भावना और विचार का गजब सन्तुलन है सुकृता की कविताओं में

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कविताओं में ज़िन्दगी के बेहिसाब रंग बिखरे हैं, जिन्हें उन्होंने शब्दों की कूची से पन्नों पर उकेरा है.
'अनुवाद भाषाओं के बीच संवाद की सम्भावनाओं को जगाता है। भारत जैसे बहुभाषिक देश में विभिन्न भाषाएँ साझे यथार्थ को अंकित करती हैं। इस नाते सुकृता की कविताओं का यथार्थ मेरे अनुभव के नज़दीक है। इन कविताओं में अंग्रेजी भाषा, बाहरी भाषा नहीं रह जाती। वह भारतीय संवेदना, अनुभव एवं भाव की साक्षी प्रस्तुत करती है और इसके साथ-साथ मानवीय गरिमा के उस व्यापक परिदृश्य को भी उपस्थित करती है जो देश और भाषा की सीमाएँ नहीं जानता।’

सुकृता की कविताएँ सर्जना के घनीभूत क्षणों को पकड़ पाने का सहज प्रयास हैं। जैसे चित्रकार रंगों और रेखाओं से हर पल कुछ नया रचने को ललकता है वैसी ही ललक, उत्साह, बच्चों-सी मासूमियत, अनछुएपन का अहसास इन कविताओं में होता है। जो लोग सुकृता को जानते हैं वे सम्भतः इन कविताओं में उनकी चमकती आँखों को पढ़ सकते हैं -
मेरे गीत की
थिरता में
जंगल नाचता है
घने कोहरे की गहरी चुप्पी में

शब्द और मौन मिलकर इस संसार को रचते हैं। दोनों को साथ पकड़ पाना, उनसे समान अनुराग रखना मानवीयता के दीर्घजीवी प्राण को पकड़ने जैसा है जिसमें ‘एब्सल्यूट’ की कोई तानाशाही नहीं, उन्मुक्तता है -सबको साथ लेकर, सबको साथ पाकर, उत्साह और उत्फुल्लता से जीने की। दुनिया में यह स्वर जितना विकसित होगा वह उतनी ही संवेदनशील होगी। जीने की जगह जब सिकुड़ती जा रही है तब सकारात्मकता का यह भाव आश्वस्त करता है।

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इन कविताओं का प्रकृति से गहरा रिश्ता है। कवयित्री के लिए आँगन में खड़े पेड़ योगियों के समान गुरु हैं जिनसे उनकी कतिवा, मन और आत्मा ऊर्जा ग्रहण करते हैं। इन कविताओं में प्रकृति केवल सौन्दर्य का शब्द-चित्र नहीं, वह अपनी सीमाओं के पार दर्शन में घुल-मिल जाती है और नये जीवन-बोध में रुपान्तरित होती है जिससे भागवजगत का विस्तार होता है -
मैं साँस लेती हूं,
उसके दर्शन, ऊर्जा और रौशनी में
जिससे
अपनी जड़ों, शाखाओं और पत्तियों को
सींच सकूँ

प्रकृति और रचनात्मकता का यह अनूठा सम्बम्ध अनन्य है। अपने अहं का लय हो जाना...सृष्टि के विस्तार में स्वयं को सौंप देना और फिर उसी से रचने की शक्ति अर्जित करना लगभग भक्त कवियों जैसी साधना का गतिशील प्रतिबिम्ब है। रचनाकार की दृष्टि उस छोर पर टिकी है जहाँ आसमान की नीलाई समुद्र के नीलेपन में घुलकर एक हो जाती है। दो सत्ताओं के बीच ऐसा सामंजस्य देख पाना कविता में आश्चर्य-भाव जगाता है। सुकृता की अनेक कविताओं में आश्चर्य से भरी सौन्दर्य-चेतना मुग्ध करती है।

