इक सफ़र साथ-साथ : प्रवासी जीवन की ऐसी तस्वीर जहाँ घटनाएँ नहीं जीवन है

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प्रवासी भारतीय महिला कथाकारों के लेखन की यह ख़ुशबू आपकी साँसों में बस जायेगी.
यह कहानियाँ मूल रुप से दौड़ते-भागते जीवन, बोर्ड रुम के दाँव-पेंच, राजनीतिक शह-मात की, ख़ून-हत्याओं की ही नहीं हैं। यद्यपि ऐसे भी उल्लेख हैं। यह कहानियाँ रिश्तों की धीमी आँच पर पकाई गयी हैं, रेशम की तरह महीन काती गयी हैं, इनमें कोयल के स्वर की मधुरता और पपीहे के करुण स्वर हैं। बहुत-सी कहानियों में आपको बहुत घटनाएँ नहीं मिलेंगी परन्तु इसमें जीवन का रस और ज़ज़्बा है। जब आप विदेशों में रहने वाले भारतीयों के अन्तर्मन को माइक्रोस्कोप से देखना चाहें, जब आप उस परिवेश में रह रहे समाज के स्त्री-पुरुष सम्बन्धों और रिश्तों की गहरी पड़ताल करना चाहें, आप इस किताब को उठायें, यह आपको एक ऐसी दुनिया में ले जायेगी जिसे देखने और दिखाने की दूरबीन प्रवासी स्त्री के पास ही है, इस मायने में यह किताब आपके पुस्तक शैल्फ के लिए अनिवार्य यानी मस्ट है। यह कहानियाँ आपको आवाज़ देंगी, आपका ध्यान खींचेंगी, आपसे सवाल करेंगे, आपके साथ चल देंगी। आपकी सोच को व्यापकता, दृष्टि को गहराई और संवेदना को आकार देंगी।

सबसे पहले तो मैं यह कहूँगा कि मुझे दिव्या जी की असीम ऊर्जा, प्रतिबद्धता और जिजीविषा पर सुखद आश्चर्य है। कैंसर जैसी बीमारी से लड़ने के बाद, इतनी जल्दी देश-विदेश में बिखरी इन कहानिकारों की रचनाओं का संकलन तैयार करना अपूर्व सफलता है। यह संग्रह प्रवासी साहित्य की यात्रा में एक विशिष्ट उपलब्धि है। इतनी सारी रचनात्मक उपलब्धियों को एक स्थान पर संयोजित करने में उन्होंने जो ऊर्जा, परिश्रम और रचनात्मक क्षमता लगाई है, उसके लिए दिव्या जी की तारीफ़ जितनी की जाये कम है। उनकी असाधारण ऊर्जा हम सबके लिए प्रेरणा है।

यह संग्रह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इसने ऐसी नायिकाएँ दी हैं, जो किसी पुरुष द्वारा लिखे कथानक में खलनायिका या हास्य की पात्र हो सकती थी। उषा प्रियंवदा की इला को आसानी से चरित्रहीन करार दिया जा सकता है। अनीता शर्मा की मोटी, थुलथुल शुवे हास्य की पात्र हो सकती है, दिव्या माथुर की ऋचा, उषा वर्मा की सलमा, तोषी अमृता की नेहा, उषा राजे की सेलिमा में भी पारम्परिक नायिकत्व नहीं हैं। परन्तु इन स्त्री कथाकारों की कलम ने उन्हें नायिकत्व प्रदान किया। यहाँ हमें 'पहचान एक शाम की’ की लेखिका शैलजा सक्सेना की कहानी पर भी विचार करना होगा। अपनी इच्छा के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में जाना विनीता के लिए क्या इतनी बड़ी बात हो सकती है कि उस पर कहानी लिखी जाये? क्या आप विश्वास करेंगे कि यह लन्दन में रह रही शिक्षित महिला के लिए बहुत बड़ी समस्या है? यह हमारे समाज में पुरुष-स्त्री के समीकरण में असमानता की क्या स्थिति है, और औरतें अभी भी किन बेड़ियों की शिकार हैं, उसकी कहानी भी कहता है। यह भी बताता है कि विदेश में रहने वाली भारतीय स्त्री भी उससे मुक्त नहीं है।
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आमतौर पर हम कथानकों में देखते हैं कि कोई व्यक्ति ग़लत निर्णय लेता है तो उसे कठिन परिस्थितियों या चुनौती का सामना करना पड़ता है। पर नीरा त्यागी की 'जड़ों से जुदा पेड़’ की माँ या सुधा ओम ढींगरा की 'कमरा नं. 203’ की मिसेज़ वर्मा या उषा वर्मा की सलमा, ज़किया ज़ुबैरी की सीमा, नजमा उस्मान की नायिका, शैल अग्रवाल की कनकलता, अर्चना पैन्युली की अनुजा, पुष्पा सक्सेना की वर्जीनिया, अरुण सब्बरवाल की सूज़ी, को इसलिए दुनिया भर की मुसीबतों का सामना नहीं करना पड़ता कि उन्होंने कुछ ग़लत किया है। अच्छा होना ही उनकी ग़लती है, उनकी समस्याओं की जड़ है। वे अच्छी हैं, ममतामयी हैं, सेवाभावी हैं, सहिष्णु हैं, कठिन से कठिन कष्ट सह कर भी पति या पुत्र का भला करना चाहती हैं मतलब गड़बड़ उनके किसी निर्णय और ढाँचे में है जो उनकी सहृदयता को ही कमज़ोरी मान कर उनका शोषण करता है। हाँ एक अन्तर्विरोध भी है कि ऐसा शोषण करने वालों में सशक्त स्थिति की महिलाएँ भी हैं, जैसे सास-बहू सम्बन्धों में नगरों में बहू या और भी। इस संग्रह में इस सोच, समझ और दर्शन को, उसकी जटिलताओं के साथ बहुत सफाई से सामने लाया गया है। इस असमानता को दूर करने के लिए स्व की सशक्त अभिव्यक्ति की जरुरत है जो इन कथाकारों ने की है। इस सन्दर्भ में इन स्त्री कथाकारों का लेखन लेखन नहीं एक्टिविज़्म भी बन जाता है। भारतीय समाज में असमानता की सहज स्थितियों और पुरुष वर्चस्व को देखते हुए ऐसे लेखन और एक्टिविज़्म की ज़रुरत किसी से छिपी नहीं।

