'राजेश पायलट-एक जीवन' : हौंसले, संघर्ष और जिंदादिली की दास्तान

यह कहानी जर्रे से आफताब बनने की दास्तान है और हमें ऐसे इंसान से मिलाती है जो आज भी प्रेरणा है.

ज़िंदगी के कड़वे अनुभवों से यह शख्स बचपन से दो-चार हो गया था। उसने उनसे सीख लेकर भविष्य के लिए अपनी नींव तैयार कर ली थी। पिता का सपना साकार करने का उसपर जुनून सवार था। बचपन से उसने एक बात सीखी जिसे तमाम ज़िंदगी निभाया -‘खुद पर विश्वास।’ गांव की मस्ती को वह पिता की मौत के बाद भूल गया था। चचेरा भाई नत्थी सिंह उसे अपने साथ दिल्ली ले गया। वहां से उसकी किस्मत पलट गयी और ‘15 साल की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते उस बालक ने खुद को अंदर से काफी मजबूत बना लिया था। अब वह किसी भी स्थिति से निबटने में सक्षम था। बिल्कुल निडर और बेखौफ।’

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यह कहानी राजेश्वर प्रसाद बिधुड़ी की है जिन्हें हम राजेश पायलट के नाम से जानते हैं। यह कहानी हौंसले, संघर्ष, लग्न और ईमानदारी की है जिसने एक इंसान को सपना पूरा करने की ताकत दी। उन्होंने देशभक्ति का अद्भुत परिचय दिया। 1971 की जंग में पाकिस्तान के कई ठिकानों को तबाह किया। राजनीति में ख्याति अर्जित की और शिखर पर पहुंचे।

राजेश पायलट की पत्नि रमा पायलट ने ‘राजेश पायलट : एक जीवन’ नामक पुस्तक में बेहद सरल भाषा में उनकी शख्सियत के अनछुए पहलुओं से अवगत कराया है। शायद यह पहली पुस्तक है जिसमें राजेश पायलट की ज़िन्दगी के निजि जीवन पर इतने विस्तार के साथ लिखा गया है। रोली बुक्स ने इस किताब को हिन्दी और अंग्रेजी में प्रकाशित किया है।

राजेश पायलट यानी इंडियन एयरफोर्स के एक जांबाज पायलट, जिन्होंने 1971 की जंग में पाकिस्तानी फौज के कई ठिकानों को नेस्तनाबूद किया था। उन्होंने एयरफोर्स छोड़कर राजनीति में कदम रखा। ईमानदार नेता और जनसेवक के रुप में उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीब और पिछड़े वर्गों के कल्याण की खातिर समर्पित कर दिया। 'जय जवान-जय किसान' के नारे को साकार करने वाले स्वर्गीय राजेश पायलट की ज़िन्दगी में न जाने कितने उतार-चढ़ाव आए। लेकिन वे हर मोड़ से हंसकर गुजर गए। आसमान की ऊंचाइयों को चुनौती दीं। कामयाबी की नई इबारत लिखी। कामयाबी के इस सफर में उन्होंने हमेशा इस बात का ख्याल रखा कि उनके कदम जमीन पर रहें। स्वर्गीय राजेश पायलट की कहानी जर्रे से आफताब बनने की दास्तान है। यह दास्तान समाज के संघर्षशील नौजवानों के लिए प्रेरणा पुंज से कम नहीं है।

रमा पायलट ने लिखा है कि राजेश्वर प्रसाद ने कभी नहीं सोचा था कि जिन बंगलों में वे दूध पहुंचाते हैं, कभी उनमें से एक बंगले में उनका आशियाना होगा। उन्होंने अभावों और संघर्षों के जीवन को बेहद करीब से देखा था। वे ज़िन्दगी के खट्टे-मीठे अनुभवों से भलीभांति परिचित थे। वे भीषण सर्दियों में भैंसों के बीच छप्पर में उनसे सटकर सोते थे।

रमा लिखती हैं -‘यह बात सुनकर ही रौंगटे खड़े हो जाते हैं। उसकी आंखों में नींद नहीं, आंसू होते थे। ठंड से ठिठुरता राजेश्वर दोनों पांवों को अपने पेट से लगाकर लेटा रहता।’

स्कूल में राजेश्वर को दूधिया कहकर चिढ़ाया जाता। जिस दिन उसकी भाभी नाराज होतीं, उसे खाने के बजाय गालियां मिलतीं। तब उसके दोस्त उसे खाना खिलाते। उसे साथियों के होमवर्क के बदले ऑमलेट भी खाने को मिलता।

