कुम्भ का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक दर्पण

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पुस्तक में कुम्भ के खगोलीय, ज्योतिष तथा आध्यत्मिक पक्ष को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है.
प्रख्यात इतिहासकार तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर हेरम्ब चतुर्वेदी ने 'कुम्भ : ऐतिहासिक वाङ्मय' नामक पुस्तक में कुम्भ अखाड़ों और संन्यासियों के बारे में विस्तार से वर्णन किया है। कुम्भ में जुटने वाली भीड़ से पता चलता है कि लोगों में कुम्भ स्नान के प्रति कितनी श्रद्धा और लगाव है। इतना कुछ होने के बावजूद आम आदमी कुम्भ के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक महत्व से पूरी तरह परिचित नहीं है।

हेरम्ब चतुर्वेदी ने इस पुस्तक में कुम्भ के खगोलीय, ज्योतिष तथा आध्यत्मिक पक्ष को विस्तार से प्रस्तुत किया है। पुस्तक का श्रीगणेश वे कुम्भ का अभिप्राय और कुम्भ, इतिहास के दर्पण  में कुम्भ, ब्रिटिश काल में इलाहाबाद और वहां का कुम्भ, अखाड़े और सन्यासी, कुम्भ पर्व के रिवाज एवं अनुष्ठान आदि विषयों पर सिलसिलेवार चर्चा करते हुए आगे बढ़ते हैं तथा पाठकों को कुम्भ से जुड़ी हर छोटी-बड़ी जानकारी को उपलब्ध कराने की सफल कोशिश करते हैं।

'कुम्भ' का अभिप्राय है 'आवृत्ति करना'। जिस प्रकार, परब्रह्म अपने पूर्ण वैभव से समस्त ब्रह्माण्ड को आवृ​त्त किए हुए हैं, इस कारण से वह 'कुम्भ' के प्रतीक में पूज्य हैं। इसी प्रकार 'कम कांते' धातु से सम्बद्ध होने पर यह शब्द 'कुम्भ' अमृत की कामना का परिचायक हो जाता है। सनातन संस्कृति में स्पष्ट उल्लेख है कि ब्रह्मा ने पंच तत्वों से ही श्रीसती की रचना कर दी। अत: जब ये पांच तत्व 'कुम्भ' में प्रतीक रुप में समाहित हैं तो यही दैवी सृष्टि का प्रतीक है।
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यह पुस्तक भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं को आंख मूंद कर अंगीकार करने वालों के साथ ही इससे इतर कथित प्रगतिशील चिंतकों और पाठकों को भी प्रभावित करने वाली सामग्री प्रस्तुत करती है। रुढ़िवादी परम्पराओं का ऐतिहासिक परिचय पुस्तक में लेखक ने बिना किसी लाग-लपेट के प्रस्तुत किया है। पुस्तक में यथास्थान उपनिषदों तथा पौराणिक उदाहरण देकर कुम्भ के महत्व की पुष्ठि की गयी है। उज्जैन, हरिद्वार, नासिक और प्रयाग में आयोजित कुम्भ का समय ज्योतिष और खगोलशास्त्र के सिद्धांतों पर आधारित होने के प्रमाण दिए गये हैं। इससे पुस्तक का महत्व बढ़ गया है।

लेखक ने कुम्भ के महत्व को पुर्नजागरण, भारतीय अस्मिता, हिन्दू धर्म की आस्थाओं, कथाओं, मिथकों से जोड़ते हुए विस्तृत चर्चा की है। साथ ही ब्रह्मा के यज्ञ से लेकर, भारतीय इतिहास के प्राचीन, मध्यकाल एवं अंग्रेजी शासन के बाद से आजतक उपलब्ध विवरणों, दस्तावेजों तथा अन्य प्रमाणों पर कुम्भ का इतिहास लिखने में सफलता हासिल की है।
अखाड़ों के शाही स्नान, पेश्वाई आदि को हिन्दू धर्म के पुर्नजागरण से जोड़ते हुए शंकराचार्य के महत्व को भी रेखांकित किया है। हरिद्वार में चैत्र मास में होने वाले कुम्भ के ज्योतिषीय महत्व का शास्त्रीय विचार -
पद्मिनी नायके मेषे कुम्भराशिगते गुरुः।
गंगा द्वारे भवेयोग: कुम्भ नामा तदोत्तमा:।।
कुम्भ राशि गते जीवे यद्विने मेषगोरवि:।
हरिद्वारे कृतं स्नानं पुनरावृत्ति वर्जनम्।। 
कुम्भ : ऐतिहासिक वाङ्मय
लेखक : हेरम्ब चतुर्वेदी
प्रकाशक : वाणी प्रकाशन
पृष्ठ : 126
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