अख्त़री : सोज़ और साज़ का अफ़साना

akhtari soz aur saaz ka afsana
दर्द की मलिका की कहानी. उनके दु:ख-दर्द, ख़ुशियाँ-सपने, संगीत-प्रेम, यहाँ छलकते हुए आ मिले हैं.
अख़्तरी क़िताब के सम्पादन का मन मुझे तब से था, जब से मैं युवा हुआ और मुझे अपने परिवार-परम्परा में यह जानकारी हासिल हुई कि किस तरह अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी का हमारे यहाँ से पुराना नाता रहा है। उनकी शख़्सियत, बोल-चाल, रहन-सहन, पहनावे और सबसे बढ़कर अदब के प्रति उनकी दीवानगी और कला-उत्कृष्टता की ढेरों कहानियाँ सुनते हुए उनके प्रति एक अजीब क़िस्म के इश़्क ने जन्म लिया। संगीत के प्रति ख़ुद मेरी दीवानगी इस तरह रही है कि शास्त्रीय और उप-शास्त्रीय संगीत के अतिरिक्त लोक-संगीत और सिनेमा के संगीत की भी दुर्लभ और नायाब चीज़ों को ढूँढ़-ढूँढ़कर सुनने का जतन करता रहा हूँ। मेरी दादी स्वर्गीया राजकुमारी विमला देवी स्वयं में संगीत की एक संस्था की तरह रहीं, जिनमें गायन के साथ-साथ बहुत सारे दुर्लभ वाद्यों को बजाने की महारत थी। इस तरह के परिवेश में पलते-बढ़ते हुए बेगम अख़्तर के क़िरदार को थोड़ा नज़दीक से जानने-समझने का प्रयास करता रहा हूँ। इस लिहाज़ से भी कि वे अवध की सरज़मीं की ऐसी नायाब हस्ती थीं, जिनके संगीत ने एक बिल्कुल अलग ही लीक कायम की है।

पुराने ज़माने की मशहूर गायिका मुश्तरीबाई की बेटी के रुप में जन्मी बेगम अख़्तर (1914-1974) शुरुआती दौर में अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी कहलाती थीं। बाद में इश्तियाक अहमद अब्बासी, जो काकोरी के नवाब ख़ानदार से ताल्लुक रखते थे, से निक़ाह के बाद बेगम अख़्तर कहलायीं। यह देखना इतिहास की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन जाता है कि बेगम अख़्तर ने उप-शास्त्रीय गायन के सभी प्रकारों मसलन-ठुमरी, चैती, दादरा, कजरी, बारामासा और होरी के गायन में अनूठी सिद्धहस्तता पायी थी। उनकी तालीम कई घरानों के माध्यम से सम्भव हुई, जिनमें प्रमुख रुप से उस्ताद अब्दुल वाहिद ख़ाँ (किराना), उस्ताद रमज़ान ख़ाँ (लखनऊ), उस्ताद बरक़त अली ख़ाँ (पटियाला), उस्ताद गुलाम मोहम्मद ख़ाँ (गया) और उस्ताद अत मोहम्मद ख़ाँ (पटियाला) के नमा लिए जाते हैं। अपनी अद्भुत पुकार तान और बिल्कुल नये ढंग की मींड़-मुरकियों-पलटों के साथ खनकती हुई आवाज़ के चलते बेगम अख़्तर को असाधारण ख्याति हासिल हुई। अपनी आवाज़ में दर्द और सोज़ को इतनी गहराई से उन्होंने साधा कि एक दौर में उनकी आवाज़ की पीड़ा, दरअसल हर एक आम-ओ-ख़ास की व्यक्तिगत आवाज़ का सबब बन गयी। हर दूसरा इन्सान, जो कहीं इस दुनिया में धोखा या चोट खाया हुआ था, उसने बेगम अख़्तर की आवाज़ में पनाह पायी। ग़ज़ल जो सिर्फ़ पढ़ने की चीज़ होती थी, उसे बाक़ायदा गाने की रवायत से जोड़कर सम्मान दिलाने का एक बड़ा काम बेगम अख़्तर ने किया है। एक समय वो भी आया, जब हर एक बड़ा और नया शायर इस बात का तलबगार होता था कि काश! बेगम अख़्तर उसकी ग़ज़ल गा दें। ऐसा हुआ भी, जो आज संगीत के इतिहास में मिसाल की तरह देखा-समझा जाता है। जिगर मुरादाबादी और शकील बदायूँनी की ग़ज़लों का मामला रहा हो या कि बिल्कुल नये शायर सुदर्शन फाक़िर की ग़ज़ल, हर बार बेगम अख़्तर अपनी आवाज़ से इन शायरों के अल्फाज़ों को कुछ और वज़नी बना देती थीं। कैफ़ी आज़मी ने तो बाक़ायदा यह स्वीकारा हुआ है कि उन्होंने ग़ज़ल दोबारा से इसलिए लिखनी और पढ़नी शुरु की कि वे बेगम अख़्तर से कुछ और नज़दीक हो जायें।
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यह सब बेगम अख़्तर की कला का एहतराम है। यह सब उस गायिका की नफ़ासत और उनकी कला के शामियाने के नीचे आने की कोशिश भर है, जिसके चलते हिन्दुस्तानी उप-शास्त्रीय संगीत के बड़े आँगन में हमें बेगम अख़्तर जैसा कलाकार नसीब हुआ है। यह क़िताब 'अख़्तरी : सोज़ और साज़ का अफ़साना' भी बेगम अख़्तर के संगीत, उनके किरदार और उनके जीवन के इर्द-गिर्द फैली हुई लगभग उन दुर्लभ कहानियों के इर्द-गिर्द बुनी गयी है, जिसके माध्यम से हम उस दौर के अँधेरे पर एक छोटी-सी कन्दील जलाकर देख सकते हैं। एक ऐसे दौर में अदब (साहित्य )और मौसीक़ी (संगीत) की जुगलबन्दी से पैदा हुई चमक के बारे में जानने की कोशिश भर, जिसमें बेगम अख़्तर को सराहने वाला एक बड़ा समाज हसरत से दम साधे खड़ा है।

