान में ताज़गी आयी है। इससे ज़्यादा मैं कुछ नहीं बता सकता। बल्कि जाते-जाते बोले की गिर्राज जी एक बार गबरू का वह डायलॉग और सुना दीजिए! तो साब, मैंने उनकी इस गुज़ारिश पर, उनका मान रखते हुए एक बार फिर गबरू का यह डायलॉग सुना दिया कि –

ग़लत ना पढ़ना चाहिए, है ये क़ुरान शरीफ़।
इसी वास्ते आपको, देता हूँ तकलीफ़।।
देता हूँ तकलीफ़ इनायत जो हुजूर फ़रमावे।
दिलो जान हो शाद महल के ऊपर हमें बुलावे।।

गिर्राज प्रसाद ने आलाप लेते हुए चौबोला पूरा भी नहीं किया था कि लगा मानो लाला रामबाबूलाल के दफ़्तर में झील-नक्काड़े की धमक गूँजने लगी। थोड़ी देर के लिए लगा जैसे वज़ीरज़ादी और गबरू के आपस में अब भी संवाद गूँज रहे हैं।

“इसीलिए तो कह रहा था गिर्राज जी कि भले ही ये आपके लिए क़िस्से होंगे, मगर ये अपने आप में एक इतिहास है। देखा, हमारी इन लोक विधाओं में गंगा-जमुनी तहज़ीब की कितनी बड़ी ताक़त छिपी हुई है। जो आदमी यह कह रहा था कि खेल-तमाशे हमारे मज़हब या शरीयत के ख़िलाफ़ हैं, उसी को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि मेरे ईमान में ताज़गी आयी है। यह नौटंकी और उस गायकी का ही कमाल था कि हाजी साहब भी यह भूल गये कि उसके घर में उसी की पोती का निकाह भी है। इसीलिए कहते हैं कि गीत-संगीत का किसी धर्म या मज़हब से कोई वास्ता नहीं होता। उसका वास्ता तो सिर्फ़ और सिर्फ़ इंसानियत से होता है। वैसे गिर्राज जी, आपने तो कानपुर वाले त्रिमोहनलाल जी के साथ भी काम किया है, उनसे जुड़े हुए भी आपके पास बड़े क़िस्से होंगे?” लाला रामबाबूलाल गिर्राज प्रसाद को उकसाते हुए बोले।

“बाबू जी, क्या सुनोगे त्रिमोहनलाल जी और उनकी कम्पनी के बारे में। उनसे जुड़े मेरे पास कई क़िस्से हैं l किसी दिन फ़ुरसत मिलेगी तो आपको ज़रूर सुनाऊँगा। आज कई काम हैं। सोलह जुलाई के शो की भी तैयारियाँ बची हुई हैं। ऐसा करते हैं, यह शो निपट जाए तब बैठेंगे फ़ुरसत में।” इतना कह गिर्राज प्रसाद लाला रामबाबूलाल के पास से उठकर चले आये।

"सुर बंजारन"
लेखक : भगवानदास मोरवाल
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 336

2 comments:

  1. प्रभावशाली और साफ़-सुथरी प्रस्तुति ।

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  2. प्रभावशाली और साफ़-सुथरी प्रस्तुति ।

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