'वैलेंटाइन बाबा’ आज के ज़माने का उपन्यास है जिसे नौजवान पीढ़ी को पढ़ना चाहिए

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‘वैलेंटाइन बाबा’ आज के जमाने का उपन्यास है जिसे नौजवान पीढ़ी को पढ़ना चाहिए.
‘रे लईका, मोबाइल में फेर घुस गईले। ब्रह्म बाबा के नाम ले के किरिया काहे नइखे खात कि उंहा जाके कुछ उल्टा-पुल्टा ना करबे?’ -माँ का धैर्य जवाब दे रहा था।
‘खा तो लिया, माँ, वैलेंटाइन बाबा की कसम खाकर कहता हूँ कि ‘दिल्ली की’ लड़कियों के साथ उल्टा-पुल्टा नहीं करूँगा’ -झल्लाया हुआ मनीष ‘दिल्ली की’ बोल कर खेल गया।
‘वैलेंटाइन बाबा! इ कवन बाबा हउवन, रे?’
‘इहो एगो बाबा नू हवन... जवान लइका-लइकी के चाभी आजकल इनकरे लगे बा..’

‘वैलेंटाइन बाबा’ के लेखक हैं शशिकांत मिश्र। ये वही शशिकांत मिश्र हैं जिन्होंने ‘नॉन रेज़िडेंट बिहारी’ लिखकर कमाल किया था। वैलेंटाइन बाबा का प्रकाशन राजकमल प्रकाशन ने किया है।

उपन्यास शुरु से ही दिलचस्प हो जाता है। यहाँ दिलों की बात है, मोहब्बत का साथ है। रिश्तों में नरमी है, गरमी है, कहीं-कहीं फूहड़पंती की हदों की इंतेहा भी करते हैं पात्र। लेकिन वास्तविकता को जोड़कर आज की युवा पीढ़ी पर लिखा गया यह उपन्यास प्यार के अलग-अलग नज़रिए को भी बयान करता है।
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बलिया के लड़के शहर की हवा लगते ही रुख बदलने की कोशिश करते हैं। शिवेश की सोच अलग है। वह रोज नयी गर्लफ्रैंड बदलने में महारथी है। उसकी कहानी शुरु से आखिर तक उपन्यास को दिलचस्प बनाए रखती है। उसके बचपन के दोस्त मनीष की एक ही हमनवां है। उसका नाम सुजाता है। दोनों एक-दूजे पर जान छिड़कते हैं, हद से ज्यादा मरते हैं, ज़िन्दगी भर साथ निभाने की कसमें खाते हैं। मगर एक दिन जब बेरोजगार मनीष की नौकरी का फरमान आता है, तो बहुत बड़ी हलचल मच जाती है। वह सुजाता को गले मिलकर बेकाबू हो जाता है। उसके अंदर का जानवर जाग उठता है। सुजाता चीख पड़ती है। और उस छोटे-से वक्त में उस बंद कमरे में ऐसा कुछ घट जाता है जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। मनीष सड़क पर निकल पड़ता है और वह एक कार से टकरा जाता है। उसे अस्पताल लाया जाता है। यहाँ सपना की एंट्री होती है। मनीष का व्यवहार बुरी तरह बदल जाता है। सुजाता और मनीष के बीच दरार इतनी बढ़ जाती है कि मनीष शहर छोड़ दूसरी जगह चला जाता है। कहानी तेजी से चलती है, दो दिलों के बीच की कश्मकश पाठक को सोचने पर मजबूर करती है। और उपन्यास समाप्त होते-होते हम हैरान रह जाते हैं कि लेखक ने घटनाओं को इस तरह जोड़ दिया है कि आखिर में आप कहेंगे कि -बलिया का लौंडा मनीष तो बड़ा कमाल का निकला। यकीनन मनीष बाज़ी मार जाता है।

उपन्यास के अंत में देखें -
‘मनीष, ये जो तुमलोग वैलेंटाइन बाबा नाम का एक नया माला जपते रहते थे न, उससे मुझे बहुत चिढ़ मचती थी...लेकिन आज मैं सच में एक वैलेंटाइन बाबा को देख रही हूँ अपनी खुली आँखों से...सामने...क्या सच में तुम मेरे वैलेंटाइन बन सकते हो? मुझे शरीर वाला मर्द नहीं, अपनी जिन्दगी में तुम्हारे जैसे दिन का एक सच्चा दोस्त चाहिए..।’

वहीं दूसरी ओर सपना की थ्योरी समझने लायक है -‘प्यार-मोहब्बत-इश्क-विश्क, बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड- ये सब लफड़े अलग चीज हैं, शादी एकदम अलग चीज है। दोनों का कोई मेल नहीं है। और अगर कोई इस बेमेल चीज को मिलाने की कोशिश करता है तो फिर उसे जिन्दगी भर पछताना पड़ेगा।’

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‘वैलेंटाइन बाबा’ आज के जमाने का उपन्यास है जिसे नौजवान पीढ़ी को पढ़ना चाहिए। वे काफी हद तक इसे खुद से जुड़ा हुआ पाएँगे। यह कहानी उन्हें अपनी-सी लगेगी।

‘ढाई आखर वाले प्यार और वन नाइट स्टैंड वाले लस्ट की सोच का टकराव आखिर किस मोड़ पर ले जाकर छोड़ेगा आपको, उपन्यास के आखिरी पन्ने तक कायम रहेगा यह रहस्य। माना कि लाइफ में बहुत फाइट है, सिच्युएशन हर जगह, हर मोर्चे पर टाइट है तो क्या हुआ, दिल भी तो है। यकीनन शशिकांत मिश्र का यह दूसरा उपन्यास बेलगाम बाजार की धुन पर ठुमकते हरेक दिल की ईसीजी रिपोर्ट है, इसे पढ़ना आईने के सामने होना है, जाने क्या आपको अपने-सा दिख जाए..!

"वैलेंटाइन बाबा"
लेखक : शशिकांत मिश्र
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ : 150

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