'गेहूँ का अस्थि विसर्जन व अन्य कविताएँ' : सृजनात्मक काव्य का नवोदय

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सरल, सुबोध और गंभीर भाषा में रचित अखिलेश श्रीवास्तव की कविताएँ वास्तव में एक प्रशंसनीय प्रयास हैं.
अखिलेश श्रीवास्तव ने ज़िन्दगी के रेशों को बेहद करीब से छुआ है. उन्होंने कवि होने, उसकी जिज्ञासा, विचारों की तह, राजनीतिक समझ, पारिवारिक भावनाएँ और शब्दों के प्रवाह से खुद को अभिव्यक्त किया है. उनकी कविताएँ बोलती हैं. उनकी कविताएँ चहकती हैं. अंतर्मन में अलग तरह की झुरझुरी भी उत्पन्न कर देती हैं. मन के सोये कोनों को जगाती हैं, विचलित कर देती हैं. उत्सुकता होती है एक रचना के बाद. फिर इसी तरह अखिलेश को पढ़ना, उत्सुक होना जारी रहता है -यही एक कवि की विशेषता है कि वह पाठक को बेचैन कर दे, उसे शब्दों को महसूस करना सिखा दे.

युवा कवि अखिलेश श्रीवास्तव का पहला कविता संग्रह 'गेहूँ का अस्थि विसर्जन व अन्य कविताएँ' बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है. अखिलेश केमिकल इंजीनियर हैं तथा सम्प्रति एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी में मुख्य प्रबंधक हैं. इस कविता-संग्रह की रचनाओं को पढ़ने से पता चलता है कि उनके हृदय में एक कवि बसता है जो सामाजिक, राजनीतिक तथा राष्ट्रीय घटनाओं के बारे में बहुत संवेदनशील है. यही संवेदनशीलता का प्रतिबिम्ब उनकी रचनाओं में दिखाई देता है.

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सामाजिक गैर-बराबरी, जातीय खाई, बेटा-बेटी में भेदभाव को कवि गंभीरता से लेता है और ऐसी कुरीतियों में गंभीर काव्यात्मक चोट करता है -
जिस भोर बहन जन्मी घर में
दादा ने माँ के पुरखों को गालियाँ दीं
दादी ने माँ के खानदान को
पिता ने माँ को
और बिलखती माँ ने खुद को
साँझ होते-होते
लपेट लिये गए ईश्वर भी
फिर भी बहन ने संस्कार सीखे
और मैंने गालियाँ

ये भी देखें -
जलते चूल्हे में रोटी का सिकना
गेहूँ की अंत्येष्टि है
रोटी के टुकड़े को अपने मुँह में एकसार कर
उसे उदर तक तैरा देना
गेहूँ का अस्थि विसर्जन है

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अखिलेश ने हिंदी लेखक की स्थिति का चित्र इस तरह खींचा है -
मैं हिंदी का लेखक हूँ
मेरी उपलब्धि यह है कि
तमाम मुद्रास्फ़ीति बढ़ने के बावजूद
मेरे घर के कनस्तर में आटा
पेंदी से एक बित्ता ऊपर रहता है

'गेहूँ का अस्थि विसर्जन व अन्य कविताएँ' पाठक को उसके इर्द-गिर्द के वातावरण का साक्षात्कार करते हुए एक रचनात्मक लय में बाँधते हुए आगे बढ़ती हैं. सरल, सुबोध और गंभीर भाषा में रचित अखिलेश श्रीवास्तव की कविताएँ वास्तव में एक प्रशंसनीय प्रयास हैं. सामाजिक बदलाव को प्रेरित करतीं इन कविताओं में एक केमिकल इंजीनियर की सफल काव्यात्मक तकनीक स्पष्ट छाप छोड़ती है. आकर्षक शैली की ये रचनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि उबाऊ और खोखले काव्य-सृजन के इस दौर में हिंदी में अखिलेश श्रीवास्तव जैसे कवियों का उदय भी हो रहा है. हिंदी काव्य जगत में सृजनात्मक काव्य की दिशा में यह सुखद सन्देश है. बहुआयामी कविताओं का रसास्वादन करने के लिए यह कविता-संग्रह उपयोगी सिद्ध होगा।

"गेहूँ का अस्थि विसर्जन  अन्य कविताएँ"
रचनाकार : अखिलेश श्रीवास्तव
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन
पृष्ठ : 180

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