कुली लाइन्स : विदेश से कभी वापस न लौटने वाले लाखों भारतीयों का इतिहास

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यह किताब एक दस्तावेज़ है उन लोगों का जिन्हें इतिहास ने भुला दिया था..
'कुली लाइन्स' एक ऐतिहासिक कृति है जिसमें उन लाखों भारतीयों के दर्दनाक, वीभत्स तथा अमानवीय जीवन की सच्चाईयों को लेखक प्रवीण कुमार झा ने पाठकों के सामने रखने का प्रयास किया है। पुस्तक को पढ़ने से ही पता चलता है कि उन्हें इसके लिए कई देशों की यात्राएँ और अथक परिश्रम करना पड़ा।

पुस्तक को पाठक पढ़ना शुरु करता है तो फिर उसमें पूरी तरह खो जाता है तथा पूरी किताब पढ़कर ही दम लेता है। कई भारतीयों के साथ डेढ़-दो सौ वर्षों पूर्व विदेशों तत्कालीन ब्रिटिश उपनिवेशों में घटी घटनाओं की दास्तान पढ़कर पाठक भावुक हुए बिना नहीं रह सकता। अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं सदी में भारत से लाखों लोगों को भेड़-बकरियों से भी बदतर हाल में जिस प्रकार जहाजों में भरकर अफ्रीका, यूरोप तथा अमेरिका से कनाडा तक ले जाया गया, वह दुनिया के इतिहास का स्याह पक्ष है जिसे लगभग भुला दिया गया है। तत्कालीन दस्तावेज़ों, रिपोर्टों और कई जहाजियों की जीवित पीढ़ियों के लोगों से मिली जानकारी के आधार पर डॉ. झा ने 'कुली लाइन्स' के द्वारा विदेशों में पहुँचे भारतीयों का इतिहास दुनिया के लोगों खासकर भारतीयों के सामने लाने का भागीरथ प्रयास किया है।

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उन्होंने पुस्तक में इस पर विस्तार से साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं कि किस प्रकार अनपढ़, गरीबी के शिकार और भोले लोगों को अंग्रेजों के दलालों ने बहला-फुसलाकर भारत की धरती से सैकड़ों मील दूर बंधुआ मजदूर बनने को मजबूर कर दिया।

लाखों भारतीय अपना तथा अपने परिवार के बेहतर और समृद्ध जीवन जीने की अभिलाषा में सात समन्दर पार तक मौत से खेलते हुए चले गए।

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हिन्द महासागर में स्थित रियूनियन द्वीप, सूरीनाम, मॉरीशस, सेशेल्स, फिज़ी, दक्षिणी अमेरिका के गुयाना, ट्रिनिडाड और टोबैगो, जमैका, यूरोप के नीदरलैंड, युगान्डा, जंजीबार, दक्षिणी अफ्रीका, कनाडा के अलावा करीबी देश म्यांमार, सिंगापुर और मलेशिया आदि देशों में बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब, मद्रास आदि राज्यों से भारी संख्या में भारतीयों को ले जाया गया।

सूरीनाम में भारतीयों में 70 प्रतिशत हिन्दू हैं, बाकी मुसलमान और कुछ इसाई बन गए। सूरीनाम की यह भी ख़ासियत रही कि यहाँ हिन्दू और मुस्लिम के मध्य प्रारम्भ में कई सम्बन्ध हुए। 'परिवार बनाबै' की संस्कृति से भारतीयों ने उस वक़्त बस यह देखा कि किसी भी तरह उनका परिवार बने, चाहे कोई भी धर्म या जाति हो। ऐसे कई सरनामी परिवार हैं जहाँ एक ही घर में हिन्दू, मुस्लिम और ईसाई सभी धर्म के लोग हैं।
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अनेक महिलायें और अविवाहित युवतियाँ भी कई वजहों से इन देशों में गयीं। कमीशनखोर और दलाल जगह-जगह घूम कर भोले-भाले लोगों और महिलाओं को कलकत्ता पहुँचा देते थे और जबरन विदेश भेज देते थे। महिलाओं के साथ अनेक दर्दनाक घटनाओं को लेखक ने पाठकों के सामने रखा है। अनेक औरतें अपनों और परायों के हाथों मौत के मुँह में धकेली गयीं। बहुतों के साथ जबरन अथवा लालच में यौनाचार किया। कई ने मजबूरी में वेश्यावृत्ति अपनायी। अनेक लोग यातनाओं और भागने के चक्कर में मारे गए। पुस्तक में हृदय को झकझोर देने वाली घटनायें भरी पड़ी हैं।

यह पुस्तक प्रत्येक भारतीय को पढ़नी चाहिए। प्रवीण कुमार झा की इसके लिए तारीफ करनी होगी। उन्होंने उस इतिहास को जीवित किया है जिसे भुला दिया गया था। यह एक अहम दस्तावेज़ है जिसे जानना जरुरी है। इसलिए भी कि यह हम भारतीयों का इतिहास है, और इसलिए भी कि यह हर भारतीय को प्रेरित करता है, सम्मान जगाता है उनके लिए जो संघर्ष करते रहे ताकि कुछ बेहतर हो!

आखिर में रश्मि भारद्वाज द्वारा लिखी पंक्तियाँ -
हम भला कैसे जानेंगे तुम्हारा दर्द
तुम्हारी सैकड़ों वर्षों की वह त्रासद-कथा
जब भेड़-बकरियों से लादे गए थे तुम जहाज़ों पर
काले पानी को पार कर कभी नहीं लौटने के लिए..

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कुली लाइन्स
लेखक : प्रवीण कुमार झा
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 280
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