'रेत समाधि' : निराले और ख़ूबसूरती भरे अंदाज़ में रचे गए शब्द

गीतांजलि श्री 'रेत समाधि'
एक अलग तरह की रचना जिसमें रिश्ते हैं, नाते हैं, भावनायें हैं..
शब्द रेत हैं, उनके कण उड़ते हुए हवा मैं तैरते हैं मानो ज़िन्दगी उछल रही हो। उसमें ठहराव की परिभाषायें नाच रही हैं, मन के कोने किसी गूँज को सुनने को बेकरार हैं। यह तस्वीरों के खुरदरे किनारे हैं; उन तस्वीरों के किनारे जो कागज़ पर छपी हैं। मन तो बेचैन है, उसे शब्दों से भीगना आता है, भिगोना आता है। पूरी ज़िन्दगी तलाश में बिता देते हैं हम, जब कथायें रोचकता के साथ, पुराने बँधनों को तोड़कर रची जायें, जीवंतता से रची जायें तो एक अलग संसार के दरवाज़े खुलते हैं। गीतांजलि श्री के उपन्यास 'रेत समाधि' को पढ़कर मन खुश हो जाता है क्योंकि यहाँ मन की बातें इतनी हैं कि उनका हिस्सा बनते पाठक को देर नहीं लगती। राजकमल प्रकाशन ने इस शानदार, निराले और ख़ूबसूरती भरे अंदाज़ में रचे गए उपन्यास को प्रकाशित किया है।

एक अलग तरह की रचना जिसमें रिश्ते हैं, नाते हैं, भावनायें हैं, और शब्द तो इतराते फिर रहे हैं अपनी नयी रुह में जो किसी को भी उपन्यासकार से प्रेम कराने के लिए काफी हैं। चुप होकर पढ़ सकते हैं, इसे बोलकर पढ़ने का अपना आनन्द हैं। ऐसी किताबें बहुत कम देखने को मिलती हैं जो लीक से हटकर बुनाई कर बनायी जाती हैं। यहाँ मन के धागे महीन हैं, रेशों में चमक है, कसाव मालूम पड़ता है, सब उजला और खुला भी है, बहने का मन करता है, और मन बहता भी है। बुढ़ापा और ज़िन्दगी का अक्स! बेचैनियाँ और ज़िंदादिली की परवरिश! सरहदों को तोड़ती विचारों की रेतीली लहर! आवरगी करते शब्द!

गीतांजलि श्री

रोज़ी जैसे चरित्रों को पढ़कर कुछ सवाल उभरते हैं। हर सवाल का जवाब नहीं होता, लेकिन सवालों के ढेर से कुछ को चुनकर ख्याल आते हैं। एहसासों की गठरी को किसी रेगिस्तान में लेकर छाया की तलाश नहीं की जा सकती। भावनाओं को महसूस कर ज़िन्दगी की यात्रा मुश्किल नहीं लगती।

'कथा लेखन की एक नयी छटा है इस उपन्यास में। इसकी कथा, इसका कालक्रम, इसकी संवेदना, इसका कहन, सब अपने निराले अंदाज़ में चलते हैं। हमारी चिर-परिचित हदों-सरहदों को नकराते लाँघते। जाना-पहचाना भी बिलकुल अनोखा और नया है यहाँ। इसका संसार परिचित भी है और जादुई भी, दोनों के अंतर को मिटाता। काल भी यहाँ अपनी निरंतरता में आता है। हर होना विगत के होनों को समेटे रहता है, और हर क्षण सुषुप्त सदियाँ। मसलन, वाघा बॉर्डर पर हर शाम होनेवाले आक्रामक हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी राष्ट्रवादी प्रदर्शन में ध्वनित होते हैं 'क़त्लेआम के माज़ी से लौटे स्वर', और संयुक्त परिवार के रोज़मर्रा में सिमटे रहते हैं काल के लम्बे साए। और सरहदें भी हैं जिन्हें लाँघकर यह कृति अनूठी बन जाती है, जैसे स्त्री और पुरुष, युवक और बूढ़ा, तन व मन, प्यार और द्वेष, सोना और जागना, संयुक्त और एकल परिवार, हिन्दुस्तान और पाकिस्तान, मानव और अन्य जीव-जन्तु (अकारण नहीं कि यह कहानी कई बार तितली या कौवे या तीतर या सड़क या पुश्तैनी दरवाज़े की आवाज़ में बयान होती है) या गद्य और काव्य : 'धम्म से आँसू गिरते हैं जैसे पत्थर। बरसात की बूँद।'
रेत समाधि
रेत समाधि
लेखिका : गीतांजलि श्री
पृष्ठ : 376
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
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