नौकरी के फॉर्म एटेस्ट कराने के लिए राजेश्वर प्रसाद राष्ट्रपति भवन पहुंच जाता है। घंटों तक भी किसी अफसर की गाड़ी नहीं रुकती। बाद में लेफ्टिनेंट कर्नल पीएल नेगी उसकी मुराद पूरी करते हैं। अंतिम चयन के लिए उसके पास इलाहाबाद तक के किराये के पैसे नहीं थे। तब उनके दोस्तों ने उनकी मदद की।

एसएसबी के पूरे बैच में केवल तीन लड़के चुने गये थे। राजेश्वर प्रसाद का भी उनमें नाम था। उन्होंने यात्रा और भत्ते के रुप में मिले सभी रुपये वहां गरीब कर्मचारियों में बांट दिये। उन्हें अपने पिता की बात याद थी -‘खुशी मिले तो सब में बांटो।’

‘फौज के जवान और बैदपुरा के गरीब किसान जयदयाल का सपना पूरा होता दिख रहा था। राजेश्वर प्रसाद ने गरीबी को बचपन से कदम-कदम पर रुकावट बनते देखा था। वक्त और हालात ने पाई-पाई की अहमियत अच्छी तरह समझा दी थी। शायद इसलिए राजेश्वर ने एयरफोर्स को चुन लिया। गरीब घर में जन्मा, अभावों के बीच पला-बढ़ा, गुर्जर समाज से ताल्लुक रखने वाला एक लड़का राजेश्वर प्रसाद एयरफोर्स में पायलट बन गया।’

1966 में जब तत्कालीन वायु सेनाध्यक्ष अर्जन सिंह ने राजेश पायलट को कमिशन प्रदान किया तो उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

उनका छोटा भाई ज्ञान 12वीं का छात्र था जिसकी बीमारी से मृत्यु उनके लिए किसी सदमे से कम नहीं थी। बहुत मुश्किल से उन्हें घर जाने की छुट्टी मिली।

पुस्तक में 1971 के भारत-पाकिस्तान के युद्ध का वर्णन करते हुए लिखा गया है कि दुश्मन सेना ने उन्हें जाल में फंसाकर मार गिराने की साजिश रची जिसे समझदारी के साथ उन्होंने नाकाम कर दिया। उनकी सूझबूझ की चर्चा तब अखबारों की सुर्खियां बनी।

रमा लिखती हैं कि साल 1974 में उनका राजेश पायलट से विवाह हुआ। लेकिन बैदपुरा गांव पहुंचकर उन्हें रोना आ गया। उन्होंने लिखा -‘कहां दिल्ली की रहने वाली लड़की और कहां गांव...?’

पुस्तक में राजेश पायलट के व्यक्तित्व के बारे में रमा पायलट लिखती हैं-‘जैसे-जैसे उनके बारे में और ज्यादा जाना, सारे सवालों के जबाव खुद-ब-खुद मिल गये। उस हंसी-खुशी और मस्तमौला तबियत के पीछे थी -उनकी जिंदादिली। जीवन के प्रति उनका नजरिया बेहद सकारात्मक था। परिस्थिति कितनी भी विषम क्यों न हो, उनका रास्ता नहीं रोक पाती थी। सामने बड़ी समस्याओं को देखकर लोग अपना दिल छोटा कर लेते हैं। लेकिन राजेश्वर प्रसाद के पास हर समस्या का एक ही समाधान था। हर परेशानी का अचूक हल था -नो प्रॉब्लम। इन दो शब्दों में उनके व्यक्तित्व की मजबूती झलकती थी।’

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राजेश पायलट ने अपनी पत्नि रमा को राजनीति के लिए प्रेरित किया। रमा पायलट ने नसबंदी अभियान का जिक्र करते हुए लिखा कि हम देशवासियों को जागरुक करते थे। नसबंदी ऑपरेशन के बाद हम महिलाओं को देसी घी का एक डिब्बा भेंट करते थे। अगर कोई पुरुष नसबंदी कराता, तो उन्हें प्रोत्साहन स्वरुप साइकिल दी जाती। साथ ही सफाई सप्ताह मनाते और शहर में जगह-जगह झाड़ू लगाकर लोगों को सफाई के लिए प्रेरित करते थे।

पुस्तक की सबसे अच्छी बात यह है कि लेखिका और उनकी पत्नि रमा पायलट ने रिश्ते-नातों का बहुत सुन्दर ढंग से परिचय कराया है। उन्होंने राजेश पायलट के भाई नत्थी सिंह का सबसे शानदार वर्णन किया है। ऐसा लगता है जैसे रमा ने राजेश पायलट के बाद उनकी पत्नि होने के नाते पूर्व में किये सहयोग का इस पुस्तक द्वारा आभार प्रकट किया है। नत्थी सिंह को जितना अधिक धन्यवाद दिया जाये कम रहेगा। एक तरह से वे नत्थी सिंह ही थे जिन्होंने राजेश्वर को पायलट बनाया। बाद में काबिल होने पर राजेश पायलट ने अपने चचेरे भाई के लिए दिल खोल कर रख दिया।

