एक शीशी गुलाब जल: तुकान्त लयात्मक गीत संग्रह

ek sheeshi gulab jal
पुस्तक की काव्यधारा विभिन्न सामयिक विमर्शों से दो-चार होते हुए आगे बढ़ती है.
गुलाब की पंखुड़ियाँ महक से भरी होती हैं जो राहत देती हैं। गीतों की खुशबू ज़िन्दगी को सुकून देती है। जब शब्दों में गहराई हो तो उन्हें पढ़ना अलग आनंद की अनुभूति देता है। गीत हवा की तरह मखमली हो सकते हैं जब उन्हें महसूस कर लिखा जाए। उनमें लय होती है तो इत्र हर ओर अपना असर छोड़ जाता है।

पेशेवर साफ्टवेयर इंजीनियर विनोद कुमार पाण्डेय हिन्दी रचना साहित्य में भी सक्रिय हैं। उन्होंने काव्य के क्षेत्र में गत कई वर्षों से सक्रिय भूमिका अदा की है। उनका एक गीत संग्रह ‘एक शीशी गुलाब जल’ हर्फ पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है। इसमें उनकी 114 रचनाओं का संग्रह है। तुकान्त लयात्मक मुक्तकों के बीच से गुज़रती इस पुस्तक की काव्यधारा विभिन्न सामयिक विमर्शों से दो-चार होते हुए आगे बढ़ती है। इसमें अध्यात्म, इतिहास, प्रकृति, सामाजिक ताने-बाने के संघर्ष, स्त्री-विमर्श, राष्ट्रीय विमर्श, किसान, मजदूर सभी की आवाज़ निकलती है।

मौजूदा शासन और प्रशासन की कार्यशैली पर व्यंगात्मक चोट का एक नमूना पुस्तक से -
‘गाँव-शहर सब चीख रहा है, महँगाई छायी,
खम्भे ताबड़तोड़ लगें पर बिजली ना आयी।
बस्ती वाले टूट चुके हैं, कर-कर के फरियाद,
नेताजी के कान बंद हो गए, जीत के बाद।’

ek sheeshi gulab jal vinod pandey

किसान का दर्द देखिए -
‘मक्का देख रो रहा मन सरसों को लगी हवा,
कीट लग रहें चना-मटर में मिल न सकी दवा।’

इस पुस्तक की प्रशंसा करते हुए ख्यातिप्राप्त कवि, गीतकार, गज़लकार डॉ. कुँअर सिंह बेचैन लिखते हैं -‘ विनोद पाण्डेय का गीत-संग्रह एक ऐसा गीत संग्रह है जो अपनी सम्पूर्ण शब्द-सम्पदा, शिल्प की मनोरम आभा और विमल भाव-वैभव के साथ साहित्य के प्रांगण में शान से खड़ा हुआ है। उसके हाथ में एक शीशी गुलाब जल है, जिसकी प्रत्येक बूँद आँखों को खोलकर उनकी ज्योति बढ़ाकर उन्हें शीतल और निर्मल बना रही है, ये गुलाब जल की बूँदें केवल चर्म-चक्षुओं अर्थात भौतिक जगत के ही यथार्थ का अवलोकन नहीं कराती हैं, वरन मन की आँखें खोलकर इस जगत से परे के शाश्वत जगत अर्थात अध्यात्म और आदर्श की भी समझ प्रदान करती हैं। वह जीवन के विरोधाभास की गलियों में टहलकर समरसता का मार्ग ढूँढ रही होती है।’

एक जगह देखें -
‘प्रश्न उठ रहा मेरे मन में,
कैसा गड़बड़ झाला है।
जिसको थी आवाज उठानी,
उसके मुँह पर ताला है।’

विनोद पाण्डेय का यह गीत-संग्रह पठनीय है। उन्होंने शब्दों की खूबसूरत माला को पिरो दिया है।

"एक शीशी गुलाब जल"
लेखक : विनोद पाण्डेय
प्रकाशक : हर्फ़ पब्लिकेशन
पृष्ठ : 115

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