मदारीपुर जंक्शन: ग्रामीण परिवेश में पैठ बनाये मदारियों का कच्चा चिट्ठा

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पढ़ना जहाँ शुरू किया, फिर मदारीपुर की गाड़ी पकड़े बिना आनंद नहीं आता.
‘संसार कागद की पुड़िया है, पानी का बुलबुला है। जीवन नश्वर है, फिर भी मूल्यवान है... ज़िन्दगी एक पहेली है, एक ऐसे पुस्तक की तरह है -जिसका पहला पन्ना है जीवन और दूसरा है मृत्यु। इसके भीतर के पन्नों पर स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर अपनी कहानी लिखते हैं.... जीवन का सबसे बड़ा सुख है संतोष और सबसे बड़ा दुख है लोभ; यदि हमें सुख चाहिए तो अपने भीतर के छिपे लोभरुपी जानवर को मारना होगा।’

ग्रामीण पृष्ठभूमि पर आधारित उपन्यास और कहानियों की लम्बी सूची हिन्दी लेखन में मौजूद है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण परिवेश की बहुत ही जीवन्त तस्वीर प्रस्तुत करते हुए अत्यंत रोचक और पठनीय भाषा-शैली में बालेन्दु द्विवेदी का ‘मदारीपुर जंक्शन’ नामक उपन्यास वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है।

हालांकि लेखक का यह पहला उपन्यास है, लेकिन इस उपन्यास को पढ़ने से ऐसा लगता है जैसे यह किसी मंजे हुए उपन्यासकार की कृति है। पाठक लेखन शैली, भाषायी मनोरंजन और कहानी की निरंतरता के बीच इतना घुल-मिल जाता है कि वह उपन्यास को शुरु कर उसके समापन पर ही उसका पीछा छोड़ता है। पूरी कथा एक भी स्थान पर जरा भी बोर नहीं करती बल्कि पूर्वी उत्तर प्रदेश की ग्रामीण संस्कृति में शामिल वर्ग भेद को बहुत ही मौलिक लेकिन मनोरंजक ढंग से प्रदर्शित करते हुए आगे बढ़ती है।

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बालेन्दु द्विवेदी की किताब 'मदारीपुर जंक्शन' पढ़ना एक अलग अनुभव है। ऐसा अनुभव जिसमें खट्टा-मीठा फ्लेवर है। जब ऐसा कुछ लिखा जाए जो मनोरंजक हो, सरल हो, आम आदमी की बात करता हो, और जिसमें ज़िन्दगी की मौज हो, उसे एक बार पढ़ने से मन नहीं भरता।

यकीन के साथ कहना होगा कि ‘मदारीपुर जंक्शन’ को बार-बार पढ़ने के बाद भी पाठक का मूड मस्ती वाला ही रहता है। कई जगह ऐसी घटनाओं का जिक्र किया है कि कभी न मुस्कुराने वाला भी जोर का ठहाका लगाए बिना नहीं रह सकता। अब ये कहें कि बालेन्दु द्विवेदी ने हद कर दी शब्दों द्वारा व्यंग्यात्मक बात करके, तो एकदम सटीक होगा। जी बिल्कुल, लेखक ने शब्दों के जरिये ‘छपाक’ किया है, जो बेहद रोचक है।

लेकिन वहीं गांव की राजनीति के दिलचस्प पहलू दिखाए हैं। जातिवाद आदि पर खुलकर लिखा है।

ऐसी किताबें कम लिखी जा रही हैं। और जब किसी लेखक की पहली किताब ‘धाकड़-स्टाइल’ में आपके सामने हो तो किताब बेजोड़ बन ही जाती है।

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‘कथानक का परिवेश ठेठ ग्रामीण है और उसके परिवेश का ताना-बाना इस कदर बारीक बुना गया है कि हम क्षणभर में ही अतीत के समुन्दर में गोते लगाने लगते हैं। ज्यों-ज्यों यह गहराई बढ़ती जाती है, हमें इसका हर दृश्य और चरित्र जाना-पहचाना और भोगा हुआ-सा लगता है। ऐसा लगता है जैसे सबकुछ हमारे आसपास घट रहा है। भाषा की रवानगी और ताज़गी कथा के प्रवाह को गति देती है। पूरी कथा में कदम-दर-कदम नये-नये मोड़ आते रहते हैं जिसके कारण निरन्तर प्रश्नाकुलता की स्थिति बनी रहती है। यद्यपि अन्त में नैरेटर हमें जिस निराश मनःस्थिति में अकेला छोड़कर चुपके से विदा हो जाता है, वहां हम अपनी आंखों से ज्यादा हृदय को नम होता हुआ पाते हैं।’