राजेश पायलट नौकरी छोड़कर राजनीति में आ गये। उससे पहले उनकी मुलाकात तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से हुई जिसके बारे में रमा लिखती हैं-‘इंदिरा जी ने कहा कि इस्तीफा देने की सलाह नहीं दूंगी। फोर्स में क्या फ्यूचर है। राजनीति में क्यों आना चाहते हो?’ इसपर राजेश पायलट ने कहा कि वे चौधरी चरण सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ना चाहते हैं। तब ‘इंदिरा जी बोलीं कि तुम बागपत से टिकट मांग रहे हो...वह तो सारा जाटों का इलाका है.... पता है न कि वहां तो चुनावों में लाठियां चल जाती हैं। राजेश जी बोले,‘मैडम मैं बम चला चुका हूं, तो क्या लाठियों का सामना नहीं कर पाऊंगा...?’

रमा लिखती हैं कि नौकरी छूट गयी, चुनाव के लिए कांग्रेस पार्टी से टिकट मिलने की आस भी धुंधली पड़ती जा रही थी। मगर संजय गांधी के फोन ने उनकी किस्मत बदल दी। पहला गुर्जर पायलट राजनीति में भरतपुर के अनजाने मैदान में लड़ा और सबको चौंका भी दिया। उससे भी हैरानी की बात यह थी कि चुनाव प्रचार के दौरान उनके पास उतने पैसे नहीं थे कि वह जगह-जगह जाकर अपनी बात कर सकें। तब के पार्टी कोषाध्यक्ष सीताराम केसरी के कार्यालय के बार-बार चक्कर लगाने पर कुछ रकम प्राप्त हुई और वह भी स्टांप पेपर पर दस्तख्त करवाने के बाद। लेकिन राजेश पायलट को उनके समर्थकों ने पूरा सहयोग दिया। उनका चुनाव खर्च चलता रहा। 1980 में वे चुनाव जीत गये और सांसद बने। उन्होंने वादे अनुसार भरतपुर के लड़कों को रोजगार दिलवाया तथा वहां विकास कार्य किये।

वे राजेश पायलट ही थे जिनकी बदौलत एयरफोर्स पायलटों को उड़ान भत्ता मिलना शुरु हुआ। साथ ही उनके द्वारा किये गए सामाजिक और राजनीतिक योगदान की चर्चा की गयी है। कश्मीर में किये गए प्रयासों पर रमा ने एक अध्याय लिखा है।

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राजेश पायलट को दूसरा चुनाव दौसा से लड़ने के लिए कहा गया तो रमा काफी हैरान थीं, मगर उनके पति भरोसे के साथ लड़े और विजयी हुए। 1984 में कांग्रेस को जबरदस्त बहुमत मिला। पार्टी ने कुल 414 सीटों में से 400 सीटें हासिल कर इतिहास रचा।

हरियाणा में डिज्नीलैंड के बनाये जाने का भी रोचक वर्णन पुस्तक में दर्ज है। रमा लिखती हैं कि इससे किसानों की हजारों एकड़ जमीन अधीग्रहण की जाती। राजेश पायलट ने कई राज्यों के किसानों को साथ लेकर एक रैली का आयोजन किया। लाखों की संख्या में लोगों ने अधीग्रहण का विराध किया। डिज्नीलैंड का फैसला वापस लिया गया। 1991 में हुए चुनावों में चौधरी देवीलाल की पार्टी केन्द्र और हरियाणा में बुरी तरह हारी।

रमा पायलट ने राजेश पायलट के राजनीतिक जीवन का सिलसिलेवार ढंग से वर्णन किया है। यदि हम पायलट जी को करीब से जानना चाहते हैं तो यह पुस्तक सबसे बेहतर किताब है। उन्होंने राजेश पायलट की दुघर्टना में हुई मौत का भी जिक्र किया है जिसे पढ़कर कोई भी भावुक हुए बिना स्वयं को नहीं रोक सकता -दो मासूम बच्चे और उनकी मां!

पुस्तक में शानदार तस्वीरें भी छपी हैं जिनसे आप राजेश पायलट की कहानी जान सकते हैं। हर तस्वीर एक कहानी है। वास्तव में यह पुस्तक एक गुर्जर नेता के जीवन के संघर्ष को हमारे सामने लाती है और उनके व्यक्तित्व को हमारे सामने खूबसूरती से बयान किया है।

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'राजेश पायलट : एक जीवन’
(Rajesh Pilot: A Biography)
लेखिका : रमा पायलट
प्रकाशक : रोली बुक्स
पृष्ठ : 224
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