मलमल कच्चे रंगों की : अंजुम रहबर की बेहतरीन शायरी

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जीवन के सच्चे रंगों को अंजुम रहबर ने बखूबी बयान किया है. उन रंगों में ज़िन्दगी की वास्तविक छवि है.
शायरी जो दिल को सुकून देती है। गजलें जो ज़िन्दगी की मुस्कान के साथ दिल में उतर जाती हैं। शब्दों की खुशबुओं से महकना, पन्नों में उतरना और मुहब्बत में डुबोना अंजुम रहबर का अंदाज उम्दा से भी ज्यादा हो जाता है। .

‘मलमल कच्चे रंगों की’ में अंजुम रहबर की बेहतरीन शायरी है जिसे पढ़ना अलग दुनिया का बाशिंदा होने का सुख लेना है। मंजुल पब्लिशिंग हाउस ने इसका प्रकाशन किया है।

उर्दू शायरी के शौकीनों के लिए यह पुस्तक एक तोहफा है। डा. बशीर बद्र के शब्दों में -‘ग़ज़लों की ये किताब शायरी की शानदार कद्रों का बेहतरीन नमूना है, जिसमें बोली जाने वाली सादा और तहदार ज़बान में उनका फन गज़ल की खूबसूरत ज़िन्दा रिवायतों और सच्ची जिद्दतों के मिले-जुले रंगों से वुजूद में आया है। हमारे अहद की शायरात की शायरी की तारीख़ इस किताब के ज़िक्र के बग़ैर नामुक्कमल रहेगी।’
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अंजुम रहबर की पहली किताब 1998 में पाठकों के सामने आयी, जिसे बहुत ही पसंद किया गया। उन्होंने अपनी शोहरत और कामयाबी के लिए अपने श्रोताओं, पाठकों तथा खासकर बुजुर्गों का इस शेर में शुक्रिया किया -
‘चांद तारे मेरे कदमों में बिछे जाते हैं
ये बुजुर्गों की दुआओं का असर लगता है.

दरअसल अंजुम रहबर के गीतों और ग़ज़लों की भाषा सरल और स्पष्ट है जिसे हिन्दी का आम पाठक भी आसानी से समझ सकता है। इस संग्रह की सभी रचनायें जीवन और जगत के विभिन्न रस-रंगों, सुख-दुख, दर्द और आनन्द की लहरों में अविरल गतिमान रहती हैं तथा हर आम और हर खास इंसान को उसकी हकीकत से रुबरु कराती हैं। यह जज़्बाती पाकीज़गी के साथ मुहब्बत का अहसास कराती हुई चलती है।

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वयोवृद्ध गीतकार और कवि गोपालदास ‘नीरज’ के शब्दों में: ‘अंजुम रहबर की रचनाओं में जहां वैयक्तिक अनुभूतियों की मिठास, कड़वाहट और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का रसपूर्ण मिश्रण है, वहीं आज के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विकृतियों और विद्रुपताओं की भी मार्मिक अभिव्यक्ति है। निश्चित ही जो भी पाठक इन रचनाओं में झांकेगा उसे अवश्य ही अपना और अपने समाज का कोई न कोई रुप अवश्य दिखाई देगा।’

खुशबू का रंगों नूर का मौसम है ज़िन्दगी
लेकिन गुलों की तरह बहुत कम है ज़िन्दगी

यूं लग रहा है जैसे जहन्नम है ज़िन्दगी
बरहम हैं आप मुझसे तो बरहम है ज़िन्दगी

इस ज़िन्दगी का क़र्ज़ चुकाने के वास्ते
सौ साल भी जियें तो बहुत कम है ज़िन्दगी

लिक्खा हुआ है एक फटी ओढ़नी पे ये
हारे हुए कबीले का परचम है ज़िन्दगी

आँखों में ममता है तो घुंघरु हैं पाँव में
रक्कासा है कहीं, कहीं मरियम है ज़िन्दगी.

मशहूर शायर मुनव्वर राना कहते हैं -‘अंजुम रहबर उम्र के उस हिस्से से निकल आई हैं जहां संजीदगी पर हँसी आती है, बल्कि अब उनकी हँसी में भी एक संजीदगी होती है और संजीदगी को जब ग़ज़ल की शाहराह मिल जाती है तो गज़ल इक बाविकार औरत की सहेली बन जाती है। जज़्बात की पाकीज़ा तरजुमानी, लहजे का ठहराव और अश्कों की रौशनाई से ग़ज़ल के हाथ पीले करने के हुनर ने उन्हें सल्तनत-ए-शायरी की ग़ज़लज़ादी बना दिया है। वो जिस सलीके, एहतराम और यकीन के साथ दिलों पर हुकूमत करती हैं, अगर सियासतदां चाहें तो उनसे हुकूमत करने का हुनर सीख सकते हैं।’
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जीवन के सच्चे रंगों को अंजुम रहबर ने बखूबी बयान किया है। उन रंगों में ज़िन्दगी की वास्तविक छवि है, ज़िन्दगी पर सवाल हैं, ज़िन्दगी के पहलुओं का बखान है। देखें -

मंज़िलों का निशान होते हैं
हौंसले जब जवान होते हैं

जिनके कच्चे मकान होते हैं
उनके दिल आसमान होते हैं

हर कदम देख भाल के रखिये
हादसे बेज़बान होते हैं

भूल जाते हैं वो जमीनों को
जिनके ऊंचे मकान होते हैं

कोई छीनेगा क्या रिदा उनकी
जिनके भाई जवान होते हैं

दिल भी हम लड़कियों के ऐ ‘अंजुम’
कांच के फूलदान होते हैं.

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अंजुम रहबर की बेहतरीन शायरी जिसे बार-बार पढ़ने का मन करता है। देखें -

मिलना था इत्तेफाक बिछड़ना नसीब था
वो इतनी दूर हो गया जितना करीब था

मैं उसको देखने को तरसती ही रहती थी
जिस शख्स की हथेली में मेरा नसीब था

बस्ती के सारे लोग ही आतिश परस्त थे
घर जल रहा था और समन्दर क़रीब था

दफ़ना दिया गया मुझे चाँदी की कब्र में
मैं जिसको चाहती थी वो लड़का ग़रीब था.

उनकी अधिकांश रचनाएं पाठक को अपने साथ एकाकार करते हुए एक अजीब एहसास कराती हैं। वह शुरु से अंत तक उसमें खो जाता है। पुस्तक बहुत पठनीय है।

"मलमल कच्चे रंगों की"
अंजुम रहबर
प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस
पृष्ठ : 118

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