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प्रवासी साहित्य की जिन विशेषताओं, स्मृति, अस्मिता के सवाल, प्रकृति, स्त्री विमर्श, स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, पीढ़ियों के संघर्ष व द्वन्द्व, सभ्यतामूलक अन्तर्द्वन्द्व, रंगभेद, यान्त्रिकता पर चर्चा होती है। वे सब विशेषताएँ किसी सायास प्रयास के तहत नहीं, बल्कि घटनाओं, स्थितियों, परिवेश, मनःस्थिति, रोचक चरित्रों के माध्यम से इस संकलन में प्रस्तुत हुई हैं। यह प्रतिनिधि महिला रचनाकारों की प्रतिनिधि कहानियाँ हैं। लगभग सभी साहित्य में एक मुकाम हासिल किए हुए। बहुत से हिन्दी में पी.एच.डी. भी। तो ये भाषा और साहित्य के दिग्गज हैं। हिन्दी, उर्दू, ब्रिटेन, यूरोप, अमेरिका, कनाडा, मध्यपूर्व, चीन की प्रतिनिधि हिन्दी रचनाकार स्त्रियाँ इसमें एक स्थान पर हैं। हिन्दी साहित्य को प्रवासी महिला कथाकारों के जिस प्रतिनिधि संकलन की तलाश थी, वह यही है। संकलन की तमाम लेखिकाओं ने इस ख़ूबसूरती और रोचकता से अपनी बात कही है, कि यह बातें और चरित्र केवल दस्तक नहीं देते, बल्कि आपके दिमाग़ में घर कर जाते हैं। जैसा तमाम ख़ूबसूरत कविताएँ और कहानियाँ करती हैं। इन महिला लेखिकाओं की कारीगरी देखकर भारत की उस वास्तुकला का स्मरण हो आता है, जहाँ अपनी छेनी-हथौड़ी से शिल्पकार ऐसी मूर्तियों का निर्माण करता था जो वर्षों तक अपनी कला से लोगों को आश्चर्यचकित कर देती थी। उन मूर्तियों का आकार, अनुपात, घुमाव, सज्जा, अलंकार, अलंकारहीनता, सादगी देखकर आप मुग्ध हो जाते हैं, वैसी ही बारीकी इस संकलन के कथाकारों के काम में है। यह कहानियाँ प्रवासी जीवन का रचनात्मक इतिहास प्रस्तुत करती हैं। अपने समय का असली आईना प्रस्तुत करती हैं। और यह आईना संघर्षों से निकली औरतों ने तराशा है, इसलिए प्रामाणिक है। प्रवासी भारतीय महिला कथाकारों के लेखन की यह ख़ुशबू आपकी साँसों में बस जायेगी। इस गुलदस्ते के सभी फूलों को प्रणाम।

-अनिल जोशी.
(अनिल जोशी कवि, व्यंग्यकार, लेखक, चिन्तक, प्रवासी साहित्य के विशेषज्ञ के रुप में चर्चित हैं)

"इक सफ़र साथ-साथ"
सम्पादक : दिव्या माथुर
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 395

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