तकनीक और इन्सान : जिन्दगी जो बदल रही है

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लेखक ने सुझाव दिए हैं जिनसे भविष्य और वर्तमान में कई चीज़ों को हल किया जा सकता है.
तकनीक से जिन्दगी बेशक बदलती है, लेकिन इसके अच्छे और बुरे परिणाम दूरगामी भी होते हैं। इसे तरक्की के साथ जोड़कर देखा जा सकता है। बुद्धि के विकास में इसका कितना योगदान है? क्या यह हर तरह से इंसानों को मशीनों का गुलाम बना रही है? क्या हम बिना गैजेट्स के रह नहीं सकती? भविष्य के लिए यह कितना लाभदायक या घातक होगा?

ऐसे ही अनगिनत सवालों की गुत्थी सुलझाने की कोशिश लेखक रिचर्ड वाटसन ने की है। उनकी किताबें भविष्य और वर्तमान के विषय को अलग नजरिये से प्रस्तुत करती हैं।

'Digital Vs Human' में तकनीक और भविष्य की दुनिया पर चर्चा की गयी है। लेखक ने गंभीरता से उन पहलुओं को उठाया है जिनसे आने वाली तस्वीर बदलेगी। ये बदलाव काफी समय से जारी हैं, और इनमें भी जो खामियाँ रह गयी हैं, उन्हें दुरुस्त किया जा रहा है। इस किताब का प्रकाशन Amaryllis ने किया है।

कई बार नयी सोच के साथ कुछ ऐसा घट रहा है जो इंसानों को इंसानों से दूर ले जा रहा है। ये इस जाति के लिए अच्छा नहीं। यह चिंता का विषय है। मगर नयी तकनीक इसपर कार्य कर रही है। क्या ऐसा संभव है कि इंसान और तकनीक बराबर की हिस्सेदारी के साथ भविष्य को उन्नत करेंगे?

तकनीक किसी की दुश्मन नहीं है, बशर्ते उसे सही से इस्तेमाल किया जाए। गूगल, फेसबुक सरीखी कंपनियाँ उपभोक्ताओं को टारगेट बनाकर कार्य कर रही हैं। रिचर्ड वाट्सन ने इसपर काफी कुछ अपनी किताब में दर्ज किया है। देखा जाए तो कई मामलों में लेखक की बात आम आदमी की समझ में आ सकती है, और कई बार वह सवाल उठा सकता है। खुलकर कहने में हालांकि अधिक समय नहीं लगता, मगर इसका दूसरा पहलू यह है कि तकनीक के विकास से इंसानी विकास भी हो रहा है।

गूगल, फेसबुक आपके निजी डेटा का उपयोग कर रही हैं, और करती रहेंगी। वे सेवाओं में उन्नति के लिए जुटी हैं। इससे बहुत चीजें बदल रही हैं। हम उनसे अच्छी तरह वाकिफ हैं। आप कुछ भी, कभी भी, किसी भी तरह का खोज सकते हैं। अपनी दोस्ती का दायरा बढ़ा सकते हैं। अपनी बात चुटकियों में दुनियाभर में पहुंचा सकते हैं। खिड़कियाँ तो खुली हैं, फिर हवा के झोंके भी आएंगे। लेकिन उनसे बचने के उपाय वही खिड़की उपलब्ध करा रही है। .

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यह बात भी सच है कि आज के जमाने में कुछ भी फ्री नहीं होता। 'मुफ्त' चीज़ कीमत के साथ है। यहां तक की जो आप 'सर्च' करते हैं, उसका डेटा बेहद कीमती है। गूगल जानता है कि आप चाहते क्या हैं? उस तरह की सामग्री वह आपको उपलब्ध कराता है। यहाँ तक कि अमेजन पर जब आप कोई सामान तलाश करते हैं या खरीदते हैं, तो उससे जुड़े विज्ञापन आपको हर वेबसाइट पर दिखाई देने लगते हैं। मोबाइल पर भी यही होता है। मतलब साफ है आपकी मर्जी गूगल या फेसबुक जानता है। यानी सब पर निगरानी है। तभी विकीलीक्स के संस्थापक जूलियन असांज कहते हैं कि फेसबुक दुनिया की सबसे बड़ी जासूसी मशीन है।

रिचर्ड वाट्सन की यह पुस्तक कहती है कि इंसान तकनीक के बिना अधूरे हैं। उन्हें हर तरह से उसकी कीमत भी चुकानी पड़ती है। बाजार बढ़ता जा रहा है। उपभोक्ता का उसमें शामिल होना और उसका हिस्सा बनना मजबूरी भी है, और समय की मांग भी।

टेक्नोलॉजी की वजह से लोग सोशल मीडिया से जुड़कर समाज से कटते जा रहे हैं। यह विषय चिंता का है। आपसी बातचीत और रिश्ते खासे प्रभावित हुए हैं। लेखक ने इसपर भी अपने विचार रखे हैं और कहा है कि समाज में भावनाओं की कमी का कारण तकनीक है। जीवन जहाँ आसान हुआ है, वहीं कई ऐसे मसले भी हैं जिनकी पेचीदगी की वजह से जीवन समस्याओं से ग्रस्त भी हुआ है।

लेखक ने सुझाव दिए हैं जिनसे भविष्य और वर्तमान में कई चीज़ों को हल किया जा सकता है।

पुस्तक में आज की जिंदगी पर तकनीक के होने वाले प्रभावों तथा भविष्य में पड़ने वाले असर पर विस्तार से चर्चा की गयी है। लेखक के विचार इसलिए खास हो जाते हैं क्योंकि उनके पास इस तरह के लेखन का अच्छा खासा अनुभव है। वे भविष्य को लेकर किताबें और लेख आदि लिखते रहे हैं। तथ्यों के साथ उन्होंने अपनी बात को इस पुस्तक में रखा है। संभावनाओं को लेकर उत्साहित लेखक का उद्देश्य मानव जीवन को बेहतरी की ओर ले जाने का है। यह पुस्तक सहेज कर रखने वाली बन जाती है।

"Digital Vs Human"
Richard Watson
Amaryllis 
(An Imprint of Manjul Publishing House Pvt. Ltd.)
Pages : 288

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