यह क़िताब चार खण्डों में विभक्त है, जिसमें पहले खण्ड में हमने बेगम अख़्तर के जीवन और संगीत-यात्रा पर कई तरह से विचार किया है। इसमें बेगम अख़्तर परम्परा को समझने के अधिकारी विद्वानों शीला धर और सलीम किदवई जैसे लोग शामिल हैं, तो बिल्कुल नये ढंग से संगीत को परखने वाले डॉ. प्रवीण झा, सुशोभित सक्तावत और मोहित कटारिया भी। प्रख्यात लेखिका शिवानी जी का मशहूर संस्मरण यहाँ सम्मिलित किया गया है, तो उसी तरह वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया ने भी अपना आत्मीय संस्मरण लिखकर हमसे साझा किया है। संगीत के विद्वानों अनीश प्रधान, कुणाल रे, सुनीता बुद्धिराजा की उपस्थिति के अलावा मैंने स्वयं अपनी परिवार-परम्परा में व्याप्त अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी की शिनाख़्त उसी दौर के सन्दर्भ में करने की कोशिश की है। डॉ. रख़्शंदा जलील, इक़बाल रिज़वी, मृत्युंजय और नरेन्द्र सैनी का लेखन भी अलग से बेगम साहिबा के सांगीतिक जीवन को समझने की एक नयी दृष्टि देता है, जिससे उनके अदब में गहरे बसे होने का भी पता मिलता है। इसी तरह एक खण्ड उनकी शिष्याओं से साक्षात्कार पर आधारित है, जिसमें हमने रीता गांगुली जी और शान्ती हीरानन्द जी से उनकी उस्ताद के बारे में लम्बी चर्चा की है। दुर्भाग्य से उनकी एक शिष्या श्रीमती अंजलि बनर्जी से हम साक्षात्कार करने में असफल रहे हैं, क्योंकि वे सार्वजनिक रुप से अपनी कला और उस्ताद पर बात नहीं करतीं। इस कारण रीता जी और शान्ती जी के साक्षात्कारों को एक बड़े दस्तावेज़ के रुप में पढ़ने की यहाँ आवश्यकता है। अलग से एक खण्ड बेगम अख़्तर साहिबा के उस दुर्लभ साक्षात्कार पर आधारित है, जिसे संगीत के शीर्षस्थ आलोचक, विद्वान आचार्य कैलाश चन्द्र देव बृहस्पति जी ने सन् 1970 में लिया था। शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्गल जी ने बेगम अख़्तर की गायिकी का सुन्दर और दिलचस्प सांगीतिक पाठ किया है, जो क़िताब की उपलब्धि जैसा है।

