'जनता स्टोर' के पीछे की कहानी

'जनता स्टोर'
'जनता स्टोर' शिक्षण-संस्थान के नए युवा की नई ज़ुबान और नई रफ्तार में लिखी कहानी है.
एक दिन दादी को एक किताब हाथ में लिए बैठे देखा। दादी पढ़ी-लिखी नहीं थीं, इसीलिए उनके हाथ में किताब देखकर उत्सुकता हुई। किताब पर लेखक का नाम था-डॉ. अर्कनाथ चौधरी, जो मेरे पिता हैं। दादी किताब के कवर पर हाथ फेर रही थीं, मैं शायद आठवीं क्लास में था तब। दादी काफी खुश थीं अपने बेटे की किताब देखकर। मुझसे बोलीं कि जिस दिन तू किताब लिखेगा, मुझे तेरी माँ से भी ज्यादा ख़ुशी होगी क्योंकि मेरे पिता उनके लिए मूल हैं और मैं सूद। उसी दिन सोचा कि किताब लिखूँगा ज़रुर..क्या लिखूँगा, यह नहीं मालूम था।

शादी हो गई तो मुझे अपने एक गुण की याद आई। वह गुण बचपन से था, पर जैसे हनुमान जी को उनकी शक्ति याद दिलाई गई वैसे ही मेरी बीवी ने ताने के रुप में ही सही, मुझे मेरे गुण की याद दिलाई। बचपन में पापा की डाँट, स्कूल/कॉलेज में टीचर्स की और शादी के बाद बीवी की डाँट से बचने को मैंने बहुत कहानियाँ बनाई थीं। बस, समझ में आ गया कि मुझे अकादमिक किताब नहीं, कहानी लिखनी है... और 'जनता स्टोर' का सफ़र शुरु हुआ।

दादी के उन प्रेरक शब्दों के बाद अगर किसी ने वाकई यह किताब लिखने के लिए मुझे सहयोग किया और उत्साहित किया तो वह है मेरी बीवी-पुष्पा झा जो अब चौधराइन हो चुकी है। उसने मुझे रोज़ दो पेज लिखने का टार्गेट दिया और एक कड़क मैनेजर की तरह वह इस टार्गेट को रिव्यू करती रही। मैं बिना किसी डिस्टर्बेंस के किताब पूरी कर सकूँ, इसलिए पिछले दो सालों में वह मुझसे दूर दूसरे शहर में रही। अकेले ही हमारे बेटे आर्यादित्य को सँभाला और अपनी नौकरी को भी, लेकिन टार्गेट रिव्यू करना न भूली। मैं भी कई बार नया आइडिया आने पर रात 2 बजे उसे फोन करके चैप्टर सुनाता और वह सुनकर अपना फीडबैक देती। हालांकि एक एंगल और है, और वह यह है कि इस दौरान दबाव नहीं था जिस वजह से मैं रोज़ बड़े अच्छे मूड में रहता था और किताब लिखने के लिए मूड का अच्छा रहना ज़रुरी है।

पापा की लगभग 21 किताबें हैं। वह मेरे प्रेरणास्रोत रहे हैं। उम्मीद है, आर्यादित्य भी अपनी दादी की ख़ुशी देख एक दिन अपनी माँ को ऐसी ही ख़ुशी देगा।

लेखक : नवीन चौधरी
'जनता स्टोर' एक शिक्षण-संस्थान के नए युवा की नई ज़ुबान और नई रफ्तार में लिखी कहानी है। बड़े स्तर की राजनीति द्वारा छात्रशक्ति का दुरुपयोग, छात्रों के अपने जातिगत अहंकारों की लड़ाई, प्रेम त्रिकोण, छात्र-चुनाव, हिंसा, साजि़शें, हत्याएँ, बलात्कार जैसे इन सभी कहानियों के स्थायी चित्र बन गए हैं, वह सब इस उपन्यास में भी है और उसे इतने प्रामाणिक ढंग से चित्रित किया गया है कि खुद ही हम यह सोचने पर बाध्य हो जाते हैं कि अस्मिताओं की पहचान और विचार के विकेन्द्रीकरण को हमने सोवियत संघ के विघटन के बाद जितनी उम्मीद से देखा था, कहीं वह कोई बहुत बड़ा भटकाव तो नहीं था? लेकिन अच्छी बात यह है कि इक्कीसवीं सदी के डेढ़ दशक बीत जाने के बाद अब उस भटकाव का आत्मविश्वास कम होने लगा है और नई पीढ़ी एक बड़े फलक पर, ज़्यादा वयस्क और विस्तृत सोच की खोज करती दिखाई दे रही है।

जब कहानी लिखी जा रही थी तो मुझे स्कूल के वे लड़के याद आए जो बड़े नेता बनते थे, क्योंकि उनके सही-ग़लत में उनका साथ देने के लिए उनके बड़े भाई थे। मेरे बड़े भाई शेखर की मृत्यु सिर्फ तीन साल की उम्र में (मेरे जन्म से पहले हो चुकी थी)। जब भी दोस्तों के बड़े भाइयों को देखता हूँ तो इच्छा होती है, काश! शेखर होता। यही वजह रही कि मुख्य पात्र मयूर के कैरेक्टर को तैयार करते हुए तीसरे ड्राफ्ट में मुझे लगा कि उसे बड़े भाई का सहयोग मिलना चाहिए और इस तरह कहानी में मयूर के भाई शेखर भारद्वाज की एंट्री हुई।

~नवीन चौधरी.

जनता स्टोर
लेखक : नवीन चौधरी
प्रकाशक : राधाकृष्ण प्रकाशन
पृष्ठ : 207
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