‘घाचर-घोचर’ : कन्नड़ जीवन शैली का सजीव चित्रण

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‘घाचर-घोचर’ न्यूयॉर्क टाइम्स और द गार्डियन द्वारा सर्वश्रेष्ठ दस पुस्तकों में शामिल किया गया है.
कन्नड़ लेखक विवेक शानभाग के उपन्यास ‘घाचर-घोचर’ का हिन्दी अनुवाद वाणी प्रकाशन ने पाठकों को उपलब्ध कराया है। अनुवादक संजय कुमार सिंह ने सफलता के साथ काम किया है। ‘घाचर-घोचर’ शब्द के अर्थ की जिज्ञासा पाठक को उपन्यास पढ़ने को बाध्य करती है। कुछ पृष्ठों को पढ़ने के बाद ही पाठक को इस शब्द का साक्षात्कार होता है लेकिन लेखन-शैली और रोचक भाषा का माधुर्य उसे पूरी पुस्तक पढ़ने को प्रेरित प्रेरित करता है।

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इस उपन्यास में बेंगलूरु जीवन-शैली की संवदनशीलता, स्पष्ट छाप छोड़ती हुई चलती है। पात्रों के वार्तालाप, जीवन-शैली का चित्रण और सामाजिक परिवेश में पल-बढ़ रहे परिवारों के सम्बंधों को लेखक ईमानदारी से रेखांकित करने में सफल हुआ है।

लेखक स्वयं इस उपन्यास के बीच मुख्य पात्र है जो स्पष्ट करता है -
मुझे लगा कि आखिर वह मेरे इतने करीब है। मुझे उसे सच बता देना चाहिए। उसके सामने कुर्सी पर बैठकर मैंने अपने परिवार का पूरा इतिहास उसे कह सुनाया,‘‘हमें कोई कमी नहीं है। कौन क्या करता है इससे क्या मतलब। सब ठीक-ठाक चल रहा है न। हमारी माली हालत काफी अच्छी है,‘‘ मैंने कहा। चुपचाप बैठे होने पर, कोई भी परिश्रम न करने पर अगर हवा बहती है तो बहने दो, इस तरह के अर्थ में मैंने अपनी बात कही थी। लेकिन उसकी प्रतिक्रिया मेरे अनुमान से एकदम भिन्न निकली।
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इस उपन्यास का नाम सबसे बड़ी उत्सुकता पैदा करता है। वाणी प्रकाशन ने हिन्दी अनुवाद का आवरण इस तरह तैयार किया है कि उत्सकुता और बढ़ जाती है। प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्रिका ‘न्यू यॉर्कर’ की यह टिप्पणी मायने रखती है -‘इस त्रासदीय उपन्यास की क्लासिक कहानी, पूँजीवाद और भारतीय समाज, दोनों के लिए एक दृष्टान्त है।’ भारतीय समाज में पारिवारिक जीवन के सच को बयान करते हुए लेखक ने खूबसूरत उपन्यास की रचना की है। विवेक शानभाग की पुस्तक दुनिया भर में चर्चा का विषय रही है। साल 2017 में ‘घाचर-घोचर’ न्यूयॉर्क टाइम्स और द गार्डियन द्वारा सर्वश्रेष्ठ दस पुस्तकों में शामिल किया गया है। यह उपन्यास विश्व की 18 भाषाओं में अनूदित है।

"घाचर-घोचर"
लेखक : विवेक शानभाग
अनुवाद : अजय कुमार सिंह
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 104

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