अरेबा-परेबा : कहानियाँ एक खूबसूरत गुलदस्ता हैं जिनकी महक सुकून देती है

areba-pareba-uday-prakash
सरल भाषा में गंभीरता से लिखना, रोचकता से लिखना, और प्रवाहपूर्ण लिखने की कला में उदय प्रकाश माहिर हैं.
उदय प्रकाश की कहानियों में एक अलग तरह का सुकून मिलता है। उनकी कहानियाँ भीतर तक प्रवेश कर जाती हैं; उन्हें भूलना आसान नहीं है। वे एक तरह से पाठकों के मस्तिष्क में छप जाती हैं। ऐसा अंदाज़ जो शब्दों की ऊर्जा से आगे बढ़ता है, पाठक कहानी को पढ़ने के लिए नहीं पढ़ता, बल्कि उदय प्रकाश को पढ़ने के लिए कहानी पढ़ता है। जब कुछ ऐसा जो दिल पर असर करे, जब कुछ ऐसा जो अहसास कराए कि हाँ, यहाँ भी हमारी बात हो रही है, तो उन जज़्बातों को पढ़े बिना रहा नहीं जा सकता। इसी तरह उदय प्रकाश को पढ़ना खूबसूरत अनुभव है, हर बार ऐसा ही अनुभव होता है।

कहानी कभी पुरानी नहीं होती। उसे बार-बार पढ़ने पर भी आनंद कम नहीं होना चाहिए। यह कहानीकार पर निर्भर करता है, वह किस तरह रोचकता बनाए रहे। उदय प्रकाश की कहानियाँ रोचक हैं, अलग हैं, सामाजिक हैं, संदेश देने वाली और ऐसी जो सुरीली भी लगती हैं- शुरु से आखिरी वाक्य तक बहती हैं। उनमें गजब का प्रवाह है, उत्साह है, तरलता है, जिसे पढ़ना उनके बनाए संसार का हिस्सा होना भी है। वे हमें अपनी कहानी की दुनिया में तैरने को विवश नहीं करते, बल्कि हम स्वयं उनके साथ हो लेते हैं। एक पाठक को इससे बड़ी बात क्या लगेगी कि लेखक उसे कहानी से जोड़ दे, कहानी उसके सामने चल रही हो, किसी फिल्मी पर्दे पर चलती है जैसे; घटनाएँ एक के बाद एक, मजेदार किस्से, हँसी-खुशी, दुख-दर्द की बातें, और भी बहुत कुछ।

uday-prakash-areba-pareba-book

मुद्राराक्षस सही कहते हैं कि उदय प्रकाश कथा-साहित्य का रचनात्मक विकल्प खोजने वाले महत्वपूर्ण कथाकार हैं। जबकि रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता प्रसन्ना मानते हैं कि उनकी कहानियों में एक प्रयोग है, डिबिया में बन्द धूप के टुकड़े की सी मासूमियत है, किशोर का सपना है अजाने सुख को स्पर्श करने का, युवा भावों की कोमलता है, साथ ही अभाव का, कुछ न पाने की कमी का अहसास है, ज़िन्दगी का यथार्थ है।

‘अरेबा-परेबा’ पुस्तक में उदयप्रकाश ने अहसासों को पिरोया है। ‘डिबिया’ कहानी में एक मासूम-सा बालक और रोशनी के टुकड़ों के जरिए ज़िन्दगी को समझने के अलग-अलग अहसास नज़र आते हैं। दूसरी कहानी ‘नेलकटर’ पढ़कर आनंद बढ़ जाता है। कहानी के आखिर में क्या खूब लिखा है -
‘‘क्योंकि चीज़ें कभी खोती नहीं हैं, वे तो रहती ही हैं। अपने पूरे अस्तित्व और वज़न के साथ। सिर्फ हम उनकी वह जगह भूल जाते हैं।’’

‘अपराध’ या ‘सहायक’ कहानी को पढ़ लिजिए, उदय प्रकाश रिश्तों के महीन रेशों को गंभीरता से परखते हुए लिखते हैं। परिवार को उन्होंने अपनी कहानियों में महत्व दिया है। माँ, पिताजी, भाई उनके लिए बहुत अधिक मायने रखते हैं। गलतियाँ करने वाले पात्र, खुशी के बाद दुख के भँवर में ले जानी वाली घटनाएँ होती रहती हैं। वे जीवन के जमीन से जुड़े पहलुओं को भली-भांति जानते हैं, महसूस कर लिखते हैं, और पाठक को भी वही अहसास दिलाने की कोशिश करते हैं।

उदय प्रकाश पाठक से सीधे जुड़ जाते हैं, उसके दिल में जगह बना लेते हैं। इसकी जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। उनकी लेखनी जादू करती है। उनकी लेखनी बाँध कर रखती है। कहीं टूटती परतें हों तो भी तुरंत पाठक जुड़ जाता है। सरल भाषा में गंभीरता से लिखना, रोचकता से लिखना, और प्रवाहपूर्ण लिखने की कला में उदय प्रकाश माहिर हैं।

areba-pareba-uday-prakash

लेखक ने ‘छतरियाँ’ कहानी में उपलों का जिक्र किया है। इस तरह शायद ही किसी ने लिखा हो, पढ़ें -
‘उपलों के पलटते ही नन्हें-नन्हें कीड़े, जो उनके नीचे अब तक छिपे होते, वे इधर-उधर भागने लगते, किन्हीं दूसरे उपलों या पत्थरों के नीचे छिपने के लिए।’

उदय प्रकाश किसी भी परिवेश का आँखों देखा हाल सरलता से बता सकते हैं। ये वास्तविकता से जुड़ा हुआ लेखन है। यहाँ बनावटी चीज़ों को नाकाम करते हुए हक़ीकत में ले जाया गया है।

‘अरेबा-परेबा’ शीर्षक की कहानी दिलचस्प है। शुरु से ही वह आपको बाँधकर रखती है। ‘पॉल गोमरा का स्कूटर’ पढ़ना एक अलग अनुभव है। ‘दिल्ली’ और ‘छतरियाँ’ भी खूबसूरती से रची गयी हैं जिन्हें पढ़कर उदय प्रकाश को और पढ़ने का मन करता है। कुल मिलाकर यह पुस्तक लेखक की कहानियों का सुन्दर गुलदस्ता है, जिसकी महक मन को सुकून से भर देती है।

"अरेबा-परेबा"
लेखक : उदय प्रकाश
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 236

No comments