अँधेरे में उजाले की उम्मीद की कविताएँ -‘भोर के अँधेरे में’

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सच्चाई से अपनी बात कहने वाले श्यौराज सिंह बेचैन को बार-बार पढ़ने का मन करता है.
समाज सरोकार से सराबोर ये कविताएँ दलित दर्द का ज़िन्दा इतिहास हैं। ये कविताएँ स्थितियों से पलायन नहीं करतीं बल्कि मुठभेड़ करती हैं। कवि ने लगातार नया रचा है पर उसने अपने अतीत की डोर नहीं छोड़ी है। बहुमुखी असमानताओं से बेचैन कवि ‘भोर के अँधेरे में’ एक ऐसा शीर्षक है जो रैदास के निर्वाण सम्प्रदाय, कबीर के निर्गुण और फुले, अम्बेडकर के समतामूलक आधुनिकताबोध के बगैर सम्भव नहीं है।

शोषण के खिलाफ एक सशक्त कलमकार श्यौराज सिंह बेचैन ने एक दर्जन से अधिक पुस्तकें लिखी हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रोफेसर हैं। उनका ताजा कविता संग्रह ‘भोर के अँधेरे में’ वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। इस पुस्तक की कविताएँ दलित और सदियों से उपेक्षित एक वर्ग विशेष हकीकत बयान करती हैं तथा वर्ग में दुश्वारियों की काली रात के खत्म होते-होते भोर के अँधेरे से उजाले की उम्मीदों का संदेश देती हैं।

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वास्तव में जो लोग श्यौराज सिंह बेचैन के साहित्य और लेखन को पढ़ते और उस पर ईमानदार चिंतन करते हैं; उन्हें मालूम है कि उनके कलम में ऐसे ताकत है जो भारतीय समाज के सबसे महत्वपूर्ण, परिश्रमी और देशभक्त वर्ग के खिलाफ किए घिनौने व्यवहार को शब्दों में उतार कर सबके सामने रखती हैं। सदियों से जारी भेदभाव पूर्ण इस व्यवस्था से वे भली-भांति वाकिफ हैं तथा कहीं न कहीं वे भी इसके भुक्तभोगी हैं। यही कारण है कि वे उसके बदलाव के लिए हर समय बेचैन हैं।

"कवि बड़ा सपना देखता है, जिसमें लोकतंत्र ही कविता में फूलता-फलता है। कवि को लगता है स्वराज रुपी भोर भी उसके लोगों के लिए नहीं है। खास कर दलित-वंचित के लिए भोर में भी अँधेरा है, आज़ादी में भी गुलामी है, यही पूरे काव्य कर्म का निचोड़ है, सारतत्व है और यही कवि की समूची बेचैनी का सबब और केन्द्रीय समस्या है। वह अस्पृश्यता रहित स्वतंत्रता का सपना देखता है।"

‘भोर के अँधेरे में’ पुस्तक में प्रो. बेचैन की कविताओं की सीधी मुठभेड़ हमारी भेदभावपूर्ण व्यवस्था से है। भारत जैसे वैभावशाली विशाल देश की सदियों तक गुलामी पर वे सवाल उठाते हैं-
मेरा विशाल देश,
कैसे हुआ गुलाम?
कहाँ गयी देव-शक्ति,
कहाँ गए साम-दाम।

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प्रो. बेचैन ब्राह्मणवादी वर्ण व्यवस्था के कट्टर विरोधी हैं। वे समतामूलक समाज के पक्षधर हैं। वे अमेरिकी विस्तारवाद के खिलाफ भी ऐसी सोच व्यक्त करते हैं। ‘अमेरिका’ शीर्षक से लिखी कविता की पंक्तियाँ -
तुम्हारे पास
जो डर है।
वह
दलितों के गाँव में
दबंगों के साम्राज्य में
घर-घर है।

इस पुस्तक में कन्या भ्रूण हत्या, महिला विरोधी प्रचलन और कई रुढ़िवादी परपंराओं के खिलाफ भी प्रो. बेचैन ने जमकर कलम चलायी है। देखिए -
..वे माताएँ,
जो अपनी कोख में
कन्या-भ्रूणों
को नहीं बचा सकीं।
सर्वे में पाया गया है कि-
वे सम्भ्रान्त घरों की बेटियाँ थीं।
...वे नज़ाकत और
नफ़ासत में पली थीं
पर वे रुढ़ियों की
बेड़ियों में जकड़ी थीं।

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पुस्तक के आरम्भ में प्रो. बेचैन ने लम्बी भूमिका लिखी है जिसमें सदियों से उपेक्षित, प्रताड़ित तथा शोषित हमारे एक बड़े वर्ग दलित समुदाय के बारे में बहुत कुछ लिखा है। उनकी कविताओं से जो दिशा मिलती है उतनी ही महत्वपूर्ण यह भूमिका है।

श्यौराज सिंह बेचैन की कविताएँ ढ़ेरों सवाल छोड़ जाती हैं। हृदय से उपजे शब्द ज़िन्दगी की उलझनों को समझने का प्रयास करते हुए अहसास की लताओं में लिपट जाते हैं। सच्चाई से अपनी बात कहने वाले प्रो. बेचैन को बार-बार पढ़ने का मन करता है।

"भोर के अँधेरे में"
रचनाकार : श्यौराज सिंह बेचैन
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 224

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