टीवी रिर्पोटिंग की ज़मीनी हक़ीकत 'ऑफ़ द स्क्रीन’

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आम पाठक के लिए टीवी पत्रकार और उससे जुड़े किस्से जानने का यह अच्छा अवसर है.
खालिस टीवी रिपोर्टिंग में ही पन्द्रह से ज्यादा साल गुजारने के बाद आज भी कैमरा और माइक उठाकर दफ्तर से निकलते वक्त मन में डर-सा लगा रहता है कि कहानी बनेगी या नहीं। दरअसल, ये अलग ही तरह की पत्रकारिता है जिसमें कैमरा, माइक, विजुअल, बाइट और पीटीसी को जोड़कर कैमरामैन और ड्राइवर की मदद से स्टोरी तैयार होती है। इसमें रोज कुछ सीखते हैं, कुछ भूलते हैं और कुछ गलतियां करते हैं।

टेलीविजन चैनलों पर प्रसारित होने वाले जिन समाचारों को लोग उत्सुकता के साथ देखते हैं, उनमें कई घटनाएँ बहुत दिलचस्प, रोमांचक और संवेदनशील होती हैं। इन्हें मौके पर जाकर टीवी पत्रकारों को कितना संघर्ष करते हुए कई तरह के जोखिम उठाने पड़ते हैं उसकी हकीकत ग्राउंड जीरो पर पहुँचकर उनकी कवरेज करने वाले पत्रकार ही जानते हैं। कभी-कभी एक-दो मिनट में छोटे पर्दे पर दिखाए जाने वाले समाचार या स्टोरी को कवर करने में एक से दो दिन तक का समय भी खर्च करना पड़ता है।

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ब्रजेश राजपूत के अनुभव 'ऑफ़ द स्क्रीन’ की जान हैं. यह किताब एक शानदार दस्तावेज की तरह है. मीडिया से जुड़े लोगों के लिए यह अच्छी किताब है. साथ ही पत्रकारिता की पढ़ाई करने वालों के लिए कुछ ज्यादा खास हो जाती है. आम पाठक के लिए टीवी पत्रकार और उससे जुड़े किस्से जानने का यह अच्छा अवसर है. ब्रजेश के पास लंबा अनुभव है. उन्होंने खुद की कहानी के जरिए हकीकत बयान कर दी है. खबरों को किस तरह होना चाहिए, खबरों की तह तक किस तरह पहुँचा जाता है, जैसी तमाम बातें उन्होंने दिलचस्प अंदाज में कही हैं. शायद यह पहली किताब होगी जिसमें किसी पत्रकार ने इतनी साफगोई से जमीनी हालात को बयान किया है. ऐसा लगता है जैसे हम भी ब्रजेश के साथ वही देख रहे हैं, जो उन्होंने लिखा है. इस किताब का कवर भी आकर्षित करता है. जिस तरह कवर पर हर चीज स्पष्ट, सरल और साफ है, उसी तरह किताब के पन्नों पर ब्रजेश ने बहुत अच्छी तरह अपनी बात कही है.

कई खबरों के प्रसारण में ग्राउंड जीरो पर मौजूद पत्रकार को घटना से पूर्व तथा बाद के हालात पर भी समीक्षात्मक बयान देना पड़ता है, जिसमें बहुत ही संतुलित, निष्पक्ष तथा स्पष्ट रिपोर्ट देनी होती है। कई घटनाओं के लिए त्वरित प्रमाण जुटाने होते हैं जिसके लिए मानसिक तैयारी के साथ परिश्रम और भागदौड़ भी जरुरी होती है। कभी-कभी पूरा दिन खाना तो दूर पानी तक नसीब नहीं होता।

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कई पत्रकार सत्ता की गोद में बैठकर पत्रकारिता जैसे पवित्र कार्य को लांछित भी करते हैं। जबकि कई पत्रकार निष्पक्ष और निर्भीक होकर अपने पवित्र काम को अंजाम देते हैं। हालांकि ऐसे पत्रकारों पर अपनी आलोचना होते ही कई नेता एक पक्षीय होने के झूठे आरोप भी लगाते हैं।

टीवी में विजुअल्स के सहारे कहानी कहने का ये तरीका देखने में जितना आसान होता है, रिपोर्टिंग करने वाले के लिए उतना ही कठिन, रोमांचक और चुनौतीपूर्ण। टीवी के पर्दे पर चलने वाली कुछ सेकंड की स्टोरी के पीछे कई घंटों की मारामारी होती है, जिसे स्टोरी में कभी कहते नहीं, कभी दिखा देते हैं। कुछ साल पहले मन में आया कि यदि टीवी स्क्रीन पर स्टोरी दिखा देते हैं, तो क्यों न कागज़ों पर इस स्टोरी के पीछे की कहानी सुना दी जाए। फिर एक सिलसिला शुरु हुआ, हर मारामारी वाली स्टोरी के किस्से को कागज़ पर उतारने का।
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टीवी जगत के जानेमाने पत्रकार ब्रजेश राजपूत ने 'ऑफ़ द स्क्रीन’ नामक पुस्तक में टीवी पत्रकारिता जीवन की कई कवर स्टोरियों की तैयारी के दौरान आयी चुनौतियों का सिलसिलेवार बहुत ही मौलिकता के साथ वर्णन किया है। इस पुस्तक के पढ़ने से जहाँ पत्रकारिता की जानकारी बढ़ाने वालों को बहुत कुछ मिलेगा वहीं आम आदमी को भी पता चलेगा कि चन्द सैकंड या मिनट की एक खबर के लिए पत्रकारों को क्या-क्या करना पड़ता है? इस पुस्तक में टीवी प्रसारण से लेकर नेताओं, अभिनेताओं, बाबाओं तथा आम लोगों की कहानियों के आँखों देखे अनुभव तथा तथ्यपरक 75 किस्से लेखक ने कलमबन्द किए हैं। इसे पढ़ने से पाठकों को किसी कथा संग्रह, उपन्यास अथवा शायरी से अधिक आनन्द आएगा।

"ऑफ़ द स्क्रीन"
लेखक : ब्रजेश राजपूत
प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस
पृष्ठ : 248

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