RTI कैसे आई : आरटीआइ कानून के जन आन्दोलन और संघर्ष की कहानी

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राजकाज को पारदर्शी व जवाबदेह बनाने के लिए देवडूंगरी गाँव से दिल्ली तक फैले जनसंघर्ष की कथा.
‘‘सूचना का अधिकार (आरटीआइ) एक ऐसा अभियान रहा है जो समय के साथ एक गतिशील और खालिस जन आन्दोलन के रुप में विकसित हो सका। यही इसकी विशिष्ट कामयाबी भी है। ऐसे तमाम संघर्ष रहे जिन्हें काफी शिद्दत से लड़ा गया लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें वैसे अनुकूल हालात नहीं मिल सके जैसे उन संघर्षों को नसीब हुए जिन्होंने आरटीआइ का मार्ग प्रशस्त किया। यह एक ऐसा कानून है जिसने भारत में लोकतांत्रिक राजकाज की दिशा को निर्विवाद रुप से बदल डाला है। ऐसे कानून भी कम ही रहे हैं जो आरटीआइ जितना लोकप्रिय रहे हों और जिन्होंने किसी आन्दोलन को गढ़ने व सशक्त करने में मदद की हो।’’

प्रमुख समाजसेवी अरुणा रॉय की पुस्तक ‘The RTI Story: Power to the People’ का हिन्दी अनुवाद ‘आरटीआइ कैसे आई!’ राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। अनुवादक अभिषेक श्रीवास्तव हैं। हिन्दी पाठकों के लिए यह एक अहम दस्तावेज है।

वास्तव में यह पुस्तक देश के तमाम लोगों को पढ़नी चाहिए। पुस्तक में लेखिका ने आजाद भारत के इतिहास में शुरु हुए एक बड़े आन्दोलन को बहुत ही सटीक बल्कि पारदर्शी ढंग से दर्ज किया है। इस आन्दोलन से जुड़े भारत के मजदूर, किसान और सरकारी भ्रष्टाचार से त्रस्त जनमानस की एकजुटता का सच्च इतिहास यहाँ सफलता के साथ दर्ज किया गया है।

अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद करने वाले अभिषेक श्रीवास्तव ने अपनी विद्वता से यह भी जाहिर नहीं होने दिया कि यह अनुदित पुस्तक है या मूल कृति।

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सूचना के अधिकार के इस आन्दोलन के अगुआ मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) ने राजस्थान के देवडूंगरी गाँव से लेकर जिस तरह दिल्ली तक विस्तार दिया, वह स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद सबसे बड़ा जन आन्दोलन था। जिसमें एमकेएसएस के कार्यकर्ताओं ने जान हथेली पर रखकर हर तरह के खतरों का सामना करते हुए देश, खासकर राजस्थान के आदिवासी, किसान और मजदूरों को इस आन्दोलन से जोड़ा और लम्बे संघर्ष के बाद जिसमें अनेक लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी, आरटीआइ लागू कराने में सफलता अर्जित की।

गोपालकृष्ण गाँधी लिखते हैं -‘आरटीआइ की कहानी के पीछे हताश करने वाला एक तथ्य छुपा है: आरटीआइ कार्यकर्ताओं और प्रचारकों की ज़िन्दगी खतरे में है। अब तक इनमें से करीब 60 अपनी जान गंवा चुके हैं। ये सब एक भले राज्य के सरोकार, सार्वजनिक जवाबदेही और संवैधानिक नैतिकता के शहीद हैं। सवाल उठता है कि क्या अपने देश में ऐसे साहस का नतीजा हत्या होना चाहिए?’

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अरुणा रॉय कहती हैं कि यह सामूहिक इतिहास युवा पाठकों को उनकी सामर्थ्य और राजकाज में उनकी संभावित भूमिका के बारे में समझदारी कायम करने की ताकत देता है। यह पुस्तक कुछ ऐसे तरीके सुझाती है जिनसे हम लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में चलने वाले टकरावों से वास्तव में निपट सकते हैं। ये टकराव नागरिक और चुने गए प्रतिनिधि, कामगार और विद्वान, विचार और व्यवहार, व्यक्ति और समूह, किसी भी शक्ल में हो सकते हैं। सम्भव है कि ये कहानियाँ राष्टीय आन्दोलन और संविधान की ताकत का हमें एक बार फिर से अहसास कराएँ। ये कहानियाँ उम्मीद जगाती हैं कि न्याय और समानता को केवल कानूनी गारंटी के खोल में नहीं हासिल किया जा सकता बल्कि लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे के भीतर इनके न्यायपूर्ण इस्तेमाल के सहारे भी कुछ लड़ाइयाँ जीती जा सकती हैं।’

आजादी की लड़ाई विदेशी अंग्रेजों से थी, जबकि यह संघर्ष उनके बाद शासन और प्रशासन पर कब्जा जमाने वाले ‘अपने देशवासी’ शोषणकर्ताओं से था। यह लड़ाई अभी भी जारी है, क्योंकि मौजूदा सरकार इस कानून को कुन्द करने की कोशिश कर रही है -लेखिका का कहना है कि आरटीआइ का संघर्ष अभी जारी रहेगा। शासन और प्रशासन के कामकाज में पारदर्शिता जरुरी है।

यह पुस्तक बहुत ही पठनीय है। तभी पाठकों को आरटीआइ आन्दोलन, उसकी जरुरत तथा इसे गंतव्य तक ले जाने की जरुरत महसूस होगी। देशहित में यह सबसे महत्वपूर्ण है।

"RTI कैसे आई !"
लेखिका : अरुणा रॉय
अनुवाद : अभिषेक श्रीवास्तव
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ : 127

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