अख्त़री : सोज़ और साज़ का अफ़साना

इन खण्डों से अलग दूसरा खण्ड रोचक ढंग से बेगम अख़्तर को समझने का एक विनम्र प्रयास भर है, जहाँ हमें उनके व्यक्त्वि की निहायत घरेलू और मामूली चीज़ों के बारे में भी पता चलता है। यहाँ हम उस सादगी को भी छू पाते हैं, जिससे बेगम अख़्तर जैसी बेमिसाल महिला का किरदार बनता है। पूरी तरह शोध पर आधारित और विभिन्न माध्यमों से ढूँढ़कर एकत्र की गयी छोटी-छोटी सूचनाओं, टिप्पणियों, संस्मरण, दस्तावेज़, यादों और इन्दराज के माध्यम से यह खण्ड रचा गया है। छब्बीस प्रसंगों के तहत बेगम अख़्तर के उस तिलिस्म को पकड़ने की कोशिश की गयी है, जिसकी चर्चा हमेशा से संगीत के गलियारों में होती रही। इस खण्ड में उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ और लता मंगेशकर जी के साथ-साथ संगीत के अधिकारी विद्वानों-प्रकाश वढेरा, सुशीला मिश्र, मोहन नाडकर्णी, गजेन्द्र नारायण सिंह, योगेश प्रवीन, प्राण नेविल, नरहरि पटेल, कौमुदी मुंशी, सतीश चोपड़ा, युनूस ख़ाँ, प्रमोद द्विवेदी और पार्थ चटर्जी की टिप्पणियाँ शामिल हैं। इसमें श्रुति सादोलिकर, शान्ती हीरानन्द और मालिनी अवस्थी जैसी गायिकाओं का भी योगदान हुआ है, जो इस क़िताब की ख़ूबसूरती में इजाफ़ा करता है।

इस पुस्तक के माध्यम से यह दावा नहीं किया जा रहा है कि हम बेगम अख़्तर को उनकी सम्पूर्णता में यहाँ परख रहे हैं। उनका व्यक्तित्व ही इतना विराट रहा है कि बहुत कुछ करने के बाद भी उससे कहीं अधिक छूट जाने की ख़लिश मन में है। किसी बड़े कलाकार को समझने और समेटने के जतन में उनका बहुत कुछ ऐसा है, जो छूट भी जाता है। फिर गायिकी का प्रभाव इतना व्यापक और नए विचारों से पगा हुआ है कि बेगम अख़्तर के सिग्नेचर को समझने के लिए अभी भी बहुत सारे अध्ययन, शोध और गायिकी पर गम्भीरता से बात करने की आवश्यकता है।

अपने छोटे-से प्रयास में हम बेगम अख़्तर के जीवन और संगीत पर जो कुछ भी यहाँ संयोजित कर पाये हैं, वह उनको प्यार करने वाले उनके सैकड़ों प्रशंसकों की मदद के कारण ही सम्भव हुआ है। यह क़िताब आपके हाथ में है, तो उसकी सारी प्रासंगिकता ही इस बात में है कि हम बेगम अख़्तर की शानदार सांगीतिक थाती को अपने कहन में वैसा ही आपके सामने प्रस्तुत कर सकें, जैसा कि वे ख़ुद बड़ी सहजता से मुस्कुराते हुए अपने श्रोताओं के सामने गाते हुए व्यक्त होती थीं। बेगम अख़्तर के 105वें जन्म-वर्ष में 'अख़्तरी : सोज़ और साज़ का एक अफ़साना' आपको सौंपते हुए हमें अत्यधिक प्रसन्नता हो रही है।

दर्द की मलिका की कहानी... उनके दु:ख और दर्द, ख़ुशियाँ और सपने, संगीत और प्रेम, सभी कुछ यहाँ छलकते हुए आ मिले हैं...

यह क़िताब मेरी सबसे प्यारी बुआ श्रीमती ज्वलन्ती मिश्र की स्मृति को मेरी आदर श्रद्धांजलि है। बचपन से ही उन्होंने मुझमें जो अनायास ही बीज पाये हुए संगीत के संस्कार को रोपने में अपनी भूमिका निभायी, उसे लिखकर या कहकर व्यक्त करने में असमर्थ हूँ।

-यतीन्द्र मिश्र.

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अख्त़री : सोज़ और साज़ का अफ़साना
सम्पादक : यतीन्द्र मिश्र
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 275
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