आखिर कविता भी तो एक सामाजिक संस्था है

कविता सामाजिक संस्था
कवि जितनी बड़ी परम्परा का प्रभाव ग्रहण करेगा, उतना ही कलात्मक अनुभव का विस्तार करेगा.
साहित्यिक आलोचना का चलन कम हुआ है। समाजविज्ञान उसके बड़े हिस्से को घेर रहा है। यह प्रक्रिया पिछले तीन-चार दशक से चल रही है। आलोचक भी अब साहित्य-ज्ञानी होने की अपेक्षा समाजविज्ञानी होने में समय खपा रहा है। जो थोड़ी-सी आलोचना बची हुई है, उसमें भी कविता का स्थान घटा है। हिन्दी आलोचना कभी मुख्यत: काव्य-विमर्श के लिए प्रसिद्ध थी। अब कविता के मुश्किल से एक-दो आलोचक हैं। आलोचक की तुलना में कविता की समझ की दृष्टि से हमारे कवि अधिक ध्यानाकर्षक काम कर रहे हैं।

दूसरी ओर ऐसे कवियों की संख्या बढ़ी है, जिनका काव्य-ज्ञान खटकता है। काव्य-परंपरा को जानने का 'जोखिम' मोल लेने वाले कवियों की संख्या क्रमश: घटती जा रही है। काव्य-परम्परा और उसकी कलात्मक उपलब्धियों (इसमें उसकी सीमा भी शामिल कर लीजिए) को जाने बगैर किसी 'असली' की भी प्राप्ति सम्भव नहीं है। दूसरे शब्दों में, 'असलीपन' परम्परा की गहरी समझ पर निर्भर है। इसके अभाव में, यह छिछले समाजविज्ञान का ही असर है, कई कवि 'दु:साहसी संघर्ष' कर रहे हैं। कुछ 'नियुक्त' आलोचक भी उनकी 'प्रसिद्धि' का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। ऐसे आलोचकों की मुश्किल यह है कि उनका कोई 'पूर्वज' नहीं है। जबकि असली बात है, आलोचक के कवियों की तुलना में अधिक पूर्वज होते हैं। उनके पूर्वज आलोचक होते हैं, और कवि भी। एक आलोचक के जितने अधिक पूर्वज होंगे, उसकी आलोचना में उतना ही अधिक वजन होगा।

अच्छी आलोचना के लिए आवश्यक है कि उसमें कृति को साहित्य के इतिहास के अन्तर्गत देखा-परखा जाये। दूसरी ओर उसमें विगत की आलोचना से भी साक्षात्कार हो। पुराने 'मत' को पुनर्जिवित नहीं किया जा सकता, लेकिन उससे विशेष सम्बन्ध बनाकर 'नवीन' की स्थापना की जा सकती है। विगत आलोचना की 'पुनरुक्ति' आलोचनात्मक विमर्श का अंग है, जिसके द्वारा नया मार्ग तैयार किया जा सकता है। आलोचना का बिम्ब पुनरुक्तियों से सजता है और इस प्रकार उसमें उस कथानक की सृष्टि होती है जिसे हम 'ऐतिहासिक सत्त्व' कहते हैं।

कविता की बात करें। एक कविता, अगर वह कविता है, उसके पीछे 'प्रभाव' और 'प्रेरणा' की ऊर्जा सक्रिय रहती है। कवि जितनी बड़ी परम्परा का प्रभाव ग्रहण करता है, उतना ही कलात्मक अनुभव का विस्तार करता है। लेकिन वह केवल प्रभाव ग्रहण नहीं करता, वर्तमान अनुभव के दबाव से विगत के 'अभाव' की क्षतिपूर्ति भी करता है। इसी बात में कविता का जीवन है।

कविता की समझ

एक पाठक, अगर वह पाठक है, इस समझ से बाहर नहीं जा सकता कि कालिदास, विद्यापति और निराला के बगैर नागार्जुन को ठीक-ठीक नहीं पहचाना जा सकता। सम्भव है मुक्तिबोध के लिए निराला का महत्व कम हो; लेकिन मुक्तिबोध को पढ़ने के लिए निराला से भी सामना आवश्यक है। मुक्तिबोध में निराला का जो 'अभाव' है, वही विशेष प्रकार का प्रभाव है।

आलोचना की मेरी पिछली पुस्तक है-'कविता के प्रस्थान'। उसमें आधुनिक कविता की पड़ताल के क्रम में प्रारम्भिक कविता और परवर्ती विकास के बीच सम्बन्ध-सूत्र की तलाश का प्रयास है। इसी क्रम में सैद्धान्तिक स्थापनाओं पर भी विचार किया गया है। इस पुस्तक का एक हिस्सा उसी की एक कड़ी है। अधूरी कड़ी। छायावाद के बाद के काव्य-प्रस्थानों से समकालीन कविता के सम्बन्ध पर विचार का अवकाश अभी बचा हुआ है।

पुस्तक में शामिल निबन्ध अलग-अलग समय में लिखे गये हैं, जिन्हें यहाँ सार्थक क्रम में रखने की चेष्टा की गयी है। कुछ खटकने योग्य अन्तराल दिखाई पड़ सकते हैं। उन्हें अपने अगले काम से भरने की चेष्टा करूँगा। कुछ काम पिछली पुस्तक में कर दिए गये थे। फिर भी उन पर विस्तार से काम की गुंजाइश बनी हुई है।

'कविता के प्रस्थान' की भूमिका में मैंने धारणा रखी थी कि आलोचना रचना को देखने का तरीका है। यहाँ उसमें जोड़ना चाहूंगा-देखने और समझने का। आलोचना रचना की समझ है। यह समझने की एक ऐसी कला है जिसमें कविता और कविता के बीच सेतु बनाने का काम होता है। कविता को समझने की दृष्टि से समाजविज्ञान और अन्य शास्त्रों का सहयोग प्राप्त करना अनुचित नहीं है। आखिर कविता भी तो एक सामाजिक संस्था है। लेकिन आलोचना का मुख्य 'काम' बाधित नहीं होना चाहिए। मैं अपने काम में इसका भरसक ख्याल रचने की चेष्टा करता हूँ।

~सुधीर रंजन सिंह.

कविता की समझ
लेखक : सुधीर रंजन सिंह
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 243
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