‘बन्धन और मुक्ति’ दोनों एक साथ सुकृता की कविताओं में आकार पाते हैं। कोई भी रचना बिना किसी अनुशासन को स्वीकार किए सम्भव नहीं है लेकिन यह अनुशासन जब उसकी सीमा बन जाये तो कठिनाई उत्पन्न कर सकता है। रचना-प्रक्रिया के इस असमंजस को सुकृता समझती हैं, इसीलिए सचेत प्रयास करती हैं कि कविता मुक्ति बने, जकड़बन्दी नहीं। शब्द-सन्धान की इस यात्रा पर भी उन्होंने बहुत-सी कविताएँ लिखी हैं। सुकृता मानती हैं कि कविता शब्द-मुक्त होने की यात्रा है लेकिन इस मुक्ति में शब्द ही माध्यम हैं। खाली कागज की शून्यता भरने, उभर आती कविता की दिशा का संकेत उसके भीतर से ही जन्म लेगा। सर्जना के तनाव में कवयित्री स्वयं से ही होड़ लेती है, अपने पार देख पाने से ही, उस मुक्ति की पहचान बनती है जो कविता के लिए अनिवार्य है। भीतर का दर्द, कागज के पन्नों पर ऐंठ जाता है। रचना इस दर्द से मुक्ति की राह है। रचनाकार इस अग्नि में तपे बिना चित्रों और कविताओं को नहीं पा सकता। सुकृता के सारे प्रयत्न मुक्ति की इसी राह में हैं, जहाँ रचना जीवन बन जाती है और पूरी सृष्टि-पशु-पौधे, मनुष्य और ब्रह्माण्ड एक लय होने लगते हैं। इन कविताओं का सारा बल सृष्टि की खण्ड-खण्ड पहचान में न होकर उसके एक-लय हो जाने में है। एक ही स्वर, एक रोशनी, एक रंग में फैलता और घुलता हुआ।

समय के हाशिए पर रहने वाले बहुत से लोगों की छवियाँ इन कविताओं में हैं। सुकृता की दिलचस्पी उन्हें चित्रित करने या उनके दुख-दर्द बयान करने तक ही सीमित नहीं है, वह उनसे अपने सम्बम्धों की पड़ताल कर रही हैं और इस बहाने समाज के विभिन्न वर्गों के आपसी रिश्तों को समझने की कोशिश भी। इन कविताओं में छोटे-छोटे आख्यान हैं, किसी बस्ती में बसे घुमन्तू लोगों के, किसी गूँगी लड़की का गीत है, कहानियाँ सुनाता कोई कुशल किस्सागो है...कहीं वास्को डि गामा और कहीं हँसते हुए बुद्ध, अनुवादक के रुप में।
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दिल्ली जैसे सशक्त शहर से जब एक स्त्री घुमन्तुओं की बस्ती में पहुँचती है जो पहली प्रतिक्रिया बौद्धिक वर्ग की अकर्मक संवेदना जैसी ही होती है। अपने सामने फैले हाथों में कुछ सिक्के रखकर अपने कर्तव्य से निवृत्त होना कितना सरल है लेकिन अपने मन में पलती नैतिक जवाबदेही का क्या किया जाये जो चुनौती बनकर हर पल सामने आ खड़ी होती है और मिथ्याभिमान की दीवारें दरकने लगती हैं, बचा रहता है केवल वह भाव-बोध जिसमें इंसानी रिश्ते से बढ़कर कुछ भी नहीं है -
कौन लगती हूँ मैं उसकी
और कौन है वो मेरी
कि बँधे रहें हम उस आलिंगन में

क्या है जिसने बुने हैं
ये धागे हमारे बीच
क्या सचमुच हमारे पूर्वज
हर पूर्णमासी को जागते हैं
हमें जोड़ने?
बुलाती है वह मुझे
और मैं उठती हूँ पंजों के बल
रोशनी की किरणों पर चलकर
उसे गले लगाती।