जैसा कि उपन्यास के शीर्षक से पता चलता है, लेखक ने ग्रामीण वातावरण में मौजूद अलग-अलग रंग-ढंग, मिजाज और चरित्र के लोगों की पैंतरेबाजी, जुगाड़पन, मक्कारी, धोखेबाजी, धूर्तता, कूटनीति, मदारीपन पर खुलकर व्यंग्य किया है। ऊंच-नीच के भेदभाव के बीच निचली कही जाने वाली बिरादरी के लोगों में नवजागृति तथा अपने हितों के प्रति जागरुकता उत्पन्न होने और संघर्ष की कहानी एक सामाजिक बदलाव की ओर चलती है जिसे लेखक ने बहुत ही नियंत्रित भाषा में एक रोचक और व्यंगात्मक शैली में चित्रित करने में सफलता हासिल की है।

‘एक लम्बे अन्तराल के बाद मुझे एक ऐसा उपन्यास पढ़ने को मिला जिसमें करुणा की आधारशिला पर व्यंग्य से ओतप्रोत और सहज हास्य से लबालब पठनीय कलेवर है। कथ्य का वक्रोक्तिपरक चित्रण और भाषा का नव-नवोन्मेष, ऐसी दो गतिमान गाड़ियां हैं जो मदारीपुर के जंक्शन पर रुकती हैं। जंक्शन के प्लेटफार्म पर लोक-तत्वों के बड़े-बड़े गट्ठर हैं जो मादारीपुर उपन्यास में चढ़ने को तैयार हैं।’ -अशोक चक्रधर.

चइता कमजोर वर्ग का प्रतिनिधित्व करता है जो ऊंच-नीच के संघर्ष में ऊंची जातियों के षड़यंत्रों की बलि चढ़ जाता है। जागृत हो चुका कमजोर तबका चइता की विधवा मेघिया के नेतृत्व में संघर्ष जारी रखता है तथा उसे ग्राम प्रधान बनाने में सफल हो जाता है। अंत में मेघिया एक वर्ग विशेष की षड़यंत्रकारी और कुटिल चालों की शिकार हो चल बसती है।

‘वह इस षड़यंत्रकारी दुनिया से दूर एक ऐसी दुनिया में जा चुकी थी, जहां उसे और उसके ‘परान’ को परेशान करने वाला कोई न था। इस अवस्था में भी उसके चेहरे पर एक विचित्र किस्म का सुकून दिखाई देता था। शायद वह उसके जीवन की इकलौती विजय का उल्लास था जिसे वह बाकी दुनिया के लिए एक सन्देश के रुप में छोड़ गयी थी।’
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लेखक ने गांवों में पनप रही ऊंच-नीच की खाई को पूरी ईमानदारी के साथ अत्यंत रोचक भाषा-शैली में चित्रित किया है। एक ओर परंपराओं का ढकोसला सिर पर उठाए पतन की ओर उच्च कहा जाने वाला तबका है, तो दूसरी ओर ऊंच-नीच की बेड़ियों को तोड़कर आगे बढ़ने वाला कथित कमजोर वर्ग। बालेन्दु द्विवेदी इसी संघर्ष की हकीकत सामने रखने में ईमानदारी से सफल हुए हैं। अशोक चक्रधर के शब्दों में इसे ‘बेहद पठनीय उपन्यास’ कहना बिल्कुल सटीक है।

यह उपन्यास ऐसा कहीं से नहीं लगता कि किसी लेखक का पहला उपन्यास है। यहां व्यंग्य का ऐसा परफ्यूम हर तरफ फैला है कि मन करता है कि बार-बार पढ़ते जाओ। कुछ घटनाएं ऐसी हैं कि उन्हें बगल में बैठे लोगों को भी सुनने में मजा आता है।

सरल और गंभीर बातों को अपने तरीके से कहने में बालेन्दु द्विवेदी बेजोड़ है। उनके पहले उपन्यास ‘मदारीपुर जंक्शन’ में समाज के कई रंग समाए हुए हैं। ये पात्र हमारे बीच के ही मालूम पड़ते हैं, कई बार पढ़ते हुए पाठक उन घटनाओं को साक्षात आंखों के सामने चलता हुआ पाता है। पढ़ना जहाँ शुरू किया, फिर मदारीपुर की गाड़ी पकड़े बिना आनंद नहीं आता।

"मदारीपुर जंक्शन"
लेखक : बालेन्दु द्विवेदी
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 284

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