'the ज़िंदगी' : कहानियाँ और ज़िन्दगी

the zindagi by ankur mishra
पुस्तक दो हिस्सों में है. पहले भाग में किस्से-कहानियाँ हैं और दूसरे में लघुकथाएँ.
कहानियाँ ज़िन्दगी के हिस्सों से बनी होती हैं। हिस्से कई बार नाज़ुक होते हैं, कई बार इतने नर्म की मामूली ठसक से बिखर जाएँ; कुछ ऐसे हिस्से भी हैं, जो बाहर से सख़्त और अंदर से मुलायम मानो मोम बह चला हो। कहानियों को कहने के हर किसी के पास अपने तरीके हैं। कहीं कहानियाँ हल्की-फुल्की हैं, तो कहीं वे भारीपन से पाठकों को भर देती हैं। जब विचारों की आपसी मुठभेड़ हो तो कहानी का जन्म हो सकता है। एक तरह से मन के भाव और समाज में जो चल रहा है वह कहानी है। उसी तरह कहानीकार शब्दों को बुन रहा है, कहानी कह रहा है, खुद की, दूसरों की और उनकी जो कहानी हैं!

अंकुर मिश्रा का कहानी संग्रह 'the ज़िंदगी' शीर्षक थोड़ा अलग लग सकता है, लेकिन उनकी कहानियाँ ज़िन्दगी के कई रोचक पहलुओं की बात करती हैं। उनका यह पहला प्रयास है। उनका लिखने का अंदाज़ हालांकि हल्का-फुल्का है जिसे आम पाठक आसानी से समझ सकता है। साथ ही वे अधिक जोड़तोड़ वाली भाषा का इस्तेमाल नहीं करते। इतना जरूर है कि उनकी बात पाठकों को कहानी के घेरे में ले जाती है। वो अलग बात है कि पाठक कितनी देर तक उसके इर्दगिर्द रहता है।

the zindagi book review
यह पुस्तक दो हिस्सों में है। पहले भाग में किस्से-कहानियाँ हैं और दूसरे में लघुकथाएँ। किताब एक बार में पढ़ी जा सकती है। फुर्सत के पलों में ऐसी कहानियाँ कुछ लोगों को पसंद आ सकती हैं या आप सफ़र के दौरान इनका आनंद ले सकते हैं।

'अभी ज़िन्दा हूँ मैं' हो या 'इश्क़ ऐसा भी', ये कहानियाँ समाज की वास्तविकता को उजागर करती हैं। नौकरी जीवन नहीं है, और जीवन बिना परिवार के अधूरा है। प्रेम के धागे ज़िन्दगी की खुशी और ग़म के साथ गुंथे हुए हैं। रिश्ते-नाते ज़िन्दगी की धुरी को थाम कर रखते हैं। अंकुर मिश्रा के नज़रिये को पाठक पसंद कर सकते हैं। यह लेखक के लिखने के तरीके पर निर्भर करता है कि वह किस तरह ख़ुद को पाठक के साथ जोड़ पाता है, और हर पाठक की अलग समझ होती है।

यहाँ निराशा का माहौल बिल्कुल नहीं रहने वाला क्योंकि हर किसी के पास कहानी कहने का अपना अंदाज़ है!

"the ज़िंदगी"
लेखक : अंकुर मिश्रा
पृष्ठ : 90
प्रकाशक : सूरज पॉकेट बुक्स

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