कवयित्री के पास वह मार्मिक संवेदना है जो गले में अवरुद्ध बेआवाज़ गीत को सुन पाती है और कामना करती है कि उसके आशा भरे सन्देशों को बादलों के बीच से उड़ते हुए कबूतर, सूरज के देश तक पहुँचा देंगे। वह बन्द आँखों से सपने देखती है और उन सपनों को बचाये रखना चाहती है। कितना मुश्किल है, आज सपनों को जिन्दा रख पाना क्योंकि सपने ही उस तरलता को सम्भव बना सकते हैं जो व्यावहारिकता की तपिश में सूखती जा रही है। सुकृता इस भाव को बचाए रखने की पक्षधर हैं। इसीलिए उनका अपने आसपास से ऐसा रिश्ता बनता है जिसमें प्रकृति और जीवन सब एक हो जाते हैं। एक होना, जाति-वर्ग-नस्ल के बाहरी पदानुक्रमों को मिटाने की कोशिश भी है। ये कविताएँ मन की सब गिरह खोल देना चाहती हैं, स्वयं को तथा सर्व को समान रुप से उन्मुक्त करती हुईं।

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इन कविताओं से गुज़रते हुए कभी-कभी मन में यह भी सवाल उठता है कि क्या इनके यूँ होने में कवयित्री की स्त्री-दृष्टि का हस्तक्षेप है। सुकृता ने कभी स्त्रीवाद को ध्वनित करने वाली मुखर कविताएँ नहीं लिखीं। इन कविताओं में जेंडर की भूमिका नेपथ्य में चली जाती है। स्त्री सुलभ संवदेनशीलता व आर्द्रता को केन्द्र में रखते हुए भी ये कविताएँ अपने कथ्य के साथ जैसा व्यवहार करती हैं उससे कवि का जेंडर उन पर हावी नहीं होता। अपनी रचनाधर्मिता तथा भाषा को बरतने की रीति में वे जेंडर-न्यूट्रल या निरपेक्ष दिखाई पड़ती हैं। यह किसी भी कविता के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि कही जायेगी जहाँ कविता और कवित्व की पहचान जेंडर के बिना की जा सके। यह भी प्रकारान्तर से मुक्ति-अभियान का गतिशील विकल्प है।

सुकृता ने लोगों की कहानी भी कही है जो समाज के दायरों में फिट नहीं होते जैसे -
तुम्हारा, एक स्त्री होकर
चाहना
एक स्त्री को

अपने से सच कहने का साहस समाज के अंधेरों में सच्चाई के जुगनुओं-सा चमक उठता है। कवि-मन सच के जोखिम को हर हालत में बचाए रखने को तत्पर है।

यात्राएँ, सुकृता की कविताओं में बड़ी जगह घेरती हैं। अनदेखे इलाकों में अद्भुत को पकड़ पाने का बाल-सुलभ उत्साह शब्दों-पंक्तियों के बीच झलक जाता है-हनोई में पगोडा को देखकर कवयित्री आसपास टँगी कविताओं को महसूस कर पाती है। उसके मन पर जड़े चित्र शब्दों के बिम्ब रच देते हैं। बुद्ध और ब्रह्मा, नये आलोक में दिखाई देते हैं, चाँद और लहरें परस्पर संवाद करते हुए। ऐसे बिम्ब गहरे देखने वाली पारखी निगाह के कैमरे में ही रुप धर सकते हैं। कवयित्री का उन्हें उकेर पाना अद्वितीय है। सभी चित्रों में भाव की तरलता है और जाग्रत मनीषी की मेधा। इन कविताओं का अनुवाद करना मन को समृद्ध करने वाला अनुभव है जिससे अपनी रचनात्मकता को भी परिष्कृत होने का अवसर मिलता है।

~रेखा सेठी.

"समय की कसक"
रचनाकार : सुकृता 
अनुवाद : रेखा सेठी 
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 184

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