बेगम अख़्तर के जीवन की दिलचस्प यात्रा

बेगम अख़्तर के जीवन की दिलचस्प यात्रा
पुस्तक में हम अख़्तरीबाई के ऐसे पहलुओं से भी अवगत होते हैं जिनके बारे में जानना बेहद दिलचस्प है.
बेगम अख़्तर की ज़िन्दगी के यादगार लम्हों, अनकही बातों, ख्यालों को चर्चित लेखक और संगीत अध्येता यतीन्द्र मिश्र ने जिस अंदाज़ में प्रस्तुत किया है, वह प्रशंसनीय है। यतीन्द्र ने ऐसा दस्तावेज़ तैयार करने की कोशिश की है जो बेगम अख़्तर को चाहने वालों और किताबों के शौकीनों के लिए जरुरी हो जाता है। 'अख़्तरी : सोज़ और साज़ का अफ़साना' पाठकों के संग्रह में होनी चाहिए। पुस्तक का सम्पादन यतीन्द्र मिश्र ने किया है। वाणी प्रकाशन ने यह पुस्तक प्रकाशित की है।

अख़्तरीबाई का यह अफ़साना संगीत को शिद्दत से महसूस करने वाली ग़ज़ल से दिल पिघला देने वाली नायिका को समर्पित है। संगीत में जिसका जीवन बसता था, और जिसने ज़िन्दगी के अनगिनत मोड़ों को चहकते-फुदकते-रुसबा होते हुए देखा, यह पुस्तक हमें उससे मिलवाती है। हम बेगम अख़्तर की यात्रा में उनके फैज़ाबाद में जन्म लेने से शामिल होते हैं। वे बुलंदियों को छूती हैं, तो पाठक भी उत्साहित होकर उसमें शरीक होता है। कुल मिलाकर यह किताब दिलचस्पी लेकर पढ़ी जा सकती है।

अख़्तरीबाई ने रामपुर के नवाब रज़ा अली खाँ का विवाह प्रस्ताव ठुकरा दिया था। हालांकि वे नियमित रूप से रामपुर दरबार में गाने जाती थीं। उन्हें वजीफ़े के रूप में एक शानदार रकम देते मिला करती थी। अख़्तरी की मांग यह थी कि पहले नवाब अपनी सभी बेगमों को तलाक दें क्योंकि उन्हें किसी की सौत बनकर नहीं रहना चाहती थीं।
akhtari bai by yatendra mishra

1944 में अख़्तरीबाई ने इश्तियाक अहमद अब्बासी से निकाह किया। उन्होंने स्वयं कहा कि मैं शिद्दत से अब्बासी साहब से निकाह करना और उनके खानदान में अपनाया जाना चाहती थी; लेकिन तवायफ़ के तौर पर अपना कैरियर खत्म करने की घड़ी उन्होंने खुद चुनी थी। उन्हें खूब पता था की कोठे से कोठी में जाएंगी तो ज़िन्दगी में पेशे के तौर पर गाने की कोई गुंज़ाइश नहीं होगी, क्योंकि गानेवालियों को इज्ज़तदार नहीं माना जाता था। बेगम यह कुर्बानी देने को तैयार थीं।

उनके दाम पर गुरुर के छींटे कभी नहीं पड़े। हमेशा कहती थीं-'बेटा यह कभी मत सोचना कि तुम बहुत अच्छा गाती हो। जिस दिन मन में यह आ जायेगा, उस दिन गाना-बजाना चला जायेगा।' जिस ज़माने में तवायफ़ों को इज़्ज़त की निगाह से नहीं देखा जाता था, उस दौर में बेगम अख़्तर ने अपनी पूरी रवायत को इज़्ज़त दिलवायी। ठुमरी, दादरा और ग़ज़ल को शास्त्रीय संगीत के बराबर लाकर खड़ा किया और बड़े-बड़े दिग्गज उस्तादों से अपनी गायिकी का लोहा मनवाया। उनके गाने के बाद से ग़ज़ल के लिए कभी किसी ने कोई छोटी बात नहीं कही। यह बेगम अख़्तर की सफलता थी।

पुस्तक में हम अख़्तरीबाई के ऐसे पहलुओं से भी अवगत होते हैं जिनके बारे में जानना बेहद दिलचस्प है। 'अख़्तर मंज़िल' में वे खुलकर शराब और तंबाकू का मजा लेती थीं, लेकिन यहां पर खुद को बहुत जकड़ी हुई सी महसूस करती थीं। उन्हें समझ में आने लगा था कि इज्ज़तदारी की बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है: आजादी से समझौता करना पड़ता है। जितना पसंद वह व्हिस्की और रोजाना पी जाने वाली अपनी बिना फिल्टर वाली 50 से ज्यादा सिगरेट को पसंद करती थीं, इतनी पसंद उन्हें हंसी और भावना भी थीं।

बेगम अख़्तर
बेगम अख़्तर की ज़िन्दगी की सबसे बड़ी ख़ासियत यह थी कि वह दो अलग-अलग दुनियाओं में जीती रहीं और उन्होंने उनमें से किसी एक को भी छोड़े बिना दोनों से अपनी पहचान पायी.

बेगम अख़्तर ने 1950 के दशक में अपने दो शागिर्द बनाए। उनकी शागिर्द शांति हीरानंद और अंजली बैनर्जी उन्हीं के साथ रहती थीं।

यतीन्द्र मिश्र लिखते हैं कि तमाम अन्य तवायफ़ों के अफ़सानों से अलग, अख़्तरीबाई का ज़िन्दगीनामा दरअसल इस कारण भी प्रशंसनीय ढंग से साहित्य-कला-संगीत की दुनिया के लोग याद रखेंगे, क्योंकि सिर्फ़ उन्हें याद करते हुए वे एक प्रकार से मीर, ग़ालिब, मोमिन से लेकर ठुमरी, ग़ज़ल, कजरी के साथ पुराना फ़ैज़ाबाद, पुराना लखनऊ और पुरानी दिल्ली भी याद कर सकेंगे।

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अख्त़री : सोज़ और साज़ का अफ़साना
सम्पादक : यतीन्द्र मिश्र
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 275
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